सजा से पहले जमानत अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में अदालत की जिम्मेदारी सर्वोपरि: पूर्व CJI चंद्रचूड़

सजा से पहले जमानत अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में अदालत की जिम्मेदारी सर्वोपरि: पूर्व CJI चंद्रचूड़

प्रेषित समय :22:22:01 PM / Sun, Jan 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि दोष सिद्ध होने से पहले ज़मानत नागरिक का अधिकार है, क्योंकि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली की बुनियाद इस सिद्धांत पर टिकी है कि जब तक अपराध सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में अदालतों पर अतिरिक्त सतर्कता और गहन जांच की जिम्मेदारी होती है

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आयोजित “Ideas of Justice” सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी के सवाल का जवाब देते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह टिप्पणी की। यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाएं खारिज की हैं।

पूर्व CJI ने कहा कि भारतीय कानून की मूल आत्मा “निर्दोषता की धारणा” पर आधारित है। उनके शब्दों में, “हमारा कानून एक बुनियादी मान्यता पर खड़ा है और वह मान्यता यह है कि हर व्यक्ति तब तक निर्दोष है, जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो जाए। इसी सिद्धांत से ज़मानत का अधिकार निकलता है।”

उन्होंने विचारोत्तेजक सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति पाँच या सात साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहता है और अंततः निर्दोष पाया जाता है, तो उस खोए हुए समय की भरपाई कैसे की जा सकती है। यह टिप्पणी भारतीय जेलों में लंबे समय से बंद अंडरट्रायल कैदियों की स्थिति पर सीधा सवाल खड़ा करती है।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने निचली अदालतों और सत्र न्यायालयों की कार्यप्रणाली पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कई बार ज़मानत याचिकाएं इसलिए खारिज कर दी जाती हैं क्योंकि न्यायाधीशों को यह डर रहता है कि यदि उन्होंने ज़मानत दी तो उनकी निष्ठा या ईमानदारी पर सवाल उठाए जा सकते हैं। उन्होंने इसे “गंभीर चिंता का विषय” बताया।

हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद या राज्य की संप्रभुता से जुड़े मामलों में अदालतों को संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। ऐसे मामलों में केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सुरक्षा भी अदालत के विचार क्षेत्र में आती है। इसलिए इन मामलों में ज़मानत पर निर्णय लेते समय गहराई से तथ्यों की जांच आवश्यक है।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी भारतीय न्यायिक विमर्श में एक बार फिर “बेल बनाम जेल” की बहस को केंद्र में ले आती है। यह बहस खास तौर पर UAPA जैसे कठोर कानूनों के संदर्भ में लगातार तेज़ होती रही है, जहां विचाराधीन कैदियों को वर्षों तक ज़मानत नहीं मिल पाती।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्व CJI का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि भारतीय संवैधानिक मूल्यों—व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निष्पक्ष सुनवाई और न्यायिक साहस—की याद दिलाने वाला वक्तव्य है। यह बयान निचली अदालतों से लेकर शीर्ष अदालत तक, ज़मानत को लेकर फैले भय और दबाव की संस्कृति पर भी सवाल खड़ा करता है।

कुल मिलाकर, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का यह वक्तव्य न्यायपालिका के उस संवेदनशील संतुलन की ओर इशारा करता है, जहां एक ओर व्यक्ति की आज़ादी है और दूसरी ओर राष्ट्र की सुरक्षा—और दोनों के बीच न्याय का रास्ता तय करना ही अदालतों की असली कसौटी है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-