जबलपुर. प्रकृति के रहस्यों और मानवीय परिश्रम के अद्भुत संगम की एक प्रेरक कहानी आज नर्मदा तट से निकलकर पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई है. यह कहानी उस धारणा को तोड़ती है, जिसे वर्षों से खेती का अटल नियम माना जाता रहा—कि नारियल केवल समुद्र किनारे, खारी हवा और रेतीली मिट्टी में ही फल-फूल सकता है. मध्य प्रदेश के हृदय स्थल जबलपुर में, मां नर्मदा के मीठे जल के सहारे, एक किसान ने इस पारंपरिक सोच को पूरी तरह बदल दिया है. लम्हेटा और भेड़ाघाट की वादियों के पास खड़ा यह नारियल बागान अब केवल खेती का प्रयोग नहीं, बल्कि करोड़ों की कमाई, नवाचार और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुका है.
इस अनोखी पहल के सूत्रधार हैं जबलपुर के प्रगतिशील किसान अनिल पचौरी. करीब दस साल पहले तक जिस जमीन पर लोग नारियल की खेती की कल्पना भी नहीं करते थे, आज वहां दो हजार से अधिक नारियल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ लहराते नजर आते हैं. इन पेड़ों पर झूलते हरे फल इस बात का प्रमाण हैं कि अगर सोच नई हो और मेहनत अटूट, तो भूगोल की सीमाएं भी बेमानी हो जाती हैं. अनिल पचौरी की यह यात्रा जिज्ञासा से शुरू हुई थी. दक्षिण भारत की एक यात्रा के दौरान उन्होंने वहां के नारियल किसानों की समृद्धि को करीब से देखा. पक्के मकान, आधुनिक जीवनशैली और खेती से मिलने वाली स्थायी आमदनी ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर यह सब सिर्फ तटीय इलाकों तक ही क्यों सीमित रहे.
इसी सवाल ने उन्हें एक बड़ा फैसला लेने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने यह जानने की कोशिश शुरू की कि क्या नारियल की खेती नर्मदा जैसे मीठे पानी वाले इलाके में संभव है. शुरुआती दौर में जानकारी का अभाव सबसे बड़ी चुनौती था. मध्य प्रदेश में नारियल को कभी भी व्यावसायिक फसल के रूप में नहीं देखा गया था. लोग इसे पूजा-पाठ या शौकिया तौर पर घरों में लगाने तक सीमित रखते थे. लेकिन अनिल पचौरी ने जोखिम उठाया. उन्होंने दक्षिण भारत में किसानों के साथ रहकर खेती की बारीकियां सीखीं, पौधों की किस्में समझीं और अंततः के-48 और गोदावरी गंगा जैसी उन्नत वैरायटी के पौधे जबलपुर ले आए.
करीब आठ साल पहले उन्होंने नर्मदा किनारे जमीन खरीदी और 2000 नारियल के पौधे लगाए. उस वक्त यह कदम कई लोगों को अव्यावहारिक लगा. इलाके में बिजली तक नहीं थी, सिंचाई एक बड़ी समस्या थी और नारियल के पौधों को लंबे समय तक देखभाल की जरूरत होती है. लेकिन अनिल पचौरी ने हार नहीं मानी. उन्होंने सोलर ऊर्जा से सिंचाई की व्यवस्था की और साल-दर-साल पौधों की देखभाल करते रहे. कई किस्में स्थानीय जलवायु में असफल रहीं, लेकिन कुछ पौधों ने नर्मदा की आबोहवा को पूरी तरह अपना लिया.
आज स्थिति यह है कि पिछले दो वर्षों से इस बागान में व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो चुका है. एक-एक पेड़ से साल में 150 से 200 नारियल मिल रहे हैं. मार्च के महीने में फसल तैयार होते ही व्यापारी सीधे खेत से नारियल खरीदने पहुंच जाते हैं. पिछले सीजन में नारियल 48 रुपये प्रति नग तक बिका. इस हिसाब से देखा जाए तो 2000 पेड़ों का यह बागान आने वाले समय में सालाना एक करोड़ रुपये तक के कारोबार की क्षमता रखता है. यह आंकड़ा उन किसानों के लिए किसी सपने से कम नहीं, जो अब भी पारंपरिक फसलों में सीमित मुनाफे से जूझ रहे हैं.
इस खेती की सबसे बड़ी खासियत इसका स्वाद है. जानकारों और ग्राहकों का कहना है कि नर्मदा के मीठे पानी में पले ये नारियल स्वाद में कोस्टल कोकोनट से भी बेहतर हैं. जहां समुद्र किनारे के नारियल में हल्का खारापन महसूस होता है, वहीं जबलपुर के इन नारियलों में प्राकृतिक मिठास और ताजगी भरपूर है. यही कारण है कि बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है और नारियल पानी के लिए यह खास पसंद बनता जा रहा है.
अनिल पचौरी ने केवल नारियल तक खुद को सीमित नहीं रखा. उन्होंने इंटरक्रॉपिंग का ऐसा मॉडल अपनाया, जिसने इस खेती को और अधिक लाभकारी बना दिया. नारियल के पेड़ों के बीच करीब 15 फीट की दूरी होती है, जिसे उन्होंने आम के बागानों से भर दिया. मध्य प्रदेश में तेज हवाएं और लू आम की फसल को अक्सर नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन नारियल के लंबे पेड़ प्राकृतिक विंड ब्रेकर बनकर आम के पौधों की रक्षा करते हैं. इससे एक ही जमीन से दोहरी आमदनी सुनिश्चित हो रही है.
इसके अलावा नारियल की खेती से निकलने वाला हर अवशेष भी कमाई का जरिया बन रहा है. नारियल के छिलके और रेशों से कोकोपीट तैयार किया जाता है, जिसकी नर्सरी और बागवानी उद्योग में भारी मांग है. इस तरह यह खेती लगभग शून्य अपशिष्ट मॉडल बन चुकी है, जहां कुछ भी बेकार नहीं जाता.
इस प्रयोग ने कृषि विशेषज्ञों और प्रशासन का भी ध्यान खींचा है. भले ही अभी नारियल को मध्य प्रदेश की प्रमुख फसलों में शामिल करने में समय लगे, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे नवाचार ही किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं. सरकार भी अब नारियल के पौधों पर 50 प्रतिशत तक का अनुदान दे रही है, जिससे नए किसानों के लिए शुरुआती लागत कम हो गई है. एक बार लगाया गया नारियल का पेड़ 60 से 70 साल तक फल देता है, यानी यह खेती आने वाली दो पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य का आधार बन सकती है.
आज जबलपुर का यह नारियल फार्म केवल एक खेत नहीं, बल्कि प्रेरणा का केंद्र बन गया है. दूर-दराज से किसान यहां आकर इस मॉडल को समझ रहे हैं और अपने खेतों में इसे अपनाने की योजना बना रहे हैं. नर्मदा की लहरों के साथ पनपा यह नारियल साम्राज्य यह संदेश देता है कि यदि किसान परंपरागत सोच से बाहर निकलकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवाचार को अपनाए, तो उसे समृद्धि के लिए शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा. जबलपुर की धरती पर उगा यह हरा-भरा साम्राज्य आज मध्य प्रदेश के कृषि इतिहास में एक नया अध्याय लिख रहा है—जहां मीठे पानी ने खारेपन की धारणा को मात दे दी है और किसान की मेहनत ने असंभव को संभव कर दिखाया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

