देश के करोड़ों बैंक और वित्तीय सेवा उपभोक्ताओं के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने एक अहम और दूरगामी फैसला लेते हुए शिकायत निवारण व्यवस्था को सख्त, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। वर्षों से यह शिकायत आम रही है कि बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के चक्कर लगाते-लगाते ग्राहक थक जाते हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का न तो समय पर समाधान होता है और न ही उन्हें संतोषजनक जवाब मिल पाता है। इन्हीं अनुभवों और बढ़ती शिकायतों को आधार बनाकर आरबीआई ने अब बैंकों और NBFC के भीतर ही एक मजबूत आंतरिक तंत्र विकसित करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं, जिनका सीधा लाभ आम ग्राहकों को मिलने वाला है।
आरबीआई द्वारा जारी इन निर्देशों के तहत अब विनियमित संस्थानों के भीतर आंतरिक लोकपाल की भूमिका को और अधिक स्पष्ट, प्रभावी और स्वतंत्र बनाया गया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि यदि शिकायतों का समाधान शुरुआती स्तर पर ही निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से हो जाए, तो ग्राहकों को बार-बार बाहरी मंचों या बैंकिंग लोकपाल के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह कदम न सिर्फ ग्राहकों का समय और ऊर्जा बचाएगा, बल्कि संस्थानों के प्रति भरोसा भी मजबूत करेगा।
नए नियमों के अनुसार, आंतरिक लोकपाल की नियुक्ति और उसके कामकाज के लिए स्पष्ट मापदंड तय किए गए हैं। यह व्यवस्था वाणिज्यिक बैंकों, स्मॉल फाइनेंस बैंकों, पेमेंट्स बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों, गैर-बैंक प्रीपेड भुगतान उपकरण जारीकर्ताओं और क्रेडिट सूचना कंपनियों पर लागू होगी। यानी बैंकिंग से लेकर डिजिटल पेमेंट और क्रेडिट रिपोर्टिंग तक, लगभग पूरा वित्तीय इकोसिस्टम इस दायरे में आ जाएगा। इससे यह संदेश साफ है कि ग्राहक संरक्षण अब किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे वित्तीय ढांचे में समान रूप से लागू होगा।
आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि आंतरिक लोकपाल कोई औपचारिक या नाममात्र की व्यवस्था नहीं होगी। इसके लिए ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति जरूरी होगी, जो या तो सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हो या सेवारत अधिकारी, जिसका पद संबंधित संस्था में जनरल मैनेजर के समकक्ष रहा हो। अनुभव के लिहाज से उम्मीदवार के पास बैंकिंग, गैर-बैंक वित्त, विनियमन, पर्यवेक्षण, भुगतान और निपटान प्रणाली, क्रेडिट सूचना या उपभोक्ता संरक्षण जैसे क्षेत्रों में कम से कम सात साल का ठोस अनुभव होना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शिकायतों की समीक्षा करने वाला व्यक्ति न सिर्फ तकनीकी रूप से सक्षम हो, बल्कि ग्राहक के नजरिए को भी समझ सके।
आंतरिक लोकपाल की भूमिका को लेकर आरबीआई ने यह भी साफ कर दिया है कि यह कार्यालय सीधे ग्राहकों से शिकायतें स्वीकार नहीं करेगा। उसका काम उन मामलों की समीक्षा करना होगा, जिनकी जांच पहले ही संबंधित बैंक या वित्तीय संस्था कर चुकी है, लेकिन या तो उनका समाधान आंशिक रूप से हुआ है या उन्हें पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। इस तरह आंतरिक लोकपाल संस्था के भीतर एक उच्चस्तरीय समीक्षा प्राधिकरण के रूप में काम करेगा, जो यह परखेगा कि शिकायत को निपटाने की प्रक्रिया निष्पक्ष थी या नहीं और ग्राहक के साथ कहीं अन्याय तो नहीं हुआ।
आरबीआई के मुताबिक, यह व्यवस्था इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि कई मामलों में देखा गया कि शुरुआती स्तर पर शिकायतों को बिना ठोस कारण के खारिज कर दिया जाता है या उनका समाधान टाल दिया जाता है। ग्राहक के पास तब या तो लंबा इंतजार करने का विकल्प होता है या फिर बाहरी मंचों पर जाने का। नए दिशा-निर्देशों के बाद अब संस्थानों पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे आंतरिक लोकपाल के माध्यम से हर खारिज या अधूरे समाधान वाली शिकायत की निष्पक्ष समीक्षा कराएं।
बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इससे न सिर्फ शिकायतों के निपटारे में समय की बचत होगी, बल्कि संस्थानों पर भी यह दबाव रहेगा कि वे पहली बार में ही शिकायतों का सही और न्यायसंगत समाधान करें। आंतरिक लोकपाल की मौजूदगी यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी स्तर पर लापरवाही या मनमानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सके।
ग्राहकों के नजरिए से देखें तो यह बदलाव बेहद अहम है। अक्सर देखा गया है कि आम उपभोक्ता बैंकिंग नियमों और प्रक्रियाओं से पूरी तरह परिचित नहीं होता, जबकि बैंक कर्मचारी तकनीकी पहलुओं का हवाला देकर शिकायत को टाल देते हैं। अब ऐसे मामलों में आंतरिक लोकपाल एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए यह देख सकेगा कि नियमों की व्याख्या सही ढंग से की गई या नहीं और ग्राहक के अधिकारों का सम्मान हुआ या नहीं।
आरबीआई के इस फैसले को व्यापक आर्थिक और सामाजिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। डिजिटल लेन-देन, ऑनलाइन लोन और फिनटेक सेवाओं के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच शिकायतों की संख्या भी बढ़ी है। ऐसे में एक मजबूत आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र न केवल उपभोक्ता संरक्षण के लिए जरूरी है, बल्कि वित्तीय प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए भी अहम है। केंद्रीय बैंक का यह कदम संकेत देता है कि वह केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी उतना ही जोर दे रहा है।
कुल मिलाकर, आरबीआई के नए निर्देश ग्राहकों के लिए राहत की खबर लेकर आए हैं। इससे बैंक और NBFC दोनों को यह संदेश गया है कि अब शिकायतों को नजरअंदाज करना या टालना आसान नहीं होगा। आंतरिक लोकपाल की सशक्त भूमिका के जरिए हर उस शिकायत की समीक्षा होगी, जिसे पहले अधूरा या खारिज कर दिया गया था। आने वाले समय में यदि यह व्यवस्था सही ढंग से लागू होती है, तो बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं में ग्राहक भरोसे का स्तर नई ऊंचाई तक पहुंच सकता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

