जबलपुर. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट के एक गंभीर मामले में आरोपी को कानूनी शिकंजे से बचाने के लिए न्यायालय के समक्ष फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करने के प्रयास पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए न्याय व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. जबलपुर स्थित मुख्य पीठ के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की युगलपीठ ने एक अपील की सुनवाई के दौरान पाया कि बचाव पक्ष द्वारा पेश की गई उम्र संबंधी सर्वे रिपोर्ट प्रथम दृष्टया फर्जी और हेरफेर से भरी हुई प्रतीत हो रही है. इस मामले में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी को सजा से बचाने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने साठगांठ कर न्यायालय को गुमराह करने की कोशिश की और झूठे साक्ष्य गढ़े. हाईकोर्ट ने इसे न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप मानते हुए छतरपुर के जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) को सख्त निर्देश जारी किए हैं कि संबंधित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की भूमिका की सूक्ष्मता से जांच की जाए. न्यायालय ने इस जांच के लिए 30 दिनों की समय सीमा निर्धारित की है और आदेश दिया है कि यदि सर्वे रिपोर्ट फर्जी पाई जाती है, तो दोषी कार्यकर्ता के विरुद्ध तत्काल कड़ी कानूनी और विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए.
इस पूरे कानूनी घटनाक्रम की जड़ें छतरपुर निवासी अनिल अग्निहोत्री द्वारा दायर उस अपील में छिपी हैं, जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को चुनौती दी थी. गौरतलब है कि जिला न्यायालय के विशेष न्यायाधीश ने साल 2023 में अनिल अग्निहोत्री को बलात्कार, अपहरण और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी करार देते हुए उसे उम्रकैद की अधिकतम सजा सुनाई थी. अपनी सजा को कम कराने या निर्दोष सिद्ध करने के लिए अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के सामने एक दलील पेश की कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग नहीं बल्कि बालिग थी. इस तर्क को पुख्ता करने के लिए बचाव पक्ष ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता द्वारा वर्ष 2005 में किए गए एक कथित सर्वे की रिपोर्ट को मुख्य दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया. इस रिपोर्ट के आधार पर यह दावा किया गया कि साल 2005 में पीड़िता की उम्र तीन वर्ष थी, जिसके अनुसार घटना के वक्त उसकी आयु 18 वर्ष से अधिक हो चुकी थी. अपीलकर्ता का मुख्य आधार यही था कि यदि पीड़िता बालिग थी, तो उस पर पॉक्सो एक्ट के कड़े प्रावधान लागू नहीं होने चाहिए थे और विशेष न्यायाधीश ने उसे नाबालिग मानकर सजा देने में गंभीर न्यायिक त्रुटि की है.
हालांकि, जब हाईकोर्ट की युगलपीठ ने बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों का गहराई से अवलोकन किया, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए जो किसी सोची-समझी साजिश की ओर इशारा कर रहे थे. जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन ने पाया कि जिस सर्वे रिपोर्ट के कवर पेज पर पंजीयन क्रमांक 'एक' अंकित है, उस पर न तो आंगनबाड़ी सहायिका का नाम है और न ही सेक्टर सुपरवाइजर का कोई अता-पता दिया गया है. दस्तावेजों में मौजूद विसंगतियां यहीं खत्म नहीं हुईं, बल्कि यह भी देखा गया कि कथित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मालती अहिरवार के हस्ताक्षर भी वहां मौजूद नहीं थे. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जन्म की तारीख से संबंधित कॉलम संख्या दस पूरी तरह से खाली पड़ा था. इन तकनीकी खामियों और विरोधाभासों ने न्यायालय को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि यह दस्तावेज केवल आरोपी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से बाद में तैयार किया गया है. कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने न केवल लापरवाही बरती बल्कि कोर्ट के सामने झूठे सबूत पेश करके न्यायिक प्रक्रिया को दूषित करने का प्रयास किया है.
न्यायालय ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि यौन अपराधों जैसे संवेदनशील मामलों में उम्र का निर्धारण सजा के स्वरूप को पूरी तरह बदल देता है, इसलिए ऐसे दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर रत्ती भर भी संदेह न्याय की हत्या के समान है. युगलपीठ ने इस बात पर हैरानी जताई कि एक लोक सेवक होने के नाते आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने किस प्रकार इतने विरोधाभासों से भरे प्रमाण पत्र को न्यायालय में पेश करने की हिम्मत की. कोर्ट के इस कड़े रुख ने उन प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच हड़कंप मचा दिया है जो अक्सर अदालती मामलों में दस्तावेजों के साथ हेरफेर करने के आरोपी बनते रहे हैं. जिला कार्यक्रम अधिकारी छतरपुर को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि 30 दिनों के भीतर इस पूरे प्रकरण की परतों को खोला जाए और यह पता लगाया जाए कि क्या इस फर्जीवाड़े के पीछे कोई बड़ा गिरोह काम कर रहा था या यह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की व्यक्तिगत मिलीभगत थी.
उच्च न्यायालय का यह फैसला न केवल इस विशेष मामले के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भविष्य के लिए भी एक नजीर पेश करता है कि डिजिटल और डेटा के युग में किसी भी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ कर कानून को चकमा देना अब आसान नहीं होगा. पॉक्सो एक्ट की मूल भावना नाबालिगों को सुरक्षा प्रदान करना है और यदि फर्जी सर्वे रिपोर्टों के माध्यम से अपराधियों को 'बालिग' होने का लाभ दिया जाने लगा, तो यह कानून निष्प्रभावी हो जाएगा. हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह साक्ष्यों की पवित्रता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं करेगा. अब सबकी निगाहें छतरपुर प्रशासन की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि क्या आरोपी के साथ-साथ उसे बचाने की कोशिश करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को भी सलाखों के पीछे जाना होगा. इस आदेश ने यह भी संदेश दिया है कि सरकारी कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी को हल्के में न लें और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले हर दस्तावेज की सत्यता की जवाबदेही उन्हीं की होगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

