क्रिकेट में गोल्डन डक शायद किसी बल्लेबाज़ के लिए सबसे कड़वी शुरुआत मानी जाती है. और जब वह आउट होना पहली ही गेंद पर, आगे बढ़कर बड़ा शॉट खेलने की कोशिश में, कैच के रूप में हो-तो तंज और आलोचना और तेज़ हो जाती है. लेकिन अभिषेक शर्मा के मामले में इस तरह के आउट होने को उपहास का विषय बनाना न तो सही है और न ही ज़रूरी. यही जोखिम, यही आक्रामकता उन्हें वह बल्लेबाज़ बनाती है जो गेंदबाज़ों के मन में डर पैदा करता है और टीम को मैच जिताने की स्थिति में ले जाता है.
अभिषेक शर्मा आज भारतीय क्रिकेट के सबसे विस्फोटक ओपनरों में गिने जाते हैं—वीरेंद्र सहवाग के बाद शायद सबसे ज़्यादा विध्वंसक. उनकी बल्लेबाज़ी का मूल स्वभाव ही आक्रमण है. वह पहले ओवर से गेंदबाज़ पर दबाव बनाते हैं, फील्डिंग सेट-अप बिगाड़ते हैं और विपक्ष को बैकफुट पर धकेल देते हैं. ऐसे बल्लेबाज़ों के साथ यह जोखिम हमेशा जुड़ा रहता है कि कभी-कभी वही आक्रामक शॉट जल्दी विकेट में बदल जाए. लेकिन एक असफलता के कारण उस स्वभाव को बदलने की मांग करना क्रिकेट की बुनियादी समझ के खिलाफ है.
इतिहास गवाह है कि हर “टर्बो-चार्ज्ड” ओपनर ने इसी तलवार से लड़ाई लड़ी है. वीरेंद्र सहवाग को ही देख लीजिए—ऑफ स्टंप के बाहर उस कट और स्लैश ने उन्हें अनगिनत बार आउट किया, लेकिन उसी शॉट ने उन्हें दुनिया के सबसे खौफनाक बल्लेबाज़ों में भी शामिल किया. उनके अंतरराष्ट्रीय रनों का बड़ा हिस्सा उसी आक्रामक अप्रोच से आया, जिसने गेंदबाज़ों की लाइन-लेंथ को तहस-नहस कर दिया और रातों की नींद उड़ा दी.
संथ जयसूर्या का शॉर्ट-आर्म पुल भी ऐसा ही हथियार था. कई बार वही शॉट उनके पतन का कारण बना, लेकिन उसकी धार कभी कम नहीं हुई. मैथ्यू हेडन भी ऐसे ही लुटेरे बल्लेबाज़ थे, जो आगे बढ़कर गेंदबाज़ों पर हमला करते थे और कभी-कभी उसी दुस्साहस में विकेट गंवा बैठते थे. लेकिन क्या किसी ने उनसे यह कहा कि वे अपनी पहचान बदल लें? नहीं, क्योंकि टीमों को पता था कि यही अंदाज़ उन्हें अलग और खतरनाक बनाता है.
अभिषेक शर्मा भी उसी परंपरा के बल्लेबाज़ हैं. उनका गोल्डन डक उतना ही उनके खेल का हिस्सा है, जितने उनके सुनहरे स्ट्रोक्स. जिस दिन वह टिक जाते हैं, उसी दिन मैच का रुख बदल देते हैं. गेंदबाज़ों के लिए सबसे बड़ा डर यही होता है कि अभिषेक पहली कुछ गेंदें बचा लें—क्योंकि उसके बाद खेल उनके नियंत्रण से बाहर जा सकता है.
एक पारी या एक मैच के आधार पर किसी आक्रामक बल्लेबाज़ को “संयम” का पाठ पढ़ाना आसान है, लेकिन लंबे समय में यह टीम के हित में नहीं होता. भारतीय क्रिकेट को आज ऐसे ही निर्भीक ओपनरों की ज़रूरत है, जो परिणाम की परवाह किए बिना गेंदबाज़ों पर टूट पड़ें और मैच की दिशा शुरुआती ओवरों में ही तय कर दें.
इसलिए संदेश साफ है—अभिषेक शर्मा को मत बदलिए. गोल्डन डक आएंगे, आलोचना भी होगी, लेकिन उसी कीमत पर वे वह तबाही भी मचाएंगे, जिसके लिए उन्हें टीम में चुना गया है. क्रिकेट में कभी-कभी असफलता सिर्फ असफलता नहीं होती, वह अगले बड़े विस्फोट की भूमिका भी होती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

