जबलपुर. जबलपुर–भोपाल राष्ट्रीय राजमार्ग पर सफर करने वाले लोग इन दिनों सड़क पर दिखाई दे रही लाल रंग की चौड़ी पट्टियों को देखकर हैरान हैं। ये लाल ‘टेबल-टॉप रेड मार्किंग’ न सिर्फ हाईवे की खूबसूरती बढ़ा रही हैं, बल्कि इसके पीछे एक गंभीर और दूरदर्शी उद्देश्य छिपा है—जंगलों से गुजरने वाले वन्य जीवों को सुरक्षित मार्ग देना और दुर्घटनाओं में हो रही निरंतर बढ़ोतरी को रोकना। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) द्वारा करीब 11.9 किलोमीटर के इस संवेदनशील हिस्से में पहली बार ऐसी पहल की गई है, जो देश में वाइल्डलाइफ-फ्रेंडली रोड डिजाइन के एक आधुनिक चरण की शुरुआत मानी जा रही है।
यह हाईवे क्षेत्र घने जंगलों से सटा है जहां हिरण, नीलगाय, जंगली सूअर, सियार और तेंदुए जैसे जानवर अक्सर सड़क पार करते हैं। अंधेरे में या धुंध के दौरान वाहन चालकों को ये जानवर समय रहते दिखाई नहीं देते, जिसका नतीजा कई बार जानलेवा दुर्घटनाओं के रूप में सामने आता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में वाइल्डलाइफ क्रॉसिंग ज़ोन में दुर्घटनाएं बढ़ी हैं, और जरा-सी चूक से जानवर ही नहीं, बल्कि यात्रियों की जान पर भी बन आती है। इसी चुनौती ने इस हाईवे को नई तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित किया।
टेबल-टॉप रेड मार्किंग दरअसल एक विशेष प्रकार का सड़क-डिज़ाइन है, जिसमें सतह को थोड़ा ऊँचा उठाकर लाल रंग की चौड़ी पट्टी बनाई जाती है। इस पर गाड़ी चढ़ते ही वाहन की गति स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है और ड्राइवर को सावधान रहने का संकेत भी मिलता है। लाल रंग दूर से ही स्पष्ट दिखाई देता है, इसलिए घने अंधेरे या कोहरे में भी ड्राइवरों को यह चेतावनी मिल जाती है कि आगे वाइल्डलाइफ क्रॉसिंग ज़ोन है। इस तकनीक से सड़क पर छोटे झटके महसूस होते हैं, जो वाहन चालक को बिना तनाव दिए गति नियंत्रित करने के लिए मजबूर कर देते हैं।
NHAI अधिकारियों के अनुसार, यह प्रयोग सिर्फ स्पीड ब्रेकर का विकल्प नहीं है बल्कि एक वैज्ञानिक, पर्यावरण-अनुकूल और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप समाधान है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हाईवे पर गति का प्रवाह बना रहे, परंतु संवेदनशील क्षेत्रों में वाहन नियंत्रण भी उसी सहजता से हो सके। कई देशों में इसे सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है और अब पहली बार मध्य प्रदेश में इस पर गंभीरता से काम शुरू हुआ है।
स्थानीय वन विभाग की टीम का कहना है कि हाईवे से सटे जंगलों में जानवरों की आवाजाही लगातार बढ़ी है। शहरों और गांवों के फैलाव के कारण वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास सिमट रहा है और वे अक्सर एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने के लिए हाईवे पार करने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सड़क सुरक्षा और वन्य सुरक्षा दोनों साथ-साथ सुनिश्चित करना आवश्यक है। टीम ने कई महीनों तक सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया और पाया कि कई घटनाओं में वाहन चालक को अचानक उभर आए जानवर को देखने का मौका तक नहीं मिला। ऐसे में यदि चेतावनी प्रणाली दूर से ही दिख जाए, तो दुर्घटनाओं में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
स्थानीय लोगों और नियमित यात्रियों ने भी इस पहल का स्वागत किया है। जबलपुर से भोपाल रोज़ाना यात्रा करने वाले कई ड्राइवरों ने बताया कि लाल पट्टियां जैसे-जैसे नजर आती हैं, वाहन की रफ्तार खुद-ब-खुद धीमी हो जाती है और आगे सड़क पर क्या हो सकता है, इसे लेकर एक सहज सतर्कता विकसित होती है। कुछ यात्रियों ने यह भी कहा कि रात के समय ट्रक और बसों की तेज रफ्तार से होने वाली दुर्घटनाएं इस पहल के बाद कम हो सकती हैं क्योंकि ड्राइवरों के लिए यह एक स्पष्ट संकेत होगा कि आगे सावधानी जरूरी है।
पर्यावरण और सड़क सुरक्षा के विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम सिर्फ सड़क को सुरक्षित बनाने तक सीमित नहीं, बल्कि वाइल्डलाइफ कॉरिडोर को संरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ी सोच का हिस्सा है। देश में कई हाईवे ऐसे हैं जो जंगलों को दो हिस्सों में बांट देते हैं, जिससे जानवरों की प्राकृतिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं और कई प्रजातियों पर संकट बढ़ता है। यदि मध्य प्रदेश में यह प्रयोग सफल रहा, तो अन्य राज्यों को भी यह मॉडल अपनाने का रास्ता साफ होगा।
कुछ विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में इन मार्किंग के साथ-साथ सोलर-पावर्ड साइन बोर्ड, थर्मल सेंसर या स्मार्ट वाइल्डलाइफ अलर्ट सिस्टम भी जोड़ना चाहिए। कई देशों में ऐसे उपकरण हाईवे पर लगे होते हैं, जो जैसे ही सड़क किनारे कोई जानवर आता है, ऑटोमैटिक चेतावनी लाइटें सक्रिय कर देते हैं। भारत में भी ऐसी तकनीक धीरे-धीरे अपनाई जा सकती है, ताकि वाइल्डलाइफ संरक्षण और सड़क सुरक्षा दोनों को मजबूत किया जा सके।
इस बीच, NHAI ने यह भी स्पष्ट किया है कि आगे इसी मॉडल को उन हिस्सों में भी लागू किया जाएगा जिन्हें हाई-रिस्क जोन के रूप में चिह्नित किया गया है। विभाग इस बात पर भी निगरानी रखेगा कि नई मार्किंग से जानवरों की मृत्यु दर में कितनी कमी आती है और क्या सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों में सुधार होता है। यदि आने वाले महीनों में इसके सकारात्मक नतीजे मिलते हैं, तो यह पूरा क्षेत्र हाईवे सुरक्षा के एक नए अध्याय की मिसाल बन सकता है।
जबलपुर–भोपाल हाईवे पर लागू की गई यह ‘टेबल-टॉप रेड मार्किंग’ पहल फिलहाल सोशल मीडिया पर भी चर्चा में है। लोग इसे पर्यावरण और आधुनिक सड़क-डिजाइन का बेहतरीन मिश्रण बता रहे हैं। कई युवाओं ने इसे "स्मार्ट हाईवे का पहला कदम" कहा, जबकि पर्यावरण प्रेमियों ने उम्मीद जताई है कि इस तरह के प्रयास जंगलों में रहने वाले जानवरों के लिए लंबी अवधि में सुरक्षा कवच साबित होंगे।
अंततः यह पहल सिर्फ सड़क पर रंग भरने भर की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस नए भारत की झलक है जो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन साधना जानता है। यह याद दिलाती है कि सड़कें सिर्फ वाहनों के लिए नहीं, बल्कि उन अनगिनत जीवों के मार्ग भी हैं जिनका अस्तित्व हमारे पर्यावरण तंत्र का अहम हिस्सा है। NHAI की यह कोशिश उन सभी यात्रियों और वन्य प्राणियों के लिए आशा की किरण है जो इस हाईवे से गुजरते हैं—और यह उम्मीद जगाती है कि भविष्य में हमारा देश एक ऐसा सड़क नेटवर्क बना सकेगा जो तेज और सुगम तो होगा ही, साथ ही प्रकृति-अनुकूल भी।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

