नई दिल्ली. भारतीय निर्वाचन आयोग ने मंगलवार 6 जनवरी 2026 को उच्चतम न्यायालय में मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन संशोधन यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) का मजबूती से बचाव करते हुए स्पष्ट कर दिया कि देश की मतदाता सूचियों को विदेशी नागरिकों से मुक्त रखना उसका न केवल अधिकार बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कर्तव्य भी है। आयोग ने उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें एसआईआर को एक “समानांतर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर” करार दिया जा रहा था और इसे केवल राजनीतिक व कानूनी बयानबाजी बताया। निर्वाचन आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि संविधान के तहत उसे यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता बनी रहे और इसके लिए यह आवश्यक है कि मतदाता सूची में केवल पात्र भारतीय नागरिकों के ही नाम दर्ज हों।
सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने न्यायालय के समक्ष यह रेखांकित किया कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बीच एक बुनियादी और स्पष्ट अंतर है, जिसे जानबूझकर धुंधला किया जा रहा है। आयोग की ओर से कहा गया कि एनआरसी का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों की पहचान करना है, जबकि मतदाता सूची केवल उन व्यक्तियों तक सीमित होती है जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हों, मानसिक रूप से स्वस्थ हों और भारतीय नागरिक हों। ऐसे में एसआईआर को एनआरसी के समान बताना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं की गलत व्याख्या भी है।
निर्वाचन आयोग ने यह भी कहा कि उसे संविधान से प्राप्त अधिकारों के तहत नागरिकता की स्थिति की जांच करने की शक्ति है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम शामिल होने की पहली और अनिवार्य शर्त भारतीय नागरिकता ही है। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर उचित संदेह उत्पन्न होता है, तो आयोग के पास यह अधिकार है कि वह उससे आवश्यक दस्तावेज और प्रमाण मांगे। आयोग ने अदालत को अवगत कराया कि यह प्रक्रिया किसी समुदाय या वर्ग को निशाना बनाने के लिए नहीं बल्कि मतदाता सूची को त्रुटिरहित और विश्वसनीय बनाने के उद्देश्य से अपनाई जा रही है।
आयोग ने अपनी दलीलों में इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि यदि मतदाता सूची में विदेशी नागरिकों के नाम बने रहते हैं, तो इससे न केवल देश की आंतरिक सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगता है बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर होती है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, एक-एक वोट की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है और यदि अपात्र व्यक्ति मतदान प्रक्रिया में शामिल होते हैं तो जनादेश की शुद्धता प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि विशेष गहन संशोधन को समय की आवश्यकता बताया गया है, खासकर तब जब विभिन्न स्रोतों से मतदाता सूचियों में विसंगतियों और फर्जी नामों की शिकायतें सामने आई हैं।
सुनवाई के दौरान आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण कोई नई या असाधारण प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक सतत और नियमित अभ्यास है, जिसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और उससे जुड़े नियमों के तहत समय-समय पर किया जाता रहा है। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में व्यापक स्तर पर गहन संशोधन की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि कुछ क्षेत्रों में संदिग्ध डेटा, डुप्लीकेट नाम और अपात्र व्यक्तियों की मौजूदगी की आशंका जताई गई थी। आयोग ने जोर देकर कहा कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है और इसमें किसी भी वास्तविक भारतीय नागरिक को उसके अधिकारों से वंचित करने का कोई इरादा नहीं है।
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत को यह भी बताया कि आयोग एक स्वतंत्र और स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसे अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए कार्यप्रणाली तय करने का अधिकार है। याचिकाकर्ताओं द्वारा यह आरोप लगाया गया कि एसआईआर नागरिकता अधिनियम के दायरे में दखल है, जिस पर आयोग ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया केवल चुनाव कानूनों के अंतर्गत की जा रही है और इसका नागरिकता कानून से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। आयोग ने यह भी आश्वासन दिया कि जिन लोगों के नाम हटाए जाते हैं या जिनकी स्थिति पर सवाल उठते हैं, उन्हें सुनवाई और अपील का पूरा अवसर दिया जाएगा, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो।
पिछले कुछ समय से विदेशी नागरिकों के कथित तौर पर मतदाता सूची में शामिल होने का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ है। विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने आशंका जताई थी कि एसआईआर के जरिए नागरिकों को परेशान किया जा सकता है। इन आशंकाओं का जवाब देते हुए निर्वाचन आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि वह किसी भी राजनीतिक दबाव से परे रहकर केवल संविधान के प्रति जवाबदेह है और उसका उद्देश्य केवल एक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय मतदाता सूची तैयार करना है।
आयोग ने यह भी कहा कि लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि चुनाव प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी है। यदि मतदाता सूची में एक भी अपात्र व्यक्ति का नाम रह जाता है, तो यह पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर सकता है। इसलिए विदेशी नागरिकों के नाम हटाना कोई वैकल्पिक कदम नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। आयोग ने न्यायालय से आग्रह किया कि वह इस प्रक्रिया को व्यापक संदर्भ में देखे और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को बनाए रखने में सहयोग करे।
सुनवाई के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि यह मामला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकता, मतदान अधिकार और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका जैसे बुनियादी सवालों से जुड़ा हुआ है। अब देश की निगाहें उच्चतम न्यायालय के अगले रुख और अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया किस दायरे में आगे बढ़ेगी और निर्वाचन आयोग की शक्तियों की संवैधानिक सीमा को किस प्रकार परिभाषित किया जाएगा। यह बहस आने वाले समय में देश की चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों की दिशा को प्रभावित करने वाली मानी जा रही है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

