संसद में हंगामे की वजह बनी पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित किताब से चीन नीति पर सियासी संग्राम तेज

संसद में हंगामे की वजह बनी पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित किताब से चीन नीति पर सियासी संग्राम तेज

प्रेषित समय :22:23:06 PM / Wed, Feb 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. इस सप्ताह संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया जब भारत के पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ सियासी बहस का केंद्र बन गई। विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा इस पुस्तक की प्रिंट कॉपी संसद परिसर में दिखाए जाने के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि चूंकि यह पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं हुई है और रक्षा मंत्रालय की मंजूरी प्रक्रिया में लंबित है, इसलिए इसके किसी भी हिस्से का संसद में संदर्भ देना उचित नहीं माना जा सकता। इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया और चीन नीति से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर सवालों की झड़ी लग गई।

बताया जा रहा है कि जनरल नरवणे की यह आत्मकथा वर्ष 2023 से रक्षा मंत्रालय की स्वीकृति के लिए लंबित है। राहुल गांधी ने संसद परिसर में पुस्तक की प्रति दिखाते हुए आरोप लगाया कि इसमें भारत-चीन सीमा विवाद और सैन्य रणनीति से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य हो सकते हैं जिन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। हालांकि सरकार ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि संवेदनशील रक्षा दस्तावेजों और पूर्व सैन्य अधिकारियों की पुस्तकों को सार्वजनिक करने से पहले तय प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है।

इस पूरे विवाद के बीच जनरल एमएम नरवणे ने फिलहाल इस राजनीतिक बहस पर कोई सीधा बयान नहीं दिया है। लेकिन इससे पहले उन्होंने अपने संस्मरण ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लिखने के पीछे की कहानी साझा की थी। वर्ष 2025 में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि शुरुआत में उनका आत्मकथा लिखने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने कहा था कि यह विचार एक हल्के-फुल्के मजाक के दौरान सामने आया जब वह मार्च 2023 में दिवंगत जनरल बिपिन रावत पर आधारित एक पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उस दौरान उन्होंने प्रकाशन संस्था पेंगुइन के प्रतिनिधियों से मजाक में कहा था कि वे उनकी किताब क्यों नहीं प्रकाशित कर रहे हैं। इस पर प्रकाशकों ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कोई पुस्तक लिखी है। नरवणे ने तब साफ कहा था कि उन्होंने अभी तक कोई किताब नहीं लिखी है।

इसके बाद प्रकाशकों के साथ बातचीत के दौरान यह विचार धीरे-धीरे गंभीर रूप लेता गया और उन्होंने अपने सैन्य जीवन के अनुभवों को पुस्तक के रूप में संकलित करने का फैसला किया। उन्होंने बताया था कि सेना में बिताए गए वर्षों के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण घटनाओं और निर्णयों को बेहद करीब से देखा है, जिन्हें इतिहास के रूप में दर्ज करना जरूरी लगा। उनका मानना था कि यह पुस्तक सिर्फ व्यक्तिगत संस्मरण नहीं बल्कि भारतीय सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का माध्यम बन सकती है।

जनरल नरवणे ने इंटरव्यू में यह भी कहा था कि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया है और अब पुस्तक का भविष्य प्रकाशक और रक्षा मंत्रालय के बीच तय होना है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि लेखक के रूप में उनकी जिम्मेदारी लेखन तक सीमित थी और अब प्रकाशन से जुड़ी प्रक्रियाएं संबंधित संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि रक्षा से जुड़े विषयों पर लिखी जाने वाली पुस्तकों को सुरक्षा कारणों से कई स्तरों की जांच और मंजूरी से गुजरना पड़ता है, जो एक सामान्य प्रक्रिया है।

संसद में इस मुद्दे को लेकर बहस तब तेज हुई जब विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार पुस्तक को इसलिए रोक रही है क्योंकि इसमें चीन से जुड़े विवादों पर संवेदनशील जानकारी हो सकती है। कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि देश को यह जानने का अधिकार है कि सीमा पर क्या घटनाएं हुईं और सेना तथा सरकार के बीच किस प्रकार की रणनीतिक बातचीत हुई। वहीं भाजपा और सरकार से जुड़े नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना गलत है।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, पूर्व सैन्य अधिकारियों की किताबों के प्रकाशन से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि उनमें किसी भी प्रकार की गोपनीय या रणनीतिक जानकारी सार्वजनिक न हो। मंत्रालय का कहना है कि यह प्रक्रिया केवल नरवणे की पुस्तक तक सीमित नहीं बल्कि सभी पूर्व वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की पुस्तकों पर समान रूप से लागू होती है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि इस तरह की जांच राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए आवश्यक होती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भारत-चीन सीमा मुद्दा पहले से ही संवेदनशील बना हुआ है। संसद में इस विषय पर चर्चा अक्सर तीखी रही है और विपक्ष लगातार सरकार से पारदर्शिता की मांग करता रहा है। नरवणे की पुस्तक के इर्द-गिर्द पैदा हुआ विवाद इस बहस को और अधिक तीव्र बना सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए संस्मरण अक्सर ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि वे निर्णय प्रक्रिया और सैन्य रणनीति के अंदरूनी पहलुओं को सामने लाते हैं। हालांकि ऐसे दस्तावेजों में सुरक्षा संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है। कई मामलों में पुस्तक के कुछ हिस्सों को संशोधित या हटाकर ही प्रकाशन की अनुमति दी जाती है।

इस बीच सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से ट्रेंड कर रहा है। कुछ लोग नरवणे की पुस्तक के जल्द प्रकाशन की मांग कर रहे हैं, जबकि कई यूजर्स राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में रक्षा और कूटनीति से जुड़े मुद्दे हमेशा राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते रहेंगे।

जनरल नरवणे भारतीय सेना के 28वें प्रमुख रह चुके हैं और उनके कार्यकाल के दौरान भारत-चीन सीमा पर कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई थीं। इसी कारण उनकी आत्मकथा को लेकर उत्सुकता स्वाभाविक रूप से अधिक है। हालांकि फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पुस्तक को अंतिम मंजूरी कब मिलेगी और यह कब प्रकाशित होगी।

संसद में चल रहे इस विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रक्षा मंत्रालय इस पुस्तक पर क्या निर्णय लेता है और क्या यह विवाद संसद की कार्यवाही और भारत की चीन नीति पर व्यापक चर्चा को प्रभावित करता है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-