नई दिल्ली. देश की सर्वोच्च अदालत के भीतर केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन ने हिरासत में लिए गए पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के खिलाफ बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील देते हुए कहा कि सोनम वांगचुक गांधीवादी अहिंसा का केवल मुखौटा पहने हुए हैं, जबकि उनके कार्यों का वास्तविक उद्देश्य नई और प्रभावशील पीढ़ी को हिंसा की राह पर धकेलना है। केंद्र ने अदालत को बताया कि वांगचुक के भाषणों और संदेशों में नेपाल, बांग्लादेश की उथल-पुथल और 'अरब स्प्रिंग' जैसी हिंसक क्रांतियों का संदर्भ दिया गया है, जो सीधे तौर पर युवाओं को व्यवस्था के खिलाफ भड़काने की एक सोची-समझी कोशिश है।
सॉलिसिटर जनरल ने अपनी दलीलों में विशेष रूप से रेखांकित किया कि वांगचुक की उकसावे वाली गतिविधियों में 'आत्मदाह' जैसे आत्मघाती कदम और बाहरी आक्रमण की स्थिति में सरकार के साथ 'असहयोग' करने जैसी बातें शामिल हैं। शीर्ष कानून अधिकारी ने अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि लद्दाख एक ऐसा संवेदनशील क्षेत्र है जिसकी सीमा एक ऐसे देश (चीन) से लगती है जिसके साथ भारत के संबंध अत्यंत 'नाजुक' दौर से गुजर रहे हैं। ऐसी भौगोलिक स्थिति में किसी भी प्रकार का नागरिक असहयोग या विदेशी क्रांतियों का उदाहरण देकर युवाओं को भड़काना सीधे तौर पर राष्ट्रीय अखंडता के साथ खिलवाड़ है। सरकार ने स्पष्ट किया कि वांगचुक के शब्दों का असर लद्दाख के युवाओं पर बहुत गहरा होता है और उनके द्वारा दिया गया 'असहयोग' का आह्वान सीमा सुरक्षा के लिए एक गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।
केंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि वांगचुक द्वारा इस्तेमाल की जा रही गांधीवादी शब्दावली केवल एक मुखौटा है, जबकि उनके भाषणों और संदेशों की गहराई में जाने पर एक अलग ही तस्वीर उभरती है। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए सत्ता परिवर्तनों और हिंसक विद्रोहों का जिक्र करता है, तो वह अनजाने में नहीं बल्कि जानबूझकर एक खास तरह का माहौल तैयार कर रहा होता है। कोर्ट में यह दलील दी गई कि लद्दाख की शांति भंग करने के लिए 'अरब स्प्रिंग' जैसे उदाहरण देना यह दर्शाता है कि आंदोलन का मकसद केवल संवैधानिक अधिकारों की मांग नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह खड़ा करना है। प्रशासन ने हिरासत में लिए गए वांगचुक की गतिविधियों को इसी संदर्भ में देखने का आग्रह किया है।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों और बयानों ने एक नई बहस छेड़ दी है। जहां एक तरफ वांगचुक के समर्थक इसे लोकतांत्रिक आवाज को दबाने की कोशिश बता रहे हैं, वहीं सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से 'अक्षम्य' करार दिया है। केंद्र ने अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए उन खुफिया इनपुट्स और सार्वजनिक बयानों का भी हवाला दिया है जिनमें वांगचुक ने कठिन परिस्थितियों में राज्य के प्रति निष्ठा को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां की थीं। सरकार का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह की बयानबाजी सेना और नागरिक प्रशासन के बीच के तालमेल को बिगाड़ सकती है, जिसका सीधा फायदा दुश्मन देशों को मिल सकता है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई अब केवल एक कार्यकर्ता की हिरासत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच की बारीक रेखा को भी परिभाषित करेगी। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत इन गंभीर आरोपों पर क्या रुख अपनाती है और लद्दाख की अशांति का समाधान किस दिशा में जाता है।
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