पूर्वी काराकोरम की ऊंचाइयों में स्थित सियाचिन ग्लेशियर, जिसे ‘हिमालय का मुकुट’ कहा जाता है, अब भारतीय नागरिकों के लिए सीमित और नियंत्रित पर्यटन के तहत देखने योग्य बन चुका है। अक्टूबर 2023 से लागू नई नीति के बाद पहली बार सियाचिन का नाम केवल सैन्य मोर्चों और शौर्य गाथाओं तक सीमित न रहकर भारत के साहसिक और उच्च हिमालयी पर्यटन मानचित्र पर दर्ज हुआ है। भारत सरकार द्वारा लिए गए इस ऐतिहासिक निर्णय के तहत अब भारतीय नागरिक निर्धारित शर्तों और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के पालन के साथ सियाचिन बेस कैंप के आसपास चिन्हित नागरिक क्षेत्रों तक यात्रा कर सकते हैं। हालांकि यह यात्रा अब भी सामान्य पर्यटन की श्रेणी में नहीं आती और इसे पूरी तरह अनुशासित, उद्देश्यपूर्ण और पर्यावरण-संवेदनशील अनुभव के रूप में ही देखा जा रहा है।
सरकार द्वारा विशेष सैन्य अनुमति यानी स्पेशल एरिया परमिट की अनिवार्यता हटाए जाने के बावजूद, लद्दाख के प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट अभी भी आवश्यक है। यह परमिट लेह प्रशासन के माध्यम से जारी किया जाता है और इसके बिना नुब्रा घाटी या उससे आगे की यात्रा संभव नहीं है। विदेशी नागरिकों के लिए सियाचिन क्षेत्र पूरी तरह प्रतिबंधित है और उन्हें किसी भी परिस्थिति में वहां जाने की अनुमति नहीं दी जाती। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि नागरिकों को केवल स्वीकृत स्थानों तक ही जाने दिया जाएगा और मौसम, सुरक्षा हालात तथा सैन्य सलाह के आधार पर यात्रा को किसी भी समय स्थगित या रद्द किया जा सकता है।
सियाचिन तक की यात्रा को जानबूझकर चरणबद्ध और धीमा रखा गया है ताकि ऊंचाई से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सके। इस यात्रा की शुरुआत लेह से होती है, जो समुद्र तल से लगभग 3500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। लेह न केवल लद्दाख का प्रवेश द्वार है, बल्कि उच्च हिमालयी यात्राओं के लिए चिकित्सा और लॉजिस्टिक सहायता का प्रमुख केंद्र भी है। यहां पहुंचने के बाद कम से कम 24 से 48 घंटे का अनुकूलन काल अनिवार्य माना गया है, जिसके दौरान यात्रियों को आराम, पर्याप्त जल सेवन और शारीरिक परिश्रम से बचने की सलाह दी जाती है।
लेह से नुब्रा घाटी की ओर यात्रा खारदुंग ला दर्रे से होकर गुजरती है, जिसे दुनिया की सबसे ऊंची मोटर योग्य सड़कों में गिना जाता है। लगभग 5359 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मार्ग करीब 160 किलोमीटर लंबा होता है और मौसम के अनुसार छह से आठ घंटे का समय ले सकता है। नुब्रा घाटी लगभग 4000 मीटर की औसत ऊंचाई पर स्थित है और इसे सियाचिन की ओर बढ़ने से पहले एक अहम मध्यवर्ती अनुकूलन क्षेत्र माना जाता है। इसके बाद अंतिम चरण में सुमूर या टेगर जैसे गांवों से सियाचिन बेस कैंप की दिशा में लगभग 80 किलोमीटर की यात्रा होती है, जहां हरियाली पूरी तरह समाप्त हो जाती है और चारों ओर केवल बर्फ, चट्टान और खनिजों से भरा निर्जन परिदृश्य दिखाई देता है।
सियाचिन क्षेत्र में ठहरने की सुविधाएं बेहद सीमित हैं। नुब्रा घाटी में कुछ चयनित रिट्रीट और गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं, जो ऊंचाई के अनुरूप गर्म कमरों और पौष्टिक भोजन की व्यवस्था करते हैं। लेह में अपेक्षाकृत बेहतर होटल और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं, इसलिए अधिकांश यात्री वहीं अंतिम तैयारियां करते हैं। सियाचिन बेस कैंप पर सेना द्वारा संचालित एक सीमित विश्राम गृह मौजूद है, लेकिन इसकी उपलब्धता अत्यंत सीमित होने के कारण अधिकतर पर्यटक उसी दिन नुब्रा लौट आते हैं।
स्वास्थ्य जोखिम इस यात्रा का सबसे गंभीर पहलू माना जाता है। ऊंचाई से होने वाली बीमारी, सिरदर्द, उलझन, सांस लेने में तकलीफ और नींद की समस्या आम हैं। गंभीर मामलों में हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा या सेरेब्रल एडिमा जैसी जानलेवा स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं, जिनमें तत्काल नीचे उतरना जरूरी होता है। विशेषज्ञों के अनुसार धीरे-धीरे ऊंचाई बढ़ाना, पर्याप्त आराम और प्रतिदिन चार से पांच लीटर पानी पीना सबसे प्रभावी बचाव उपाय हैं। चिकित्सकीय परामर्श के बाद कुछ दवाओं का उपयोग भी किया जाता है।
सियाचिन यात्रा के लिए पैकिंग साधारण ट्रेक से कहीं अधिक तकनीकी और सुरक्षा-केंद्रित होती है। थर्मल कपड़े, इंसुलेटेड जैकेट, ऊनी दस्ताने, बालाक्लावा, वाटरप्रूफ लेयर, उच्च हिमालयी जूते, यूवी प्रोटेक्शन चश्मा, उच्च एसपीएफ सनस्क्रीन, माइनस 20 डिग्री तक रेटेड स्लीपिंग बैग, प्राथमिक चिकित्सा किट और वैध सरकारी पहचान पत्र अनिवार्य माने जाते हैं। यहां किसी भी तरह की लापरवाही सीधे जीवन पर असर डाल सकती है।
सियाचिन में नागरिकों के लिए यात्रा का समय केवल जून से सितंबर के बीच सीमित है। जुलाई और अगस्त में मौसम अपेक्षाकृत स्थिर माना जाता है, हालांकि तापमान तब भी शून्य से नीचे ही रहता है। सर्दियों में यहां तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, सड़कों पर भारी बर्फ जम जाती है और यात्रा पूरी तरह प्रतिबंधित रहती है।
सियाचिन में अनुभव किसी पर्यटन स्थल जैसा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और ऐतिहासिक यात्रा जैसा होता है। सियाचिन युद्ध स्मारक पर जाकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देना, अनंत बर्फीले विस्तार के बीच खड़े होकर प्रकृति की विशालता को महसूस करना और सीमित दायरे में फोटोग्राफी करना इस यात्रा के मुख्य अनुभवों में शामिल हैं। कुछ मामलों में मौसम और शारीरिक क्षमता के आधार पर सीमित गाइडेड डे हाइक की भी अनुमति दी जाती है।
लगभग 75 किलोमीटर लंबा और करीब 2000 वर्ग किलोमीटर में फैला सियाचिन ग्लेशियर गैर-ध्रुवीय क्षेत्रों में दुनिया के सबसे लंबे ग्लेशियरों में से एक है। इसकी ऊंचाई 5400 मीटर से शुरू होकर 7000 मीटर से ऊपर तक जाती है और यही कारण है कि इसे दुनिया का सबसे ऊंचा लगातार आबाद सैन्य क्षेत्र भी कहा जाता है। यह केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।
नियंत्रित नागरिक पहुंच के साथ सियाचिन अब भारत के पर्यटन परिदृश्य में एक नई, गंभीर और जिम्मेदार श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है। यह यात्रा आराम या मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि अनुशासन, सहनशीलता और सम्मान के लिए है। जो भारतीय यात्री नियमों, ऊंचाई और पर्यावरण की सीमाओं को समझते हुए यहां पहुंचते हैं, उनके लिए सियाचिन केवल एक गंतव्य नहीं, बल्कि जीवन भर के लिए दृष्टिकोण बदल देने वाला अनुभव बन जाता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

