भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, न्यायिक स्वतंत्रता पर खतरे का आरोप

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, न्यायिक स्वतंत्रता पर खतरे का आरोप

प्रेषित समय :20:03:26 PM / Sat, Feb 7th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद ने देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसमें बैठते हुए या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को अभियोजन विभाग में शीर्ष पदों पर नियुक्त करने की अनुमति दी गई है. याचिकाकर्ता का दावा है कि यह प्रावधान संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करता है. इस मामले को लेकर कानूनी और संवैधानिक हलकों में व्यापक बहस शुरू हो गई है.

यह जनहित याचिका वरिष्ठ आपराधिक वकील पीएस सुबेश द्वारा दायर की गई है, जिन्होंने दो दशक से अधिक समय तक आपराधिक मामलों की पैरवी की है. उन्होंने यह याचिका अधिवक्ता एमएस सुविदत्त के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है. याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 20 की उपधारा 2(ए) और 2(बी) को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान न्यायपालिका, कार्यपालिका और अभियोजन प्रणाली के बीच संवैधानिक संतुलन को प्रभावित करता है और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को कमजोर करता है.

विवादित प्रावधान के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति कम से कम 15 वर्षों तक अधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुका है या वह सत्र न्यायाधीश रह चुका है तो उसे अभियोजन निदेशक या उप अभियोजन निदेशक के पद पर नियुक्त किया जा सकता है. इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति कम से कम सात वर्षों तक अधिवक्ता रहा है या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य कर चुका है तो उसे सहायक अभियोजन निदेशक के पद पर नियुक्त किया जा सकता है. इस प्रावधान के तहत राज्यों में अभियोजन निदेशालय स्थापित करने का प्रस्ताव भी शामिल है.

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि यह प्रावधान अभियोजन प्रणाली को मजबूत करने के उद्देश्य से बनाया गया बताया जा रहा है, लेकिन व्यवहार में यह अभियोजन तंत्र को कार्यपालिका के नियंत्रण में ले आता है. उनका कहना है कि यदि न्यायिक अधिकारी अभियोजन विभाग में नेतृत्व की भूमिका निभाते हैं तो इससे शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर होगा और न्यायिक निष्पक्षता पर भी सवाल उठेंगे. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के कार्यक्षेत्रों का मिश्रण संवैधानिक व्यवस्था के मूल ढांचे के खिलाफ है.

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि अभियोजन प्रणाली को स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है. यदि अभियोजन विभाग कार्यपालिका के प्रशासनिक नियंत्रण में रहेगा और उसमें न्यायिक अधिकारियों को शामिल किया जाएगा तो इससे अभियोजन की स्वतंत्रता प्रभावित होगी. याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है.

पीएस सुबेश ने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा है कि उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि अभियोजन के निर्णय और संस्थागत नियंत्रण आपराधिक मुकदमों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं. उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान निष्पक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है. यदि न्यायिक और कार्यकारी कार्यों का मिश्रण किया जाता है तो यह न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाला कदम साबित हो सकता है.

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि परंपरागत रूप से आपराधिक न्याय प्रणाली तीन अलग-अलग स्तंभों पर आधारित होती है. जांच का कार्य पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है, अभियोजन का कार्य स्वतंत्र लोक अभियोजकों द्वारा किया जाता है और निर्णय देने का अधिकार न्यायपालिका के पास होता है. याचिकाकर्ता का कहना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 20 इन तीनों चरणों को एक कार्यकारी नियंत्रित ढांचे में लाने का प्रयास करती है, जिससे संवैधानिक सीमाएं धुंधली हो सकती हैं.

याचिका के अनुसार इस धारा की अन्य उपधाराएं अभियोजन निदेशालय को व्यापक अधिकार प्रदान करती हैं. इसमें पुलिस रिपोर्ट की जांच करने, आपराधिक जांच की निगरानी करने, अपराध की गंभीरता के आधार पर अभियोजन की निगरानी करने, मामलों की सुनवाई को तेज करने और अपील दाखिल करने की सलाह देने जैसे अधिकार शामिल हैं. याचिकाकर्ता का कहना है कि इतने व्यापक अधिकारों के साथ यदि न्यायिक अधिकारियों को अभियोजन ढांचे में शामिल किया जाता है तो इससे न्यायिक निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है.

याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में लोक अभियोजक, अतिरिक्त लोक अभियोजक और सहायक लोक अभियोजक राज्य के गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करते हैं. यदि न्यायिक अधिकारियों को इस ढांचे में शामिल किया जाता है तो अभियोजन प्रणाली पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में आ सकती है. इससे अभियोजन की स्वतंत्र भूमिका कमजोर पड़ सकती है और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी असर पड़ सकता है.

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि इस प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन घोषित किया जाए. उनका कहना है कि यह प्रावधान नागरिकों के समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करता है. याचिका में यह भी कहा गया है कि शक्तियों का पृथक्करण भारतीय संविधान की मूल विशेषता है और इसे कमजोर करने वाला कोई भी प्रावधान असंवैधानिक माना जाना चाहिए.

इस मामले में केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया गया है. याचिका में गृह मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय को प्रतिवादी के रूप में शामिल किया गया है. अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांग सकता है और आने वाले समय में इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर महत्वपूर्ण सुनवाई होने की संभावना है.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला देश की आपराधिक न्याय प्रणाली के ढांचे को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण मामला बन सकता है. यदि सुप्रीम कोर्ट इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करता है तो इससे अभियोजन व्यवस्था में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. वहीं यदि अदालत इस प्रावधान को बरकरार रखती है तो राज्यों में अभियोजन निदेशालय की संरचना और भूमिका में व्यापक परिवर्तन हो सकते हैं.

फिलहाल यह मामला न्यायपालिका, कार्यपालिका और अभियोजन तंत्र के बीच संतुलन को लेकर गंभीर संवैधानिक बहस का विषय बन गया है. सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर होने वाली सुनवाई को कानूनी जगत के साथ-साथ प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. आने वाले समय में इस मामले का फैसला देश की न्याय व्यवस्था की संरचना और स्वतंत्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-