हिमाचल की वादियों में बसा 'मिनी थाईलैंड' पर्यटकों के लिए बना आकर्षण का नया केंद्र

हिमाचल की वादियों में बसा

प्रेषित समय :20:06:18 PM / Fri, Dec 19th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

हिमाचल प्रदेश की गोद में छिपे प्राकृतिक रहस्यों की जब भी बात होती है, तो जेहन में ऊंचे पहाड़ों और गहरी घाटियों की तस्वीर उभरती है, लेकिन इसी देवभूमि के कुल्लू जिले में एक ऐसा कोना भी है जो अपनी अनोखी बनावट के कारण 'मिनी थाईलैंड' के नाम से मशहूर हो रहा है। जिभी के शांत और सुरम्य गांव के पास स्थित कुल्ही कटंडी एक ऐसी जगह है, जिसकी खूबसूरती किसी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल से कम नहीं है, फिर भी यह मुख्यधारा के शोर-शराबे से अब तक काफी हद तक सुरक्षित है। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह किसी गुप्त खजाने की तरह है, जहां पहुंचकर ऐसा महसूस होता है मानो समय ठहर गया हो। ऊंचे देवदार के पेड़ों के बीच से छनकर आती धूप और पत्थरों के बीच से कल-कल करती शीतल जलधारा एक ऐसा माहौल तैयार करती है, जो पर्यटकों के भीतर एक नई जिज्ञासा और उत्साह भर देता है। अक्सर लोग हिमाचल के लोकप्रिय हिल स्टेशनों की भीड़ में सुकून तलाशते हैं, लेकिन जो शांति कुल्ही कटंडी के इस अनछुए रास्ते पर मिलती है, वह अनुभव विरले ही कहीं और प्राप्त होता है।

इस 'मिनी थाईलैंड' की यात्रा का आरंभ जिभी जैसे खूबसूरत गांव से होता है, जो पहले से ही अपने पारंपरिक काठकुनी शैली के घरों और नदी किनारे बने होम-स्टे के लिए जाना जाता है। जिभी से महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित कुल्ही कटंडी तक पहुंचने के लिए रशाला गांव से एक छोटा लेकिन बेहद रोमांचक ट्रेक शुरू होता है। यह रास्ता उन लोगों के लिए जन्नत के समान है जो शहरी कोलाहल से दूर प्रकृति के एकांत में खुद को खोजना चाहते हैं। जैसे ही आप इस पगडंडी पर कदम रखते हैं, हवा का मिजाज बदलने लगता है। देवदार और ओक के घने जंगलों की सोंधी महक और पक्षियों का मधुर कलरव आपका स्वागत करता है। इस ट्रेक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बहुत ज्यादा चुनौतीपूर्ण नहीं है, इसलिए पहली बार पहाड़ों पर आने वाले पर्यटक भी इसे आसानी से पूरा कर सकते हैं। रास्ते में कहीं-कहीं दिखने वाले हिमाचल के बर्फ से लदे शिखर इस रोमांच को दोगुना कर देते हैं, जिससे यात्रियों के मन में इस जगह को लेकर उत्सुकता और भी गहरी होती जाती है।

कुल्ही कटंडी को 'मिनी थाईलैंड' क्यों कहा जाता है, इसका उत्तर वहां की चट्टानी संरचना और पानी के बहाव के तरीके में छिपा है। दो विशाल चट्टानों के बीच से बहती नदी और वहां बनने वाला छोटा सा कुंड किसी विदेशी तट या समुद्री गुफा जैसा आभास देता है। यही कारण है कि स्थानीय लोगों और कुछ साहसी पर्यटकों ने इसे यह अनूठा नाम दिया है। ट्रेक के दौरान बीच-बीच में आने वाले खुले घास के मैदान, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'थाच' कहा जाता है, यात्रा की थकान मिटाने के लिए बेहतरीन ठिकाने हैं। इन मैदानों में अक्सर स्थानीय चरवाहे अपने पशुओं के साथ नजर आते हैं, जो इस आधुनिक दुनिया में भी एक प्राचीन और सरल जीवन पद्धति का जीवंत उदाहरण पेश करते हैं। यहां की हरियाली और फूलों की महक आंखों को सुकून देती है और मन को तरोताजा कर देती है। यह जगह केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए है कि कैसे प्रकृति बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के अपना सौंदर्य निखारती है।

पर्यटन के लिहाज से कुल्ही कटंडी की सबसे बड़ी ताकत इसका 'ऑफबीट' होना है। जहां कुल्लू और मनाली के अन्य प्रसिद्ध स्थल जैसे जलोड़ी पास या सेरोलसर झील पर पर्यटकों का तांता लगा रहता है, वहीं कुल्ही कटंडी में आपको प्रकृति के साथ अकेले समय बिताने का भरपूर मौका मिलता है। यहां की शांति इतनी गहरी है कि आप अपनी सांसों की आवाज भी साफ सुन सकते हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में सोशल मीडिया के माध्यम से इस जगह की चर्चा बढ़ी है, जिससे युवाओं और ट्रेकर्स के बीच इसे लेकर काफी जिज्ञासा पैदा हुई है। लोग जानना चाहते हैं कि आखिर हिमाचल के एक छोटे से गांव में थाईलैंड जैसा नजारा कैसे संभव है। यह जिज्ञासा ही सैलानियों को रशाला गांव की उन घुमावदार रास्तों की ओर खींच लाती है। यहां कोई बड़े होटल या व्यावसायिक मॉल नहीं हैं, बल्कि यहां की असल खूबसूरती यहां की सादगी और प्राकृतिक बनावट में ही निहित है।

प्रकृति की इस अनमोल विरासत को करीब से देखने की इच्छा रखने वालों के लिए कुल्ही कटंडी एक आदर्श गंतव्य है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। चूंकि यह क्षेत्र अभी तक शहरी प्रदूषण से बचा हुआ है, इसलिए यहां आने वाले पर्यटकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इस 'मिनी थाईलैंड' की पवित्रता और स्वच्छता को बनाए रखें। यहां की नदियां इतनी पारदर्शी हैं कि आप तलहटी के पत्थर भी गिन सकते हैं। इस प्राकृतिक शुद्धता को बनाए रखना ही इस पर्यटन स्थल के भविष्य के लिए सबसे जरूरी है। स्थानीय लोग भी इस जगह को लेकर काफी संवेदनशील हैं और वे इसे व्यावसायिक केंद्र बनाने के बजाय एक 'इको-फ्रेंडली' गंतव्य के रूप में देखना चाहते हैं। अगर आप भी हिमाचल की वादियों में कुछ नया और अलग तलाश रहे हैं, तो कुल्ही कटंडी का यह सफर आपकी यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाएगा। यह जगह हमें याद दिलाती है कि दुनिया के सबसे खूबसूरत नजारों को देखने के लिए हमेशा सात समंदर पार जाने की जरूरत नहीं होती, कभी-कभी वे हमारे अपने देश की शांत पहाड़ियों के पीछे ही छिपे होते हैं।

अब मन में यह जिज्ञासा उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस जादुई सफर की योजना कैसे बनाई जाए। कुल्ही कटंडी या 'मिनी थाईलैंड' की यात्रा न केवल आंखों को सुकून देती है, बल्कि यह आपकी जेब पर भी बहुत भारी नहीं पड़ती। यदि आप दिल्ली या चंडीगढ़ जैसे शहरों से अपनी यात्रा शुरू करते हैं, तो एक सामान्य बजट में आप इस जन्नत का अनुभव कर सकते हैं। जिभी तक पहुंचने के लिए सबसे किफ़ायती रास्ता बस का है, जो कुल्लू या मनाली जाने वाले मार्ग पर 'औट' नामक स्थान पर आपको छोड़ती है। वहां से स्थानीय बस या टैक्सी के जरिए आप आसानी से जिभी पहुंच सकते हैं। एक औसत अनुमान के अनुसार, दो से तीन दिनों की इस यात्रा के लिए प्रति व्यक्ति 5,000 से 8,000 रुपये का बजट पर्याप्त होता है, जिसमें रहना, खाना और स्थानीय घूमना शामिल है।

रुकने के विकल्पों की बात करें तो जिभी अपनी 'होम-स्टे' संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहाँ आपको बड़े होटलों की चकाचौंध के बजाय लकड़ी के बने पारंपरिक पहाड़ी घर और कॉटेज मिलेंगे, जो नदी के किनारे स्थित होते हैं। इन होम-स्टे में रुकना अपने आप में एक अनोखा अनुभव है, क्योंकि यहाँ आपको स्थानीय लोगों के साथ रहने और उनकी संस्कृति को करीब से देखने का मौका मिलता है। बजट के प्रति सचेत यात्रियों के लिए यहाँ कई बेहतरीन हॉस्टल्स और डॉरमेट्री उपलब्ध हैं, जिनका किराया 500 से 800 रुपये प्रति रात से शुरू होता है। वहीं, अगर आप थोड़ा लग्जरी अनुभव चाहते हैं, तो नदी किनारे बने ट्री-हाउस या प्रीमियम कॉटेज का चुनाव कर सकते हैं, जिनका किराया 3,000 से 5,000 रुपये के बीच होता है। जिभी और उसके आसपास रशाला गांव में भी अब कुछ सुंदर कैंपिंग साइट्स खुल गई हैं, जहाँ आप तारों की छांव में रात बिताने का लुत्फ उठा सकते हैं।

मिनी थाईलैंड की इस यात्रा को यादगार बनाने के लिए कुछ जरूरी सामान अपने साथ रखना बहुत महत्वपूर्ण है। चूंकि यह एक पहाड़ी क्षेत्र है, इसलिए मौसम पल भर में बदल सकता है। अपने साथ एक अच्छी ग्रिप वाले ट्रेकिंग जूते जरूर रखें, क्योंकि रशाला गांव से कुल्ही कटंडी तक का रास्ता पगडंडियों वाला है और नदी के पास की चट्टानें फिसलन भरी हो सकती हैं। इसके अलावा, अपने बैग में एक रेनकोट या छाता, हल्के ऊनी कपड़े (भले ही आप गर्मियों में जा रहे हों), और एक पावर बैंक अवश्य रखें। चूंकि कुल्ही कटंडी एक इको-सेंसिटिव जोन है, इसलिए अपने साथ पानी की एक रिफिल होने वाली बोतल और कचरा रखने के लिए एक छोटा बैग जरूर ले जाएं। यहाँ मोबाइल नेटवर्क थोड़ा कमजोर हो सकता है, जो आपको तकनीक से दूर प्रकृति के और करीब ले जाने में मदद करेगा।

इस यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय मार्च से जून और फिर सितंबर से दिसंबर की शुरुआत तक का होता है। मानसून के दौरान पहाड़ी रास्तों पर फिसलन बढ़ जाती है, इसलिए उस समय सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। कुल्ही कटंडी का यह सफर आपको न केवल एक नई जगह से रूबरू कराएगा, बल्कि पहाड़ों की सादगी और शांति के प्रति आपका नजरिया भी बदल देगा। 'मिनी थाईलैंड' के इस शांत कुंड में पैर डुबोकर बैठना और देवदार के जंगलों की सरसराहट सुनना वह सुकून है, जिसकी तलाश में हर मुसाफिर भटकता है। 

दिल्ली या उत्तर भारत के अन्य राज्यों से आने वाले सैलानियों के लिए सबसे पहला पड़ाव औट (Aut) सुरंग होता है। दिल्ली के कश्मीरी गेट से कुल्लू-मनाली की ओर जाने वाली किसी भी बस से आप लगभग 10-12 घंटे में औट पहुंच सकते हैं। यहाँ से जिभी की दूरी लगभग 38 किलोमीटर है, जिसे आप स्थानीय बस या टैक्सी के जरिए डेढ़ घंटे में तय कर सकते हैं। यह पूरा रास्ता तीर्थन नदी के साथ-साथ चलता है, जो आपकी यात्रा में रोमांच का पहला तड़का लगाता है।

जिभी पहुँचने के बाद पहले दिन आप वहां की स्थानीय खूबसूरती और जिभी झरने का आनंद ले सकते हैं। असली रोमांच दूसरे दिन शुरू होता है जब आप 'मिनी थाईलैंड' यानी कुल्ही कटंडी के लिए निकलते हैं। जिभी से रशाला गांव तक की दूरी आप पैदल या अपनी गाड़ी से तय कर सकते हैं और फिर वहां से शुरू होता है वह जादुई ट्रेक। रुकने के विकल्पों की बात करें तो जिभी में 'होस्टेलर' (The Hosteller) और 'मडहाउस' (Mudhouse Hostels) जैसे ठिकाने युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं, जहाँ आपको न केवल बजट में जगह मिलती है बल्कि दुनिया भर से आए मुसाफिरों से मिलने का मौका भी मिलता है। यदि आप शांति और विलासिता चाहते हैं, तो 'रॉक टॉप इन' (Rock Top Inn) या नदी किनारे बने 'क्रिस्टल माउंटेन' जैसे होम-स्टे आपकी पहली पसंद हो सकते हैं, जहाँ से सुबह की चाय के साथ पहाड़ों का अद्भुत नजारा दिखाई देता है।

'मिनी थाईलैंड' के इस सफर का एक आदर्श रूट प्लान कुछ इस प्रकार हो सकता है: पहले दिन जिभी आगमन और लोकल मार्केट की सैर, दूसरे दिन सुबह जल्दी कुल्ही कटंडी ट्रेक और शाम को वापस कैंपिंग, और तीसरे दिन अगर समय हो तो पास के जलोड़ी पास और सेरोलसर झील की यात्रा। खाने-पीने के शौकीनों के लिए जिभी में 'हिलशायर' (Hillshire) और 'ब्रू बक' (Brew Bucks) जैसे कैफे हैं, जहाँ की हॉट चॉकलेट और लोकल सिड्डू आपको एक अलग ही स्वाद का अनुभव कराएंगे। यह पूरा क्षेत्र अब धीरे-धीरे डिजिटल घुमंतुओं (Digital Nomads) का भी पसंदीदा अड्डा बनता जा रहा है, क्योंकि यहाँ का वातावरण काम और आराम के बीच एक बेहतरीन संतुलन पैदा करता है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-