नई दिल्ली. देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित कानून संस्थानों में से एक, दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर (CLC) ने आवारा कुत्तों की समस्या के समाधान के लिए एक अभूतपूर्व और क्रांतिकारी मॉडल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश किया है. गुरुवार, 8 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान सीएलसी ने पुरजोर तरीके से कहा कि अब समय आ गया है जब जनता और शैक्षणिक संस्थानों को सरकारी नौकरशाही या नगर निगम के अधिकारियों के भरोसे बैठना बंद कर देना चाहिए. संस्थान ने अदालत को सुझाव दिया कि आवारा कुत्तों की समस्या को मानवीय तरीके से हल करने का सबसे सीधा और सरल रास्ता 'स्वयं सहायता' है. कैंपस लॉ सेंटर की फैकल्टी ने कोर्ट को बताया कि सरकारी तंत्र की निष्क्रियता और उदासीनता ने ही उन्हें अपने परिसर में एक 'एनिमल सेल' (पशु प्रकोष्ठ) शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जो आज एक सफल उदाहरण बन चुका है. यह दलील उस समय आई है जब देश भर में आवारा कुत्तों के हमलों और उनके प्रबंधन को लेकर एक बड़ी कानूनी और सामाजिक बहस छिड़ी हुई है.
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य रूप से 7 नवंबर 2025 के उस आदेश के इर्द-गिर्द केंद्रित थी, जिसमें शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को तत्काल हटाएं. अदालत ने आदेश दिया था कि इन कुत्तों को पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियम 2023 के तहत नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित आश्रय स्थलों में स्थानांतरित किया जाए. हालांकि, कैंपस लॉ सेंटर ने इस सरकारी व्यवस्था की एक बहुत ही भयावह और यथार्थवादी तस्वीर पेश की. संस्थान ने अदालत को सूचित किया कि पूरे भारत जैसे विशाल देश में केवल पांच सरकारी स्वामित्व वाले कुत्ते आश्रय स्थल हैं, जो चंडीगढ़, कानपुर, जम्मू, श्रीनगर और नोएडा में स्थित हैं. ऐसी स्थिति में नगर पालिकाओं के पास इन लाखों बेसहारा जानवरों को रखने के लिए न तो पर्याप्त जगह है और न ही संसाधन, जिसके कारण जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नहीं दिख रहा है.
कैंपस लॉ सेंटर ने अपनी दलील में इस बात पर जोर दिया कि सरकारी मशीनरी और नौकरशाही अक्सर फाइलों और नियमों के जाल में उलझी रहती है, जिससे समस्याओं का समाधान होने के बजाय वे और जटिल हो जाती हैं. सीएलसी के प्रतिनिधि ने कहा कि अगर हर बड़ा संस्थान और जागरूक नागरिक समाज खुद पहल करे और अपने स्तर पर 'एनिमल सेल' स्थापित करे, तो कुत्तों और मनुष्यों के बीच के संघर्ष को काफी हद तक कम किया जा सकता है. संस्थान का मानना है कि स्थानीय स्तर पर ही इन जानवरों की देखभाल, टीकाकरण और नसबंदी की निगरानी की जा सकती है, जिससे वे हिंसक नहीं होंगे और समाज के साथ सामंजस्य बिठा सकेंगे. यह मॉडल न केवल पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की भावना के अनुरूप है, बल्कि यह नागरिक जिम्मेदारी का एक नया मानक भी स्थापित करता है.
सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों और बुजुर्गों को निशाना बनाने की हृदय विदारक खबरें सामने आई हैं. दूसरी ओर, पशु अधिकार कार्यकर्ता भी इन बेजुबान जानवरों के साथ होने वाली क्रूरता को लेकर आवाज उठाते रहे हैं. कैंपस लॉ सेंटर ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने अपने परिसर में विद्यार्थियों और शिक्षकों को साथ जोड़कर एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जो सरकारी मदद के बिना काम कर रही है. इसमें आवारा कुत्तों की पहचान की जाती है, उनका रिकॉर्ड रखा जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि वे परिसर में रहने वाले लोगों के लिए खतरा न बनें. सीएलसी का यह सुझाव उन लाखों लोगों के लिए एक नई दिशा हो सकता है जो रोजमर्रा की जिंदगी में इन समस्याओं से जूझते हैं और नगर निगमों के चक्कर काटकर थक चुके हैं.
कानून के इस प्रतिष्ठित केंद्र ने साफ तौर पर कहा कि जब तक हम पूरी तरह से सरकारी आश्रय स्थलों पर निर्भर रहेंगे, यह समस्या कभी हल नहीं होगी क्योंकि मौजूदा बुनियादी ढांचा जरूरतों के मुकाबले नगण्य है. केवल पांच शहरों में सरकारी शेल्टर होम होना इस बात का प्रमाण है कि राज्य सरकारें इस मुद्दे को लेकर कितनी लापरवाह रही हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के 7 नवंबर के आदेश का पालन तभी संभव है जब शैक्षणिक संस्थान और बड़े सार्वजनिक कार्यालय खुद आगे आएं और अपने परिसर के भीतर ही पशु प्रबंधन की जिम्मेदारी उठाएं. इस सुनवाई ने पूरे देश का ध्यान इस ओर खींचा है कि क्या अब समय आ गया है जब हमें नागरिक समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी बैसाखियों को छोड़ आत्मनिर्भरता का रास्ता अपनाना चाहिए. कैंपस लॉ सेंटर की इस पहल को कानूनविदों और विशेषज्ञों द्वारा एक व्यावहारिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है जो भविष्य में नीति निर्धारण का आधार बन सकता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

