ओडिशा के जंगलों में सुरक्षाबलों का बड़ा प्रहार एक करोड़ का इनामी माओवादी कमांडर पाका हनुमंतु मुठभेड़ में ढेर

ओडिशा के जंगलों में सुरक्षाबलों का बड़ा प्रहार एक करोड़ का इनामी माओवादी कमांडर पाका हनुमंतु मुठभेड़ में ढेर

प्रेषित समय :21:59:04 PM / Fri, Dec 26th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भुवनेश्वर. दशकों से लाल गलियारे में खौफ का पर्याय बने और सुरक्षा एजेंसियों की आंखों में धूल झोंक रहे देश के सबसे खूंखार माओवादी नेताओं में से एक पाका हनुमंतु उर्फ गणेश का सफर आखिरकार ओडिशा के कंधमाल जिले के घने जंगलों में खत्म हो गया। गुरुवार की तड़के जब दुनिया गहरी नींद में थी, तब सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच एक भीषण मुठभेड़ हुई, जिसने देश के नक्सल विरोधी अभियान को एक ऐतिहासिक सफलता दिलाई है। केंद्र सरकार ने इस ऑपरेशन को एक 'बड़ी उपलब्धि' करार दिया है, क्योंकि मारा गया कमांडर कोई साधारण कैडर नहीं, बल्कि प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) की सबसे शक्तिशाली इकाई 'सेंट्रल कमेटी' का एक स्तंभ था। 67 वर्षीय पाका हनुमंतु पर एक करोड़ रुपये का भारी-भरकम इनाम था, जो इस बात की तस्दीक करता है कि वह सुरक्षा तंत्र के लिए कितनी बड़ी चुनौती बना हुआ था।

तेलंगाना के नलगोंडा जिले का रहने वाला हनुमंतु केवल एक नाम नहीं, बल्कि माओवादी विचारधारा का एक ऐसा चेहरा था जिसने दशकों तक मध्य और दक्षिण भारत के जंगलों में अपनी समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश की। गणेश, चमरू, रूपा, राजेश तिवारी और सोमरा जैसे कई उपनामों से पहचाने जाने वाले इस मास्टरमाइंड ने सुरक्षा बलों को छकाने के लिए हर बार नई पहचान ओढ़ी। वह न केवल सेंट्रल कमेटी का सदस्य था, बल्कि सेंट्रल रीजनल ब्यूरो और साउदर्न रीजनल ब्यूरो का इकलौता और सबसे प्रभावशाली रणनीतिकार भी था। इस एनकाउंटर में हनुमंतु के साथ पांच अन्य नक्सली भी मारे गए हैं, जिनमें दो महिला कैडर शामिल हैं। जैसे-जैसे इस मुठभेड़ की विस्तृत जानकारी सामने आ रही है, लोगों के मन में यह उत्सुकता बढ़ रही है कि आखिर इतने ऊंचे दर्जे का नेता सुरक्षा बलों के जाल में कैसे फंसा।

सूत्रों के मुताबिक, कंधमाल के बीहड़ों में माओवादियों की एक बड़ी बैठक की गोपनीय सूचना मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने अपनी विशेष टुकड़ी को तैनात किया था। घने कोहरे और जंगली रास्तों का फायदा उठाकर सुरक्षा बल उस गुप्त ठिकाने तक पहुंच गए जहाँ ये रणनीतिकार छिपे हुए थे। खुद को चारों तरफ से घिरा देख नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसके जवाब में की गई कार्रवाई में हनुमंतु का अंत हो गया। लंबे समय से बीमार रहने और उम्र के पड़ाव के बावजूद वह संगठन की कमान मजबूती से संभाले हुए था, जिससे सुरक्षा एजेंसियां उसे पकड़ने के लिए सालों से जाल बिछा रही थीं। उसकी मौत को माओवादी आंदोलन के लिए एक ऐसा अपूरणीय झटका माना जा रहा है, जिससे उबर पाना उनके लिए लगभग नामुमकिन होगा।

सार्वजनिक चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या हनुमंतु की मौत के साथ ही नलगोंडा और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में माओवाद का एक अध्याय पूरी तरह समाप्त हो गया है? या फिर इस घटना के बाद संगठन में कोई नया उत्तराधिकारी उभर कर सामने आएगा? फिलहाल, पुलिस और अर्धसैनिक बल इलाके में सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कहीं और कोई बड़ा नेता वहां छिपा न हो। इस एनकाउंटर ने यह संदेश साफ कर दिया है कि सरकार अब नक्सली नेतृत्व की जड़ पर प्रहार कर रही है। एक करोड़ के इनामी का खात्मा न केवल सुरक्षा बलों के मनोबल को सातवें आसमान पर ले गया है, बल्कि उन इलाकों के ग्रामीणों में भी एक नई उम्मीद जगाई है जो सालों से बंदूक की साये में रहने को मजबूर थे। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस बड़ी कार्रवाई के बाद सुरक्षा एजेंसियां अगले कौन से बड़े नाम को अपने निशाने पर लेती हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-