तेलंगाना में आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या ने गांवों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया

तेलंगाना में आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या ने गांवों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया

प्रेषित समय :22:40:01 PM / Wed, Jan 14th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

हैदराबाद/तेलंगाना: तेलंगाना के कई जिलों में आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्या ने ग्रामीणों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच खलबली मचा दी है। कमारेड्डी और हनमकोंडा जिलों में दर्जनों, बल्कि सैकड़ों कुत्तों की मौत की खबरें सामने आई हैं। स्थानीय पुलिस के अनुसार, केवल कमारेड्डी जिले में इस सप्ताह 100 से अधिक कुत्तों की हत्या की गई, जबकि हनमकोंडा जिले में यह संख्या 120 से ऊपर बताई जा रही है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने नए साल के मौके पर अपने गांवों में कुत्तों की समस्या को खत्म करने का लक्ष्य रखा था। भवानिपेट गांव के 37 वर्षीय एक दुकानदार ने बताया, "हमारे गांव का नया साल का संकल्प यही था कि कुत्तों के उत्पीड़न से छुटकारा पाया जाए।" इस "समाधान" के तहत, गांववासियों ने स्थानीय फिक्सर और पेशेवर पशु नियंत्रकों की मदद से आवारा कुत्तों को मारने की योजना बनाई।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, तेलंगाना पुलिस ने अब इस मामले में 15 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इसमें हनमकोंडा और कमारेड्डी जिलों के छह ग्राम सरपंच भी शामिल हैं। उन्हें भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) की धारा 325 (जानवरों की हत्या या जहर देने) और पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया है।

ग्रामीणों का कहना है कि कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी और उनके चलते गांव में बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा खतरे में थी। उन्होंने यह भी बताया कि कुत्तों के आतंक ने लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी प्रभावित कर दी थी। लेकिन पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कदम की तीखी आलोचना की है और इसे "क्रूर और गैरकानूनी" बताया है।

पशु अधिकार संगठनों का कहना है कि आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान केवल सामूहिक हत्या से नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि टीकाकरण, नसबंदी और समाज में जागरूकता अभियान के जरिए ही स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। एक अधिकारकर्मी ने बताया, "कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक और मानवीय तरीके अपनाने होंगे। यह सामूहिक हत्या किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।"

कमारेड्डी और हनमकोंडा के ग्रामीणों में इस कार्रवाई को लेकर डर का माहौल है। कई परिवारों ने पुलिस के सख्त कदम की सराहना करते हुए इसे "जरूरी कार्रवाई" बताया, लेकिन वहीं कई लोग इस हिंसक तरीके से नाराज भी हैं। कुछ ग्रामीणों ने मीडिया से कहा कि उन्होंने यह कदम मजबूरी में उठाया, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में कुत्तों ने बच्चों और घरों में लगातार हमला किया।

स्थानीय प्रशासन ने इस घटना की जांच शुरू कर दी है। पुलिस अधिकारी अजय कुमार ने बताया कि मामले में फिक्सर और गांव के सरपंच शामिल हैं और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई जारी है। उन्होंने यह भी कहा कि आगे ऐसे किसी भी गैरकानूनी कार्य को रोकने के लिए विशेष निगरानी बढ़ाई जाएगी।

जानकारी के अनुसार, कमारेड्डी और हनमकोंडा जिलों में पिछले साल से आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। कई बार लोगों ने शिकायत की थी कि कुत्तों के हमलों से कई घायल हुए हैं। इस सप्ताह हुई सामूहिक हत्या से पहले भी गांवों में स्थानीय लोगों ने कुत्तों के खिलाफ विरोध जताया था।

इस घटना के सोशल मीडिया पर भी विरोध देखा गया। पशु अधिकारकर्मी और नागरिक संगठनों ने ट्विटर और फेसबुक पर हैशटैग के साथ विरोध जताया और प्रशासन से कुत्तों की हिंसा रोकने के मानवीय उपाय अपनाने की अपील की।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में आवारा कुत्तों की समस्या केवल तेलंगाना तक सीमित नहीं है। पूरे देश में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या ने कई शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा और स्वास्थ्य पर प्रभाव डाला है। WHO और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार, नियंत्रित नसबंदी और टीकाकरण के जरिए ही कुत्तों की संख्या स्थिर की जा सकती है।

तेलंगाना पुलिस ने 15 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए उन्हें नोटिस जारी किया है और आगे की कानूनी प्रक्रिया तेज़ करने की योजना बनाई है। प्रशासन का कहना है कि कानून के तहत किसी भी जानवर की हत्या अपराध है और दोषियों को सजा दी जाएगी।

स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही। कुछ ग्रामीणों ने कहा कि यह कार्रवाई तत्काल समस्या का समाधान कर सकती है, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव के लिए मानवीय और वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाने चाहिए। कई बच्चों और बुजुर्गों ने इस कार्रवाई के बाद थोड़ी राहत महसूस की, क्योंकि अब कुत्तों का आतंक कम हुआ।

पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगर भविष्य में इस तरह की सामूहिक हत्या दोबारा हुई, तो वे अदालत में मामला दायर करेंगे और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाएंगे। उनका कहना है कि यह न केवल एक कानूनी मुद्दा है बल्कि मानवता और संवेदनशीलता का भी मामला है।

तेलंगाना में यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर इसका व्यापक असर देखा जा रहा है। विशेषज्ञ और नागरिक संगठनों का मानना है कि आवारा कुत्तों की समस्या का स्थायी समाधान केवल मार-पीट और हत्या से नहीं हो सकता।

इस घटना ने पूरे राज्य में कानून और व्यवस्था, पशु कल्याण और ग्रामीण सुरक्षा के बीच संतुलन की चुनौती सामने रख दी है। स्थानीय प्रशासन, पुलिस और सरकार अब इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए मजबूर हो गए हैं।

तेलंगाना के इस मसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे और मानवीय उपायों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। भविष्य में सरकार और प्रशासन इस दिशा में नई नीतियां और जागरूकता अभियान शुरू करने की योजना बना रहे हैं, ताकि हिंसा और क्रूरता से बचा जा सके और सभी पक्ष सुरक्षित रह सकें।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-