चेन्नई/नई दिल्ली.तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर चल रही बातचीत उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एआईएडीएमके नेतृत्व के सामने केवल सीटों के बंटवारे से आगे बढ़कर सत्ता में औपचारिक हिस्सेदारी की मांग रख दी. दिल्ली में बुधवार देर रात हुई बंद कमरे की बैठक में अमित शाह ने एआईएडीएमके के महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पादी के पलानीस्वामी से स्पष्ट रूप से कहा कि यदि एआईएडीएमके-नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आता है तो भारतीय जनता पार्टी को मंत्रिमंडल में कम से कम तीन स्थान दिए जाएं. इसके साथ ही बीजेपी और उसके सहयोगियों के लिए 234 सदस्यीय विधानसभा में कुल 56 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग भी रखी गई.
सूत्रों के अनुसार यह मांग तमिलनाडु की राजनीति में अब तक की परंपराओं से काफी अलग मानी जा रही है. राज्य में लंबे समय से द्रविड़ दलों के वर्चस्व वाली राजनीति में राष्ट्रीय दलों की भूमिका सीमित रही है और गठबंधन आमतौर पर सीटों के बंटवारे तक ही सिमटे रहे हैं. सत्ता में औपचारिक भागीदारी की मांग ने एआईएडीएमके के भीतर और राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है.
बैठक में शामिल सूत्रों का कहना है कि एडप्पादी के पलानीस्वामी ने अमित शाह के समक्ष अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं. ईपीएस ने साफ तौर पर कहा कि सत्ता साझा करने के किसी भी संकेत से ही एआईएडीएमके के पारंपरिक मतदाता आधार में भ्रम और असंतोष पैदा हो सकता है. उनका तर्क था कि तमिलनाडु की राजनीति में यह धारणा मजबूत है कि राज्य की सत्ता पर क्षेत्रीय दलों का अधिकार होना चाहिए और यदि बीजेपी को मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी देने का संकेत भी दिया गया तो विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बना सकता है.
ईपीएस ने यह भी आशंका जताई कि बीजेपी के साथ सत्ता साझेदारी की सार्वजनिक चर्चा से एआईएडीएमके की स्वतंत्र पहचान कमजोर हो सकती है और पार्टी को द्रविड़ विचारधारा से समझौता करने के आरोपों का सामना करना पड़ सकता है. सूत्रों के अनुसार उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव से पहले इस तरह की किसी व्यवस्था का संकेत देना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है.
हालांकि, अमित शाह ने बैठक में बीजेपी के तर्क मजबूती से रखे. उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में बीजेपी का संगठनात्मक आधार और वोट शेयर लगातार बढ़ रहा है और पार्टी अब केवल जूनियर सहयोगी की भूमिका में सीमित नहीं रहना चाहती. शाह ने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की मजबूती के लिए तमिलनाडु में बीजेपी की स्पष्ट और सम्मानजनक हिस्सेदारी आवश्यक है. सीटों के संदर्भ में उन्होंने 56 सीटों की मांग को “यथार्थवादी और राजनीतिक रूप से उचित” बताया.
सूत्र बताते हैं कि शाह ने यह भी कहा कि सत्ता में हिस्सेदारी की मांग केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह गठबंधन की दीर्घकालिक स्थिरता और जिम्मेदारी साझा करने का संकेत होगी. उनके अनुसार यदि गठबंधन सरकार बनती है तो नीति निर्धारण और प्रशासनिक फैसलों में बीजेपी की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है.
इस बातचीत के बाद दोनों पक्षों के बीच किसी अंतिम सहमति की घोषणा नहीं की गई, लेकिन यह स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी अब तमिलनाडु में अपने लिए बड़ी राजनीतिक भूमिका चाहती है. एआईएडीएमके के भीतर भी इस मांग को लेकर अलग-अलग राय उभरने लगी है. पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि बीजेपी के साथ गठबंधन बनाए रखना चुनावी गणित के लिहाज से जरूरी है, जबकि अन्य नेता इसे पार्टी की स्वायत्तता के लिए खतरा मान रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मांग केवल गठबंधन की शर्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की राजनीति में बीजेपी की दीर्घकालिक रणनीति को दर्शाती है. पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी ने राज्य में संगठन विस्तार, सामाजिक समीकरण साधने और वैचारिक हस्तक्षेप के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की है. मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी की मांग उसी रणनीति का अगला कदम मानी जा रही है.
विपक्षी दलों ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इसे “दिल्ली से तमिलनाडु की राजनीति नियंत्रित करने की कोशिश” करार दिया है. उनका कहना है कि एआईएडीएमके यदि इस मांग को स्वीकार करती है तो उसे जनता के सामने इसका जवाब देना होगा.
फिलहाल, एआईएडीएमके और बीजेपी के बीच बातचीत जारी रहने की संभावना है. सूत्रों का कहना है कि ईपीएस अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और कोर कमेटी से विचार-विमर्श के बाद ही किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचेंगे. वहीं, बीजेपी भी अपनी मांगों पर अड़ी हुई दिखाई दे रही है, जिससे आने वाले दिनों में गठबंधन की दिशा और स्वरूप को लेकर सस्पेंस बना हुआ है.
यह साफ है कि अमित शाह और ईपीएस की इस बंद कमरे की बैठक ने तमिलनाडु की राजनीति में एक नया संकेत दे दिया है. चुनावी रणभूमि में उतरने से पहले गठबंधन की शर्तों को लेकर जो खींचतान सामने आई है, वह न केवल एनडीए के भविष्य को प्रभावित करेगी, बल्कि राज्य की सत्ता की तस्वीर को भी नई दिशा दे सकती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

