नेपाली धनिया और राम हनुमान फल के कारण जबलपुर का हर्बल जीन बैंक बना दुर्लभ आयुर्वेदिक पौधों का आकर्षण केंद्र

नेपाली धनिया और राम हनुमान फल के कारण जबलपुर का हर्बल जीन बैंक बना दुर्लभ आयुर्वेदिक पौधों का आकर्षण केंद्र

प्रेषित समय :19:52:33 PM / Tue, Feb 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. नेपाली धनिया, रामफल और हनुमान फल जैसी दुर्लभ औषधीय प्रजातियां अब जबलपुर में लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गई हैं. भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को नई मजबूती देने की दिशा में मध्यप्रदेश के जबलपुर स्थित स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बड़ा कदम उठाया है. संस्थान द्वारा तैयार किए गए हर्बल जीन बैंक और अत्याधुनिक ग्रीन हाउस में 475 से अधिक दुर्लभ जड़ी-बूटियों और औषधीय पौधों को संरक्षित किया गया है, जिनमें कई ऐसी प्रजातियां शामिल हैं जिन्हें आम लोग केवल नाम से जानते थे लेकिन पहली बार उन्हें करीब से देखने और समझने का अवसर मिल रहा है.

स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के इस हर्बल जीन बैंक में कई ऐसी प्रजातियां संरक्षित की गई हैं जिनके बारे में लोग सुनते तो हैं लेकिन उन्हें पहचान नहीं पाते. संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार लोगों को अक्सर नर्सरी या बाजार से औषधीय पौधे खरीदते समय भ्रम हो जाता है और वे असली पौधों की जगह गलत प्रजातियां खरीद लेते हैं. इसी समस्या को दूर करने के लिए यह जीन बैंक तैयार किया गया है जहां लोगों को असली और नकली औषधीय पौधों की पहचान कराई जा रही है. यहां किसानों, छात्रों, शोधार्थियों और अधिकारियों को पौधों के औषधीय गुणों की जानकारी दी जा रही है और अनुसंधान कार्यों के लिए ऑरिजनल मटेरियल भी उपलब्ध कराया जा रहा है. आवश्यकता के अनुसार संस्थान पौधों को तैयार करवाकर भी उपलब्ध कराता है.

संस्थान में संरक्षित दुर्लभ प्रजातियां लोगों को आश्चर्यचकित करती हैं. वैज्ञानिक डॉ. उदय होमकर ने बताया कि यहां प्रदेश के विभिन्न जंगलों से चयनित दुर्लभ वनस्पतियों को संरक्षित किया गया है. इस जीन बैंक की विशेषता यह है कि यहां कपूर और पिपरमेंट जैसे पौधों को जीवित अवस्था में देखा जा सकता है. इन पौधों की पत्तियों को मसलने पर असली कपूर और पुदीने जैसी सुगंध आती है, जिससे लोगों को प्राकृतिक औषधीय पौधों की वास्तविक पहचान समझने में मदद मिलती है.

संस्थान में सीताफल परिवार की पूरी श्रृंखला भी संरक्षित की गई है. डॉ. होमकर के अनुसार लोग सामान्य रूप से सीताफल के बारे में जानते हैं लेकिन यहां रामफल, लक्ष्मण फल और हनुमान फल जैसी दुर्लभ प्रजातियां भी मौजूद हैं. इसके साथ ही नेपाली धनिया भी इस जीन बैंक का प्रमुख आकर्षण बना हुआ है. इसकी पत्तियां आकार में पालक की तरह बड़ी होती हैं लेकिन इसका स्वाद और सुगंध पूरी तरह धनिया जैसी होती है. यह प्रजाति औषधीय गुणों के कारण वैज्ञानिकों और किसानों दोनों के लिए उपयोगी मानी जा रही है.

स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट का यह प्रोजेक्ट केवल शोध कार्यों तक सीमित नहीं है बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. संस्थान द्वारा किसानों को औषधीय खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार जो किसान पारंपरिक खेती छोड़कर औषधीय पौधों की खेती करना चाहते हैं उन्हें संस्थान द्वारा नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं. यदि कोई किसान बड़े स्तर पर खेती करना चाहता है तो संस्थान द्वारा बड़ी मात्रा में पौधों का उत्पादन कर उन्हें उपलब्ध कराया जाता है. इससे किसानों के लिए नई आय के अवसर भी पैदा हो रहे हैं.

आयुर्वेद विशेषज्ञों का मानना है कि ताजी जड़ी-बूटियों का उपयोग औषधीय दृष्टि से अधिक प्रभावी होता है. विशेषज्ञों के अनुसार ब्राह्मी और शंखपुष्पी जैसी जड़ी-बूटियों का उपयोग यदि ताजा रूप में किया जाए तो उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. जबलपुर में विकसित यह हर्बल गार्डन छात्रों और आयुर्वेद के शोधार्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा है. यहां अध्ययन और अनुसंधान के लिए प्राकृतिक वातावरण में पौधों की उपलब्धता उन्हें बेहतर समझ विकसित करने का अवसर प्रदान कर रही है.

संस्थान आम लोगों को भी औषधीय पौधों के प्रति जागरूक कर रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार लोग अपने घरों में पुदीना, एलोवेरा, तुलसी, अश्वगंधा, स्टीविया, रोजमेरी, करी पत्ता और तेज पत्ता जैसे पौधे लगाकर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं. इन पौधों की देखभाल और उपयोग की जानकारी भी लोगों को दी जा रही है जिससे प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा मिल रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जंगलों की कटाई के कारण कई दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गई हैं. ऐसे में स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा तैयार किया गया यह हर्बल जीन बैंक पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता को बचाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि सरकार और समाज का सहयोग मिलता रहा तो भविष्य में और अधिक दुर्लभ प्रजातियों को संरक्षित कर आयुर्वेदिक चिकित्सा को नई दिशा दी जा सकती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-