भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता आर माधवन जिन्हें आज 'विक्रम वेधा' और 'शैतान' जैसी फिल्मों में उनके दमदार अभिनय के लिए जाना जाता है उन्होंने अपनी जिंदगी के एक ऐसे मोड़ का खुलासा किया है जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है. माधवन ने बताया कि करियर के एक दौर में उन्होंने अभिनय से पूरी तरह दूरी बना ली थी और यह फैसला किसी बड़े विवाद की वजह से नहीं बल्कि एक स्विस किसान द्वारा मिले 'तिरस्कारपूर्ण लुक' की वजह से लिया गया था.
यह घटना उस समय की है जब माधवन स्विट्जरलैंड में एक तमिल गाने की शूटिंग कर रहे थे और वहां के एक स्थानीय किसान ने उन्हें नाचते हुए देखकर एक ऐसा भाव दिया जिससे माधवन को गहरा अपमान महसूस हुआ. उस एक पल ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वे केवल पैसा कमाने के लिए ऐसी फिल्में कर रहे हैं जो उनके वजूद और कला के साथ न्याय नहीं करतीं. इसी आत्ममंथन के बाद उन्होंने साल 2011 में फिल्म इंडस्ट्री से 4 साल का लंबा ब्रेक ले लिया.
माधवन ने अपने साक्षात्कार में बताया कि वह दौर उनके लिए "मोहभंग" का समय था क्योंकि वे अपनी 'चॉकलेट बॉय' या 'लवर बॉय' वाली छवि में कैद होकर रह गए थे. स्विस किसान की उस नजर ने उनके भीतर की बेचैनी को बाहर ला दिया और उन्होंने तय किया कि वे तब तक कैमरे के सामने नहीं आएंगे जब तक उन्हें कुछ ऐसा नहीं मिल जाता जो उन्हें गौरवान्वित महसूस कराए. इस चार साल के अज्ञातवास के दौरान माधवन ने खुद को चकाचौंध से दूर रखा और भारत के ग्रामीण इलाकों की यात्रा की. उन्होंने इस दौरान रिक्शा चालकों से बात की आम लोगों के जीवन को करीब से देखा और भारत की जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश की. माधवन का मानना है कि इस यात्रा ने उन्हें न केवल एक बेहतर इंसान बनाया बल्कि उनके भीतर के कलाकार को भी पूरी तरह बदल दिया.
साल 2011 से 2016 तक का यह अंतराल माधवन के लिए एक "ट्रांसफॉर्मेशन" की तरह था. जब उन्होंने 2016 में फिल्म 'साला खड़ूस' के साथ वापसी की तो दुनिया ने एक नया 'माधवन 2.0' देखा. अब वे केवल नाचने-गाने वाले हीरो नहीं थे बल्कि एक ऐसे पावर हाउस परफॉर्मर बन चुके थे जो अपनी आंखों और हाव-भाव से किरदार की गहराई को बयां कर सकता था. माधवन ने स्वीकार किया कि अगर वे उस समय वह कड़ा फैसला नहीं लेते तो शायद आज वे अपनी उसी पुरानी छवि में खो जाते. उनकी भारत यात्रा और आम लोगों से हुई बातचीत ने उन्हें किरदारों की बारीकियों को समझने में मदद की जिसका असर उनकी बाद की फिल्मों जैसे 'रॉकेट्री' और हालिया हिट 'धुरंधर' में साफ तौर पर दिखाई देता है. यह खबर आज उन सभी कलाकारों के लिए एक मिसाल बन गई है जो सफलता की दौड़ में अपनी कला की संतुष्टि को कहीं पीछे छोड़ देते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

