कोरियन 3-3-3 ब्रशिंग ट्रेंड पर दंत चिकित्सक की दो टूक, नियमित सफाई ज़रूरी, अति नहीं

कोरियन 3-3-3 ब्रशिंग ट्रेंड पर दंत चिकित्सक की दो टूक, नियमित सफाई ज़रूरी, अति नहीं

प्रेषित समय :22:19:08 PM / Sun, Jan 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली।
दुनिया भर में हेल्दी लाइफस्टाइल और स्किनकेयर ट्रेंड्स के लिए मशहूर कोरिया अब ओरल हाइजीन को लेकर भी चर्चा में है। सोशल मीडिया और हेल्थ प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों कोरियन ‘3-3-3’ टूथ ब्रशिंग तकनीक तेजी से वायरल हो रही है। इस नियम के अनुसार, दिन में तीन बार, हर बार तीन मिनट तक और भोजन के तीन मिनट के भीतर दांत ब्रश करने की सलाह दी जाती है। कुछ संस्करणों में हर तीन महीने में टूथब्रश बदलने की भी बात कही गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तरीका वाकई दांतों और मसूड़ों के लिए फायदेमंद है या फिर जरूरत से ज्यादा सख्त और भ्रम पैदा करने वाला?

दंत विशेषज्ञों का कहना है कि इस ट्रेंड को आंख बंद कर अपनाने से पहले इसकी वैज्ञानिक समझ जरूरी है। एक वरिष्ठ डेंटिस्ट के अनुसार, “अगर 3-3-3 नियम को बहुत सख्ती से लिया जाए तो यह थोड़ा भ्रमित करने वाला हो सकता है। ओरल हेल्थ का मूल उद्देश्य नियमित और सावधानीपूर्वक सफाई है, न कि समय और गिनती का दबाव।”

विशेषज्ञ बताते हैं कि दिन में दो बार ब्रश करना—सुबह और रात—अधिकांश लोगों के लिए पर्याप्त होता है, बशर्ते ब्रशिंग तकनीक सही हो। जरूरत से ज्यादा बार या ज्यादा देर तक ब्रश करने से दांतों की एनामेल पर घिसाव हो सकता है और मसूड़ों में संवेदनशीलता या सूजन की समस्या पैदा हो सकती है। खासतौर पर भोजन के तुरंत बाद ब्रश करना हर बार सही नहीं माना जाता, क्योंकि उस समय मुंह का pH स्तर अम्लीय होता है, जिससे ब्रश करने पर दांतों की सतह को नुकसान पहुंच सकता है।

डेंटिस्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि हर व्यक्ति की डेंटल जरूरत अलग होती है। जिन लोगों को मसूड़ों की बीमारी, कैविटी या ब्रेसेस जैसी समस्याएं हैं, उनके लिए दिन में तीन बार हल्के हाथ से ब्रश करना फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसे सार्वभौमिक नियम नहीं बनाया जा सकता। “ओरल केयर कोई फिटनेस चैलेंज नहीं है, जहां ज्यादा करने का मतलब बेहतर नतीजा हो,” विशेषज्ञ कहते हैं।

कोरियाई जीवनशैली में संतुलित आहार, प्रोबायोटिक युक्त भोजन, पैदल चलने योग्य शहर और स्वास्थ्य के प्रति सजगता पहले से ही शामिल है। ऐसे में 3-3-3 नियम उसी व्यापक हेल्दी सिस्टम का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे दूसरे देशों में बिना संदर्भ समझे अपनाना व्यावहारिक नहीं है। भारतीय संदर्भ में, जहां खानपान, दांतों की संरचना और जीवनशैली अलग है, वहां एक ही नियम सभी पर लागू नहीं किया जा सकता।

डेंटल एक्सपर्ट्स का ज़ोर इस बात पर है कि ब्रशिंग के साथ-साथ फ्लॉसिंग और नियमित डेंटल चेकअप भी उतने ही जरूरी हैं। सिर्फ ब्रश करने की आवृत्ति बढ़ा देने से दांतों के बीच फंसे भोजन कण या प्लाक पूरी तरह साफ नहीं होते। सही तरीका यह है कि दिन में कम से कम एक बार फ्लॉस किया जाए और हर छह महीने में डेंटिस्ट से जांच कराई जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर वायरल हेल्थ ट्रेंड्स अक्सर अधूरी जानकारी के साथ पेश किए जाते हैं, जिससे लोग जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने लगते हैं। 3-3-3 नियम भी उसी श्रेणी में आता है, जहां विचार अच्छा है लेकिन इसका कठोर पालन हर किसी के लिए फायदेमंद नहीं।

अंततः दंत चिकित्सकों की सलाह साफ है—दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखने के लिए निरंतरता, सही तकनीक और संतुलन सबसे अहम है। बहुत ज्यादा ब्रश करना या नियमों में उलझ जाना ओरल हेल्थ को बेहतर नहीं, बल्कि नुकसान भी पहुंचा सकता है। सही ब्रश, हल्के हाथ, फ्लॉस और समय-समय पर जांच—यही स्वस्थ मुस्कान का असली फॉर्मूला है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-