साल 2026 की शुरुआत हिंदी सिनेमा में एक ऐसी फिल्म से हुई है जो युद्ध को जीत-हार, जोश और जिंगोइज़्म के चश्मे से नहीं बल्कि उसके मानवीय असर के आईने में देखती है. श्रीराम राघवन के निर्देशन में बनी इक्कीस एक युद्ध फिल्म होते हुए भी पारंपरिक युद्ध फिल्मों की भीड़ से अलग खड़ी नजर आती है. यह फिल्म दर्शक को हथियारों की चमक और खून-खराबे के रोमांच में उलझाने के बजाय उस पीड़ा, स्मृति और खालीपन की ओर ले जाती है जो युद्ध के बाद भी लंबे समय तक इंसानों के भीतर बना रहता है. अगस्त्य नंदा और धर्मेंद्र जैसे दो अलग पीढ़ियों के कलाकारों को साथ लाकर राघवन ने न केवल एक ऐतिहासिक सैन्य गाथा को पर्दे पर उतारा है, बल्कि उसे गहरे मानवीय संदर्भों से भी जोड़ा है.
फिल्म की कहानी 1971 के भारत-पाक युद्ध के नायक सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल के जीवन और बलिदान के इर्द-गिर्द बुनी गई है. एक ऐसा युवा अधिकारी, जिसने महज इक्कीस वर्ष की उम्र में युद्ध के मैदान में असाधारण साहस दिखाया और परमवीर चक्र से सम्मानित हुआ. फिल्म का आरंभ ही एक बेहद मार्मिक दृश्य से होता है, जब एक वरिष्ठ अधिकारी अरुण से उसकी उम्र पूछता है और केक से सना उसका चेहरा जवाब देता है—इक्कीस. यही संख्या फिल्म का शीर्षक भी बनती है और पूरे कथानक में एक प्रतीक की तरह घूमती रहती है, जो अधूरे जीवन, अधूरे सपनों और समय से पहले आई शहादत की याद दिलाती है.
इक्कीस केवल एक बहादुर सैनिक की कहानी नहीं है, बल्कि यह युद्ध के दूरगामी प्रभावों की भी पड़ताल करती है. फिल्म उस मानसिक और भावनात्मक बोझ को सामने लाती है, जिसे युद्ध में शामिल लोग और उनके परिवार जीवन भर ढोते हैं. श्रीराम राघवन, अरिजीत बिस्वास और पूजा लाधा सुरती द्वारा सह-लिखित पटकथा युद्ध को महिमामंडित करने से बचती है. यहां न तो अनावश्यक हिंसा है और न ही राष्ट्रवादी नारेबाजी का अतिरेक. इसके बजाय फिल्म यह सवाल उठाती है कि जब गोलियां थम जाती हैं और झंडे लहरा दिए जाते हैं, तब इंसानों के भीतर क्या बचता है.
अगस्त्य नंदा ने अपने करियर की इस अहम भूमिका में एक नए और कच्चेपन से भरे सैनिक को ईमानदारी से पेश किया है. उनका अरुण खेतरपाल आत्मविश्वास और असमंजस, साहस और आत्मग्लानि के बीच झूलता हुआ नजर आता है. तलवार-ए-ऑनर से चूक जाने का अफसोस हो या युद्ध के मैदान में अपने टैंक के साथ आखिरी दम तक डटे रहने का जज़्बा, अगस्त्य का अभिनय सहज है और बनावटी नहीं लगता. एक नए कलाकार के रूप में उनकी थोड़ी अनगढ़ छवि इस किरदार के लिए उलटे फायदेमंद साबित होती है.
धर्मेंद्र, जो इस फिल्म के जरिए अपने अभिनय करियर को विराम देते नजर आते हैं, रिटायर्ड ब्रिगेडियर मदन खेतरपाल की भूमिका में भावनात्मक गहराई लेकर आते हैं. बेटे को युद्ध के लिए विदा करते समय एक फौजी पिता के चेहरे पर जो गर्व और भय साथ-साथ मौजूद होता है, उसे धर्मेंद्र ने बिना ज्यादा शब्दों के अभिव्यक्त किया है. हालांकि संवाद अदायगी में उनकी उम्र और ठहराव महसूस होता है, लेकिन कुछ दृश्य ऐसे हैं जहां उनका अभिनय सीधे दिल को छूता है, खासकर जब वे एक बंटे हुए वतन और मिट्टी की बात करते हैं.
फिल्म का एक अहम और प्रभावशाली पक्ष वह समानांतर कथा है, जिसमें मदन खेतरपाल अपने बेटे के अंतिम रास्ते को समझने के लिए सीमा पार पाकिस्तान की यात्रा करते हैं. यहां उनकी मुलाकात पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नसीर से होती है, जिनका किरदार जयदीप अहलावत ने निभाया है. अहलावत हर दृश्य में अपने अभिनय से एक गहरी छाप छोड़ते हैं. उनका किरदार अपराधबोध, पश्चाताप और इंसानी रिश्तों की टूटन को इतनी सहजता से उकेरता है कि दर्शक युद्ध की रेखाओं के पार भी एक साझा दर्द महसूस करने लगता है. भारत और पाकिस्तान के बीच दिखाई गई यह इंसानी कड़ी फिल्म को एक व्यापक मानवीय संदर्भ देती है.
युद्ध के दृश्य फिल्म का अहम हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें जरूरत भर ही दिखाया गया है. बसंतर की लड़ाई में टैंकों की गर्जना, गोलियों की आवाज़ और धुएं के बीच भी कैमरा हिंसा पर नहीं, बल्कि सैनिकों के चेहरों पर टिकता है. यहां सैनिक मशीन नहीं, बल्कि इंसान नजर आते हैं, जो आदेश का पालन करते हुए भी भीतर से डरते हैं, सोचते हैं और उम्मीद करते हैं. यही बात इक्कीस को हाल के वर्षों की कई आक्रामक और शोरगुल वाली युद्ध फिल्मों से अलग करती है.
फिल्म में एक हल्का सा रोमांटिक ट्रैक भी है, जिसमें अरुण और एक युवा लड़की के बीच पनपता रिश्ता दिखाया गया है. हालांकि यह हिस्सा ऐतिहासिक तथ्यों से कितना मेल खाता है, इस पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन यह ट्रैक कहानी में मानवीय कोमलता जोड़ता है. सिमर भाटिया ने इस भूमिका को सादगी से निभाया है, हालांकि महिला पात्रों को फिल्म में बहुत ज्यादा विस्तार नहीं मिलता.
तकनीकी तौर पर फिल्म मजबूत है. सिनेमैटोग्राफी युद्ध और शांति, अतीत और वर्तमान के बीच का अंतर स्पष्ट करती है. बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं को उभारता है, लेकिन उन पर हावी नहीं होता. हालांकि टाइमलाइन के बीच बार-बार आने-जाने से कुछ जगहों पर प्रवाह थोड़ा टूटता है, फिर भी कुल मिलाकर फिल्म दर्शक को बांधे रखने में सफल रहती है.
इक्कीस उस तरह की फिल्म है जो थिएटर से निकलने के बाद भी मन में बनी रहती है. यह दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है कि युद्ध आखिर किसके लिए और किस कीमत पर लड़ा जाता है. साल 2026 की यह एक मजबूत शुरुआत है, जो यह याद दिलाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदना और समझ का माध्यम भी हो सकता है. इक्कीस एक ऐसा मरहम है, जो शहादत के जख्मों पर धीरे-धीरे रखा जाता है और यह एहसास दिलाता है कि सीमाओं के आर-पार दर्द की भाषा एक ही होती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

