हिंदी साहित्य के दैदीप्यमान नक्षत्र और ‘पहल’ के सारथी ज्ञानरंजन का महाप्रयाण,जबलपुर में थमी एक युगांतकारी सांस

हिंदी साहित्य के दैदीप्यमान नक्षत्र और ‘पहल’ के सारथी ज्ञानरंजन का महाप्रयाण,जबलपुर में थमी एक युगांतकारी सांस

प्रेषित समय :08:28:36 AM / Thu, Jan 8th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. हिंदी साहित्य के एक दैदीप्यमान नक्षत्र और मूल्यों की पत्रकारिता के अडिग स्तंभ ज्ञानरंजन अब स्मृतियों में शेष रह गए हैं. मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर को अपनी कर्मस्थली बनाने वाले यशस्वी कथाकार और सुप्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'पहल' के संपादक ज्ञानरंजन जी का बुधवार की रात 10:30 बजे निधन हो गया. उनके निधन की सूचना मिलते ही समूचे देश के साहित्यिक और सांस्कृतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई है. ज्ञान जी पिछले कुछ वर्षों से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे थे, लेकिन उनका मानसिक तेज और नैतिक बल अंत तक अक्षुण्ण रहा. उनके परिजनों के अनुसार, उनकी अंतिम यात्रा गुरुवार सुबह 11:30 बजे उनके राम  नगर, आधारताल स्थित निवास स्थान से ग्वारीघाट मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान करेगी, जहां नर्मदा के तट पर उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी.

ज्ञानरंजन जी का जाना केवल एक व्यक्ति का अवसान नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के उस प्रखर युग का अंत है जिसने आधी सदी से अधिक समय तक अपनी लेखनी और संपादकत्व से रचनाधर्मिता को संस्कारित किया. वे उन विरल लेखकों में से थे जिन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों, छटपटाहटों और जटिलताओं को एक नई भाषा और तेवर प्रदान किए. 'पिता', 'घंटा' और 'फेंस के इधर-उधर' जैसी उनकी रचनाएं आज भी कथा-शिल्प और मानवीय संवेदना के उच्चतम मानक मानी जाती हैं. उन्होंने 1960 के बाद की हिंदी कहानी को उस समय नई दिशा दी जब साहित्य वैचारिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था. उनके जाने से साहित्य जगत ने एक ऐसा मार्गदर्शक खो दिया है, जिसकी छत्रछाया में जाने कितने कवियों, लेखकों और आलोचकों ने अपनी पहचान बनाई.

ज्ञानरंजन जी की सबसे बड़ी उपलब्धि 'पहल' पत्रिका का संपादन रही, जो महज एक पत्रिका न होकर एक जीवंत सांस्कृतिक आंदोलन था. जबलपुर जैसे शहर में रहकर उन्होंने इस पत्रिका के माध्यम से जो वैचारिक विमर्श खड़ा किया, उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी साहित्य की साख बढ़ाई. 125 अंकों तक 'पहल' का संपादन करते हुए उन्होंने कभी गुणवत्ता से समझौता नहीं किया. साहित्य के इस अनथक साधक ने अपने निजी हितों की चिंता छोड़कर अपना पूरा जीवन दूसरों की प्रतिभा को निखारने और उदात्त सांस्कृतिक प्रयोजनों की सिद्धि में खपा दिया. उनकी संपादकीय दृष्टि इतनी खरी थी कि वे उत्कृष्ट केवल उसी को मानते थे जो संघर्षों की आंच में तपकर निकला हो. उन्होंने हमेशा युवा रचनाकारों को यह मंत्र दिया कि ताकतवर लोगों के प्रभाव में आए बिना वही लिखें जो सही हो.

उनके व्यक्तित्व का सबसे साहसी पक्ष उनका वह नैतिक बल था, जिसके सामने सत्ता के केंद्र और साहित्य के बड़े-बड़े मठाधीश भी बौने नजर आते थे. उन्होंने हमेशा दो-टूक सच कहने का साहस दिखाया, चाहे वह नामवर सिंह जैसी दिग्गज हस्तियों पर की गई उनकी बेबाक टिप्पणियां हों या समकालीन राजनीति पर उनके विचार. वे एक ऐसे स्वाभिमानी रचनाकार थे जिन्हें कभी सरकारी सम्मानों या पुरस्कारों की लालसा नहीं रही. जब उनसे साहित्य अकादमी पुरस्कार के बारे में पूछा जाता, तो वे बड़ी सहजता से कहते थे कि महादेवी वर्मा जैसी विभूति से हारना भी उनके लिए सम्मान की बात है. यही वह विनयशीलता और संजीदगी थी जिसने उन्हें एक लीजेंड बनाया.

आज जब ज्ञानरंजन जी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, तो हिंदी समाज खुद को अकेला महसूस कर रहा है. उन्होंने अस्वस्थता के कारण 'पहल' का प्रकाशन भले ही बंद कर दिया था, लेकिन उनके द्वारा जलाई गई वैचारिक मशाल आज भी हजारों लेखकों का मार्ग प्रशस्त कर रही है. उनका निधन हिंदी की उस गौरवशाली परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी का टूट जाना है, जिसने साहित्य को समाज के परिवर्तन का औजार माना था. जबलपुर के ग्वारीघाट पर आज जब वे पंचतत्व में विलीन होंगे, तब केवल एक शरीर विदा नहीं होगा, बल्कि एक ऐसी विचारधारा को अंतिम विदाई दी जाएगी जिसने सत्य और नैतिकता को कभी झुकने नहीं दिया. हिंदी गद्य और संपादन की दुनिया में ज्ञानरंजन एक ऐसे चिरस्थायी हस्ताक्षर बने रहेंगे जिनकी कमी आने वाले दशकों तक खलेगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-