बेंगलुरु. भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्य पुरस्कारों' की घोषणा कर दी है, जिसमें कर्नाटक की तीन ऐसी विभूतियों को पद्मश्री से नवाजा गया है जिनकी जीवन यात्रा संघर्ष और सेवा की अद्वितीय मिसाल है। इनमें सबसे चौंकाने वाला और प्रेरणादायी नाम अंके गौड़ा का है, जिन्होंने कभी बस में टिकट काटने का काम किया, लेकिन किताबों के प्रति अपने जुनून के चलते आज वे भारत के सबसे बड़े निजी पुस्तकालयों में से एक के संस्थापक हैं।
75 वर्षीय अंके गौड़ा ने अपनी कमाई का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा केवल किताबों को खरीदने में खर्च कर दिया और आज उनके 'पुस्तका माने' (किताबों का घर) में 20 लाख से अधिक पुस्तकों का विशाल संग्रह मौजूद है। कर्नाटक के मांड्या जिले के एक किसान परिवार में जन्मे गौड़ा ने महज 20 साल की उम्र में तब किताबें इकट्ठा करना शुरू किया था जब वे बस कंडक्टर के रूप में कार्यरत थे। उनके इस जुनून की पराकाष्ठा यह थी कि उन्होंने अपने इस पुस्तकालय के विस्तार के लिए मैसूर स्थित अपना घर तक बेच दिया और मांड्या के श्रीरंगपटना के पास हरालहल्ली गांव में ज्ञान का एक मंदिर खड़ा कर दिया। उनके इस संग्रह में 20 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं की पुस्तकें शामिल हैं, जिनमें साहित्य, विज्ञान, दर्शन और इतिहास जैसे विषयों का भंडार है। अंके गौड़ा की इस लाइब्रेरी में 1832 के दुर्लभ हस्तलेख, 5000 से अधिक शब्दकोश और हजारों ऐतिहासिक पत्रिकाएं मौजूद हैं। आश्चर्य की बात यह है कि संसाधनों की कमी के बावजूद वे स्वयं हर दिन इन किताबों की सफाई और रखरखाव करते हैं और अपनी पत्नी विजयलक्ष्मी के साथ इसी पुस्तकालय परिसर में एक छोटे से कोने में रहकर सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
अंके गौड़ा के साथ ही चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाले दावणगेरे के डॉ. सुरेश हनगावाड़ी को भी पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। डॉ. हनगावाड़ी की कहानी इसलिए विशेष है क्योंकि वे स्वयं 'हीमोफिलिया' नामक रक्त विकार से जूझ रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी इस बीमारी को कमजोरी बनाने के बजाय दूसरों की सेवा का जरिया बना लिया। पिछले चार दशकों से उन्होंने कर्नाटक में हीमोफिलिया के मरीजों के इलाज और जागरूकता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। जेजेएम मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. हनगावाड़ी ने दावणगेरे में 'कर्नाटक हीमोफिलिया सोसाइटी' की स्थापना की और सरकार के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि जिला अस्पतालों में इस बीमारी की महंगी दवाएं मुफ्त उपलब्ध हों। पद्म पुरस्कार की घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने इसे देश के लाखों हीमोफिलिया मरीजों की जीत बताया और उम्मीद जताई कि इस सम्मान से राष्ट्रीय स्तर पर इस बीमारी के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी।
समाज सेवा के क्षेत्र में कर्नाटक का तीसरा बड़ा नाम डॉ. एस. जी. सुशिलम्मा का है, जिन्हें महिलाओं और बच्चों के उत्थान के लिए किए गए उनके पांच दशक लंबे संघर्ष के लिए यह सम्मान दिया गया है। 1975 से सामाजिक कार्यों में सक्रिय डॉ. सुशिलम्मा ने 'सुमंगली सेवाश्रम' के माध्यम से बेसहारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और बच्चों को संस्कारित शिक्षा देने का बीड़ा उठाया है। उनके कार्यों में कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान, नशामुक्ति और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल रहे हैं। उन्हें इससे पहले जापान से अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और दो मानद डॉक्टरेट की उपाधियां भी मिल चुकी हैं। डॉ. सुशिलम्मा का 'चिल्ड्रन यूनियन' मॉडल आज भी युवाओं में नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए एक मिसाल माना जाता है।
इस वर्ष कर्नाटक से कुल आठ हस्तियों को पद्म पुरस्कारों के लिए चुना गया है, जिनमें शताब्दी अवधानी आर. गणेश को साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए 'पद्म भूषण' से नवाजा गया है। अन्य पद्मश्री विजेताओं में शिक्षाविद प्रभाकर कोरे, प्रसार भारती के पूर्व सीईओ शशि शेखर वेम्पति और शुभा वेंकटेश अयंगर शामिल हैं। वाणिज्य और उद्योग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले टी. टी. जगन्नाथ को मरणोपरांत पद्मश्री प्रदान किया गया है। केंद्र सरकार का यह निर्णय दर्शाता है कि इस बार उन चेहरों को प्राथमिकता दी गई है जिन्होंने बिना किसी प्रचार के धरातल पर बदलाव लाने का काम किया है। अंके गौड़ा जैसे व्यक्ति, जो आज भी पुस्तकालय की जमीन पर सोते हैं और किताबों को ही अपनी दुनिया मानते हैं, उनका सम्मान होना भारतीय लोकतंत्र की उस खूबसूरती को उजागर करता है जहां साधारण पृष्ठभूमि के लोग अपने असाधारण कार्यों से राष्ट्र के नायक बनते हैं। इन पुरस्कारों ने न केवल कर्नाटक का गौरव बढ़ाया है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को यह संदेश भी दिया है कि निस्वार्थ सेवा और ज्ञान की साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

