भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे छगन भुजबल को मिली बड़ी राहत, अदालत ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में किया बरी

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे छगन भुजबल को मिली बड़ी राहत, अदालत ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में किया बरी

प्रेषित समय :22:46:29 PM / Sun, Jan 25th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

मुंबई. महाराष्ट्र की सियासत में पिछले एक दशक से जारी सबसे बड़े कानूनी और राजनीतिक ड्रामे का पटाक्षेप उस समय हो गया जब मुंबई की एक विशेष अदालत ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता और वर्तमान कैबिनेट मंत्री छगन भुजबल को प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग के हाई-प्रोफाइल मामले में पूरी तरह बरी कर दिया। यह फैसला केवल एक व्यक्ति की कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता, जांच एजेंसियों और राजनीतिक गठबंधनों के बदलते स्वरूप की एक मुकम्मल कहानी बयान करता है। साल 2016 में जब केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकारें मजबूती से स्थापित थीं, तब छगन भुजबल को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़े अभियान के तहत गिरफ्तार किया गया था। उस समय भाजपा ने भुजबल की गिरफ्तारी को भ्रष्टाचार के प्रति अपनी 'जीरो टॉलरेंस' नीति के सबसे बड़े प्रमाण के रूप में पेश किया था। तत्कालीन विपक्ष और जनता के बीच यह संदेश दिया गया था कि कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितना भी रसूखदार क्यों न हो। भुजबल ने इस मामले के चलते दो साल से अधिक का समय जेल की सलाखों के पीछे बिताया और 2018 में उन्हें जमानत मिली थी। लेकिन आज, जब वे उसी भाजपा के नेतृत्व वाले 'महायुति' गठबंधन में एक महत्वपूर्ण मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं, अदालत द्वारा उन्हें 'क्लीन चिट' दिया जाना कई गंभीर और पेचीदा सवाल खड़े करता है।

पत्रकारिता के निष्पक्ष चश्मे से देखें तो भुजबल का मामला भारतीय राजनीति में 'समय और अवसर' के महत्व को रेखांकित करता है। साल 2023 में जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में बड़ी टूट हुई और अजीत पवार के नेतृत्व में एक धड़ा शरद पवार से अलग होकर भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल हुआ, तो छगन भुजबल उस गुट के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक थे। अपने राजनीतिक गुरु शरद पवार का साथ छोड़कर भाजपा के साथ हाथ मिलाना भुजबल के लिए न केवल सत्ता में वापसी का जरिया बना, बल्कि इसने उनके खिलाफ चल रही जांचों की दिशा भी बदल दी। जिस मामले में कभी उन्हें भ्रष्टाचार का 'पोस्टर बॉय' बनाकर पेश किया गया था, उसी मामले में शुक्रवार को विशेष अदालत ने पाया कि उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद नहीं हैं। यह कानूनी राहत उस समय मिली है जब विपक्ष लगातार केंद्र और राज्य सरकार पर 'वॉशिंग मशीन' राजनीति का आरोप लगा रहा है, जहां सत्ता पक्ष में शामिल होते ही नेताओं के दाग साफ होने लगते हैं। भुजबल का बरी होना इस धारणा को और मजबूती प्रदान करता है कि राजनीति में कोई भी शत्रुता स्थाई नहीं होती और कानूनी प्रक्रियाएं अक्सर राजनीतिक हवा के रुख के साथ अपनी गति बदल लेती हैं।

इस पूरे प्रकरण की तह में जाएं तो महाराष्ट्र सदन घोटाले से जुड़े इस मनी लॉन्ड्रिंग मामले ने भुजबल के राजनीतिक करियर को लगभग समाप्त मान लिया गया था। उन पर आरोप थे कि उन्होंने लोक निर्माण मंत्री रहते हुए सरकारी ठेकों के बदले करोड़ों रुपये की रिश्वत ली और उसे शेल कंपनियों के जरिए सफेद किया। 2016 की उनकी वह तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में ताजा है जब वे पुलिस की हिरासत में बेहद कमजोर और बीमार नजर आ रहे थे। उस वक्त भाजपा के कई बड़े नेता सार्वजनिक मंचों से यह दहाड़ते थे कि भुजबल को उनकी करनी का फल मिल रहा है। लेकिन जैसे ही महाराष्ट्र की सत्ता के समीकरण बदले और 2022-23 में नए गठबंधनों का उदय हुआ, वही भाजपा जो कभी भुजबल की कट्टर विरोधी थी, आज उनके साथ सत्ता साझा कर रही है। अदालत के इस ताजा फैसले ने उन जांचों की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लगा दिया है जो सालों तक चलती हैं और अंत में बिना किसी ठोस नतीजे के बंद हो जाती हैं। यह स्थिति जनता के बीच न्याय व्यवस्था और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता को लेकर एक संशय पैदा करती है।

भुजबल की यह कानूनी मुक्ति केवल उनके व्यक्तिगत पुनर्वास का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की भावी राजनीति को भी प्रभावित करेगी। आगामी चुनावों में सत्ता पक्ष जहां इसे भुजबल की निर्दोषता के प्रमाण के रूप में पेश करेगा, वहीं विपक्ष इसे 'एजेंसियों के दुरुपयोग' और 'राजनीतिक सौदेबाजी' का सबसे बड़ा उदाहरण बताएगा। यह घटनाक्रम यह भी स्पष्ट करता है कि राजनीति में 'नैतिकता' अब केवल भाषणों तक सीमित रह गई है और वास्तविक खेल केवल 'संख्या बल' और 'समझौतों' का है। भुजबल को मिली यह राहत उन अन्य नेताओं के लिए भी एक उम्मीद की किरण हो सकती है जो वर्तमान में जांच के घेरे में हैं और राजनीतिक पाला बदलने की सोच रहे हैं। अंततः, छगन भुजबल का भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त होकर शान से मंत्रालय की कुर्सी पर बैठना भारतीय लोकतंत्र के उस पहलू को उजागर करता है जहां सत्ता ही सबसे बड़ी सच्चाई है और कानूनी जीत अक्सर राजनीतिक स्थिरता के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है। अदालत के इस आदेश के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जांच एजेंसियां इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देती हैं या फिर इसे एक 'बंद अध्याय' मानकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-