भारतीय ज्योतिष और तंत्र परंपरा में रत्नों का विशेष महत्व रहा है. प्राचीन काल से ही ग्रह दोषों की शांति, सौभाग्य वृद्धि और जीवन की बाधाओं के निवारण के लिए रत्न धारण की परंपरा चली आ रही है. लेकिन बदलते समय के साथ जहां रत्नों की लोकप्रियता बढ़ी है, वहीं उनके सही चयन और उचित धारण को लेकर भ्रांतियां भी तेजी से फैल रही हैं. ज्योतिष विशेषज्ञों का कहना है कि रत्न केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि शास्त्र सम्मत नियमों और मानकों के अनुरूप ही धारण किए जाने चाहिए, अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की संभावना भी बन सकती है.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी भी रत्न को धारण करने का एक निश्चित मापदंड होता है. यह मापदंड जातक के शरीर के वजन से जुड़ा माना गया है. सामान्यतः यह माना जाता है कि किसी भी रत्न का अधिकतम वजन जातक के शरीर के वजन का सवाया यानी एक चौथाई अधिक तक ही होना चाहिए. उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति का वजन 60 किलोग्राम है, तो उसके लिए रत्न का वजन निर्धारित सीमा के भीतर ही होना चाहिए. इससे अधिक वजन का रत्न धारण करना शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता. विशेषज्ञों के अनुसार रत्न की ऊर्जा सीधे तौर पर व्यक्ति के शरीर और मन पर प्रभाव डालती है, इसलिए उसका संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है.
केवल वजन ही नहीं, बल्कि रत्न की ग्रेविटी यानी उसका विशिष्ट घनत्व भी एक महत्वपूर्ण कारक माना गया है. अत्यधिक ग्रेविटी वाला रत्न शरीर पर असामान्य प्रभाव डाल सकता है. ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि रत्न का प्रभाव तभी शुभ होता है जब उसकी ऊर्जा व्यक्ति की ग्रह स्थिति और शारीरिक संरचना के अनुरूप हो. यदि रत्न अत्यधिक भारी या असंतुलित ऊर्जा वाला है, तो इससे मानसिक अशांति, शारीरिक असहजता या अन्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं. इसी कारण शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि रत्न का चयन केवल उसके रंग, चमक या कीमत देखकर नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता, वजन और ग्रेविटी को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए.
रत्न विज्ञान में एक रोचक तथ्य यह भी सामने आता है कि सभी रत्न समान नियमों के अधीन नहीं आते. ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार केवल फिरोजा ही ऐसा रत्न है, जिसे मुस्लिम तंत्र परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है. मान्यता है कि फिरोजा ऐसा रत्न है जिसे किसी भी आकार या वजन में धारण किया जा सकता है. इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि फिरोजा की ऊर्जा अत्यंत सौम्य और संतुलित होती है, जो किसी भी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालती. इसी कारण मुस्लिम तंत्र और परंपराओं में फिरोजा को विशेष रूप से शुभ और सुरक्षित रत्न माना गया है.
इसके विपरीत, अन्य सभी वैदिक रत्नों के लिए कठोर मानक निर्धारित किए गए हैं. पन्ना, नीलम, माणिक्य, मूंगा, पुखराज, हीरा जैसे रत्नों को धारण करने से पहले कुंडली का गहन अध्ययन आवश्यक माना जाता है. वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक रत्न किसी न किसी ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है और यदि वह ग्रह कुंडली में अनुकूल स्थिति में नहीं है, तो संबंधित रत्न का धारण करना नुकसानदायक भी हो सकता है. इसलिए विशेषज्ञ बिना परामर्श के रत्न पहनने से बचने की सलाह देते हैं.
रत्न धारण को लेकर बाजार में फैली भ्रांतियों पर भी ज्योतिषाचार्यों ने चिंता जताई है. आजकल कई लोग केवल फैशन या दूसरों को देखकर भारी-भरकम और महंगे रत्न धारण कर लेते हैं. सोशल मीडिया और विज्ञापनों के माध्यम से यह धारणा बनाई जा रही है कि जितना बड़ा और भारी रत्न होगा, उतना ही अधिक प्रभावशाली होगा. विशेषज्ञों का कहना है कि यह सोच पूरी तरह गलत है. शास्त्रों में स्पष्ट है कि रत्न का प्रभाव उसके आकार से नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता, ग्रह संबंध और सही वजन से जुड़ा होता है.
ज्योतिष के जानकार बताते हैं कि रत्न धारण करने से पहले उसका परीक्षण भी आवश्यक है. कई परंपराओं में रत्न को कुछ दिनों तक शरीर के संपर्क में रखकर या कपड़े में बांधकर परखा जाता है. यदि इस दौरान किसी प्रकार की असहजता, बुरे सपने या नकारात्मक अनुभव होते हैं, तो उस रत्न को धारण न करने की सलाह दी जाती है. यह प्रक्रिया यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि रत्न की ऊर्जा व्यक्ति के अनुकूल है या नहीं.
विशेषज्ञों के अनुसार रत्न धारण का उद्देश्य जीवन में संतुलन और सकारात्मकता लाना है, न कि केवल आभूषण के रूप में उसे पहनना. इसलिए शास्त्र सम्मत नियमों की अनदेखी करना व्यक्ति के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है. यही कारण है कि अनुभवी ज्योतिषाचार्य हमेशा कुंडली परीक्षण, ग्रह दशा और जातक की शारीरिक व मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही रत्न सुझाते हैं.
फिरोजा को लेकर विशेष चर्चा इसलिए भी होती है क्योंकि यह रत्न न केवल मुस्लिम तंत्र, बल्कि कई अन्य संस्कृतियों में भी शुभ माना जाता है. इसे सुरक्षा, सौभाग्य और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव का प्रतीक माना गया है. शायद यही कारण है कि इसके वजन और आकार को लेकर कोई सख्त सीमा नहीं मानी जाती. इसके बावजूद विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि किसी भी रत्न को अंधविश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि समझदारी और ज्ञान के साथ धारण करना चाहिए.
रत्न धारण की परंपरा आस्था और विज्ञान का एक अनूठा संगम मानी जाती है. लेकिन यह तभी लाभकारी सिद्ध होती है, जब उसे शास्त्रीय नियमों और विशेषज्ञ सलाह के अनुरूप अपनाया जाए. वजन, ग्रेविटी और ग्रह स्थिति जैसे मानकों की अनदेखी करके धारण किया गया रत्न लाभ के बजाय हानि का कारण बन सकता है. ऐसे में आवश्यक है कि आमजन रत्नों को लेकर जागरूक हों और फैशन या भ्रम के बजाय सही मार्गदर्शन के आधार पर ही कोई निर्णय लें.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

