जबलपुर. प्रदेश की न्यायिक राजधानी और संस्कारधानी के रूप में विख्यात शहर इन दिनों केवल अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए नहीं बल्कि अपनी सड़कों पर व्याप्त अराजकता और दमघोंटू यातायात व्यवस्था के कारण सुर्खियों में है. शहर की यातायात व्यवस्था और सड़कों की हालत को लेकर लंबे समय से उठती रही शिकायतें अब सोशल मीडिया के नए मंच रेडिट पर खुलकर सामने आने लगी हैं. स्थानीय रेडिट यूज़र्स द्वारा साझा किए जा रहे ड्राइविंग अनुभव इन दिनों जमकर चर्चा में हैं, जिनमें खराब सड़कों, अव्यवस्थित ट्रैफिक, अधूरी मरम्मत, अतिक्रमण और नियमों की खुलेआम अनदेखी को लेकर तीखी नाराज़गी व्यक्त की जा रही है. यह ऑनलाइन चर्चा अब महज़ निजी अनुभवों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि शहर की यातायात व्यवस्था पर एक सामूहिक जनमत के रूप में उभर रही है.
शहर के युवाओं और पेशेवर नागरिकों द्वारा साझा किए जा रहे ये अनुभव बताते हैं कि जबलपुर की सड़कों पर वाहन चलाना अब किसी खतरनाक स्टंट से कम नहीं रह गया है. रेडिट पर चल रहे विभिन्न थ्रेड्स में लोग इस बात पर गहरी नाराजगी जता रहे हैं कि कैसे शहर के मुख्य चौराहों जैसे कि रसल चौक, सिविक सेंटर और दमोह नाका पर नियमों की धज्जियां उड़ाना एक आम बात हो गई है. यूजर्स का कहना है कि जबलपुर में ट्रैफिक सिग्नल का होना न होना बराबर है क्योंकि यहां के वाहन चालक लाल बत्ती को महज एक सुझाव मानकर बेधड़क पार कर जाते हैं.
रेडिट पर ‘Jabalpur Driving Experience’, ‘MP Roads Reality’ और ‘Daily Commute Nightmares’ जैसे थ्रेड्स में सैकड़ों यूज़र्स ने अपने अनुभव साझा किए हैं. कई पोस्ट में लिखा गया है कि शहर की प्रमुख सड़कों पर गड्ढे, उभरे हुए मैनहोल कवर और अचानक खत्म हो जाने वाले डिवाइडर ड्राइविंग को जोखिम भरा बना रहे हैं. खास तौर पर अधारताल, रांझी, गढ़ा, विजय नगर, मदन महल और सिविक सेंटर इलाके का ज़िक्र बार-बार सामने आ रहा है, जहां रात के समय वाहन चलाना किसी चुनौती से कम नहीं बताया जा रहा.
रेडिट यूज़र्स का कहना है कि सड़कों पर कहीं संकेतक नहीं हैं तो कहीं स्पीड ब्रेकर बिना पेंट या चेतावनी बोर्ड के बने हुए हैं. कई लोगों ने यह भी लिखा कि बारिश के बाद सड़कों पर जलभराव की स्थिति बन जाती है, जिससे गड्ढों का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है और दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. दोपहिया वाहन चालकों ने फिसलन और अचानक ब्रेक लगाने की मजबूरी को सबसे बड़ा खतरा बताया है.
ड्राइविंग अनुभवों में ट्रैफिक पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. कुछ यूज़र्स ने लिखा कि नो-एंट्री, वन-वे और हेलमेट जैसे नियम आम लोगों पर तो सख्ती से लागू होते हैं, लेकिन ऑटो, ई-रिक्शा और कुछ निजी वाहनों को खुली छूट मिली हुई है. रेडिट पर साझा वीडियो और तस्वीरों में बिना नंबर प्लेट, गलत दिशा में दौड़ते वाहन और चौराहों पर जाम की स्थिति साफ दिखाई दे रही है.
इस ऑनलाइन बहस में शहर के बाहर से आने वाले लोगों की राय भी सामने आई है. कई यूज़र्स ने लिखा कि जबलपुर एक सुंदर और ऐतिहासिक शहर है, लेकिन यहां की ड्राइविंग संस्कृति और सड़क प्रबंधन पर्यटकों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है. कुछ ने इंदौर, भोपाल और नागपुर जैसे शहरों से तुलना करते हुए कहा कि जबलपुर में सड़क निर्माण तो होता है, लेकिन रखरखाव और प्लानिंग की भारी कमी है.
रेडिट की खास बात यह है कि यहां लोग नाम और पहचान से परे होकर बेझिझक अपनी बात रखते हैं. इसी कारण कई सरकारी व्यवस्थाओं पर सीधे सवाल उठाए जा रहे हैं. कुछ यूज़र्स ने नगर निगम और लोक निर्माण विभाग पर आरोप लगाया कि सड़क निर्माण के बाद गुणवत्ता जांच नहीं होती और ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं की जाती. वहीं कुछ पोस्ट में यह भी कहा गया कि बार-बार खुदाई और पैचवर्क ने सड़कों को स्थायी रूप से खराब कर दिया है.
चर्चा के दौरान कुछ सकारात्मक सुझाव भी सामने आए हैं. रेडिट यूजर्स ने स्मार्ट सिग्नल सिस्टम, सड़कों पर रिफ्लेक्टर, नियमित रोड ऑडिट, और शिकायत दर्ज कराने के लिए एक प्रभावी डिजिटल प्लेटफॉर्म की मांग की है. कई लोगों का मानना है कि यदि प्रशासन इन ऑनलाइन चर्चाओं को गंभीरता से ले, तो ये फीडबैक शहर के लिए एक उपयोगी रोडमैप बन सकता है.
सोशल मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि रेडिट जैसे मंच अब सिर्फ मनोरंजन या वैश्विक मुद्दों तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि स्थानीय प्रशासन के लिए भी जनभावनाओं को समझने का अहम जरिया बनते जा रहे हैं. जबलपुर में ड्राइविंग को लेकर उठी यह डिजिटल आवाज़ इस बात का संकेत है कि नागरिक अब केवल शिकायत दर्ज कराकर चुप बैठने के बजाय सार्वजनिक विमर्श के ज़रिये जवाबदेही तय करना चाहते हैं.
रेडिट पर चल रही यह चर्चा जबलपुर की सड़कों और यातायात व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर पेश कर रही है. यह आक्रोश, अनुभव और सुझावों का ऐसा मिश्रण है जिसे नज़रअंदाज़ करना प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा. अगर समय रहते इन संकेतों को नहीं समझा गया, तो ऑनलाइन उठी यह आवाज़ जल्द ही ज़मीनी आंदोलन का रूप भी ले सकती है.
इस डिजिटल बहस में सबसे ज्यादा चर्चा शहर की सड़कों पर आवारा पशुओं के जमावड़े और ई-रिक्शा चालकों की मनमानी को लेकर हो रही है. रेडिट पर एक यूजर ने अपने वायरल पोस्ट में लिखा है कि जबलपुर में ड्राइविंग का मतलब है कि आपको हर सेकंड अपनी जान और अपनी गाड़ी दोनों को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. लोग शिकायत कर रहे हैं कि बीच सड़क पर खड़े होने वाले ऑटो और बसें जाम की सबसे बड़ी वजह हैं लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती. वहीं दूसरी ओर 'फ्लाईओवर' के निर्माण कार्यों के कारण डाइवर्ट किए गए रास्तों ने कोढ़ में खाज का काम किया है. मदन महल से लेकर दमोह नाका तक बन रहे फ्लाईओवर के कारण उड़ने वाली धूल और संकरी गलियों में फंसते भारी वाहनों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है. सोशल मीडिया पर लोग वीडियो साझा कर दिखा रहे हैं कि कैसे 10 मिनट का रास्ता अब 40 मिनट में तय हो रहा है और इस दौरान एंबुलेंस जैसी आपातकालीन सेवाएं भी जाम में फंसी रहती हैं.
जबलपुर के ट्रैफिक को लेकर जो सबसे कड़वा अनुभव साझा किया जा रहा है वह है 'रॉन्ग साइड' ड्राइविंग का बढ़ता चलन. रेडिट पर स्थानीय निवासियों ने लिखा है कि शहर की प्रमुख सड़कों पर लोग शॉर्टकट के चक्कर में विपरीत दिशा से वाहन चलाते हैं जिससे आए दिन गंभीर सड़क हादसे हो रहे हैं. विशेषकर नौजवानों द्वारा की जा रही रफ-ड्राइविंग और शोर मचाने वाले साइलेंसरों ने रिहायशी इलाकों की शांति भंग कर दी है. यातायात पुलिस द्वारा चलाए जाने वाले चालानी अभियानों को लेकर भी जनता का रुख काफी तीखा है. लोगों का आरोप है कि पुलिस का ध्यान केवल कागजात और हेलमेट चेक करने पर रहता है जबकि असल समस्या यानी 'ट्रैफिक मैनेजमेंट' और 'अतिक्रमण' को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है. चौराहों पर पुलिस की मौजूदगी के बावजूद लोग बेखौफ होकर नियमों का उल्लंघन करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि पकड़े जाने पर भी वे आसानी से बच निकलेंगे.
सड़कों की खस्ताहाल हालत और जलभराव की समस्या ने भी इस चर्चा में आग में घी डालने का काम किया है. रेडिट पर यूजर्स उन गड्ढों की तस्वीरें साझा कर रहे हैं जो अब छोटे तालाबों का रूप ले चुके हैं और रात के समय अंधेरे में जानलेवा साबित हो रहे हैं. स्मार्ट सिटी के दावों के बीच सड़कों का यह हाल जबलपुर वासियों को कचोट रहा है. इस सोशल मीडिया ट्रेंड ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब जनता केवल कागजी सुधारों से संतुष्ट होने वाली नहीं है.
लोग मांग कर रहे हैं कि जबलपुर में आधुनिक 'इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम' ) को सख्ती से लागू किया जाए और अतिक्रमणकारियों पर बुलडोजर चलाने के साथ-साथ उन पर भारी जुर्माना भी लगाया जाए. शहर के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि यदि जल्द ही यातायात व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया गया तो जबलपुर की सड़कें केवल दुर्घटनाओं का अड्डा बनकर रह जाएंगी.
इस समय रेडिट पर शुरू हुई यह चिंगारी अब फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप्स तक पहुंच चुकी है जिससे प्रशासनिक गलियारों में भी बेचैनी महसूस की जा रही है. अब देखना यह है कि क्या यह डिजिटल आक्रोश सड़कों पर कोई वास्तविक बदलाव ला पाता है या फिर संस्कारधानी के लोग इसी तरह जाम और असुरक्षा के बीच अपनी किस्मत को कोसते रहेंगे.