सकट चौथ पर आस्था और श्रद्धा का संगम संकष्टी चतुर्थी के महासंयोग में गजानन की आराधना से दूर होंगे सारे संकट

सकट चौथ पर आस्था और श्रद्धा का संगम संकष्टी चतुर्थी के महासंयोग में गजानन की आराधना से दूर होंगे सारे संकट

प्रेषित समय :21:54:25 PM / Sun, Jan 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भारतीय सनातन संस्कृति में पर्वों और त्यौहारों का विशेष महत्व है और इन्हीं में से एक प्रमुख व्रत सकट चौथ जिसे संकष्टि चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है इस वर्ष 6 जनवरी 2026 को पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। पंचांग की गणना के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आगमन मंगलवार को होने के कारण इस बार 'अंगारकी चतुर्थी' का विशेष संयोग भी बन रहा है जो ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भक्तों के लिए अत्यंत फलदायी माना जा रहा है। पंचांग के विशिष्ट आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 6 जनवरी की सुबह 08 बजकर 01 मिनट पर होगा और इसका समापन अगले दिन यानी 7 जनवरी को प्रातः 06 बजकर 52 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार संकष्टि चतुर्थी का व्रत चंद्रोदय व्यापिनी तिथि में किया जाता है इसलिए 6 जनवरी को ही व्रत रखना शास्त्र सम्मत है और इसी दिन रात्रि 08 बजकर 54 मिनट पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाएगा।

सकट चौथ का व्रत विशेष रूप से संतान की दीर्घायु और परिवार के सुख-सौभाग्य की कामना के लिए किया जाता है जिसे उत्तर भारत के कई राज्यों में 'तिलकुट चौथ' के नाम से भी ख्याति प्राप्त है। इस पावन अवसर पर पूजा की विधि अत्यंत सरल किंतु श्रद्धा से परिपूर्ण होती है जिसमें सूर्योदय के साथ ही व्रती को स्नान ध्यान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान गणेश के सम्मुख व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र कर वहां भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है और उन्हें पीले वस्त्र व पुष्प अर्पित किए जाते हैं। गणेश पूजन में दूर्वा यानी घास का महत्व सर्वोपरि है क्योंकि मान्यता है कि भगवान लंबोदर को दूर्वा की 21 गांठें अर्पित करने से जीवन की सभी बाधाएं स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।

पूजन के दौरान भगवान गणेश को रोली अक्षत और चंदन का तिलक लगाकर दीप प्रज्वलित किया जाता है और इसके पश्चात माघ मास की इस चतुर्थी के मुख्य नैवेद्य यानी तिल और गुड़ से बने लड्डुओं का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तिल का दान करना और तिल का सेवन करना आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाता है। पूजा की प्रक्रिया में सकट चौथ की व्रत कथा का श्रवण करना अनिवार्य माना गया है जिसमें भगवान गणेश के पराक्रम और माता-पिता के प्रति उनकी भक्ति का वर्णन मिलता है। कथा के उपरांत आरती और पुष्पांजलि अर्पित की जाती है। दिनभर निराहार रहकर शाम को चंद्रमा के दर्शन का इंतजार किया जाता है क्योंकि बिना चंद्र दर्शन और अर्घ्य के यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।

जैसे ही रात्रि में 08 बजकर 54 मिनट पर चंद्रमा उदय होगा व्रती को एक तांबे या चांदी के पात्र में जल लेकर उसमें दूध अक्षत और सफेद पुष्प मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय भगवान गणेश और चंद्र देव का स्मरण करते हुए अपनी मनोकामनाएं मांगनी चाहिए और उसके पश्चात प्रसाद ग्रहण कर व्रत का समापन करना चाहिए। ज्योतिषविदों का मत है कि मंगलवार के दिन चतुर्थी होने से यह संकटहर्ता गणेश और मंगल ग्रह की कृपा पाने का अद्भुत अवसर है जिससे कुंडली के मंगल दोषों का निवारण भी संभव है। इस महापर्व को लेकर बाजारों में भी रौनक दिखाई दे रही है और लोग तिल व गुड़ की खरीदारी में जुटे हैं। मंदिरों में विशेष सजावट की जा रही है और भक्तों के आगमन को देखते हुए प्रशासन ने भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। आस्था का यह सैलाब बताता है कि आधुनिक युग में भी परंपराओं और विश्वास की जड़ें कितनी गहरी हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-