नरवणे की किताब को लेकर संसद में गरमाई राजनीति, राहुल गांधी और मोदी सरकार आमने सामने

नरवणे की किताब को लेकर संसद में गरमाई राजनीति, राहुल गांधी और मोदी सरकार आमने सामने

प्रेषित समय :22:38:10 PM / Mon, Feb 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी को लेकर संसद में शुरू हुआ विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है. इस मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं और संसद की कार्यवाही लगातार बाधित हो रही है. कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के आरोपों के बाद यह मामला राहुल बनाम मोदी के सीधे सियासी टकराव में तब्दील हो गया है, जहां एक ओर कांग्रेस चीन और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सरकार को घेर रही है, वहीं दूसरी ओर भाजपा इसे संसद की गरिमा और राष्ट्रीय हित से जोड़कर विपक्ष पर हमला बोल रही है.

इस राजनीतिक विवाद की शुरुआत 2 फरवरी को लोकसभा में हुई, जब राहुल गांधी ने सदन में द कारवां मैगजीन के एक लेख का हवाला देते हुए जनरल नरवणे की किताब से जुड़े कथित अंशों का उल्लेख किया. राहुल गांधी का दावा था कि किताब में 2020 के गलवान संघर्ष के बाद की घटनाओं का जिक्र है, जिसमें बताया गया है कि चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे और इस गंभीर स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व की ओर से स्पष्ट निर्देश नहीं मिले. राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करते हुए कहा कि उस समय प्रधानमंत्री ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय फैसला सेना प्रमुख पर छोड़ दिया.

राहुल गांधी ने सदन में कहा कि किताब में यह संकेत मिलता है कि सेना प्रमुख को यह कह दिया गया कि “जो उचित समझो, वही करो”, जिससे यह संदेश गया कि शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व निर्णय लेने से पीछे हट गया. उन्होंने आरोप लगाया कि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत गंभीर मामला है और संसद में इस पर चर्चा होना जरूरी है. राहुल गांधी ने इस मुद्दे को सिर्फ एक किताब तक सीमित न रखते हुए इसे चीन नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ दिया.

कांग्रेस के इस हमले के बाद सत्तापक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी. भाजपा सांसदों और मंत्रियों ने राहुल गांधी पर संसद के नियमों का उल्लंघन करने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को राजनीति का हथियार बनाने का आरोप लगाया. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में स्पष्ट कहा कि जिस किताब का अभी तक आधिकारिक प्रकाशन नहीं हुआ है, उसके कथित अंशों का हवाला देना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह देश के हितों को भी नुकसान पहुंचा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के आरोपों से सेना और सरकार के बीच अविश्वास का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है.

विवाद उस समय और गहरा गया जब राहुल गांधी संसद परिसर में किताब की एक प्रिंटेड कॉपी लेकर नजर आए. उन्होंने कहा कि वे यह किताब प्रधानमंत्री को देना चाहते हैं, ताकि वे खुद पढ़कर सच्चाई जान सकें. इस घटनाक्रम को भाजपा ने एक राजनीतिक ड्रामा करार दिया. सत्तापक्ष का कहना है कि यह पूरी कवायद मीडिया और जनता का ध्यान भटकाने के लिए की जा रही है, जबकि विपक्ष का दावा है कि सरकार सच से बच रही है.

इस पूरे विवाद के कारण संसद की कार्यवाही कई दिनों तक प्रभावित रही. विपक्ष ने लगातार चीन मुद्दे और किताब में किए गए कथित खुलासों पर चर्चा की मांग की, जबकि सरकार ने इसे संसद की कार्यसूची से बाहर बताते हुए खारिज कर दिया. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी सरकार के पक्ष का समर्थन करते हुए कहा कि बिना प्रकाशित और आधिकारिक रूप से स्वीकृत सामग्री पर चर्चा करना उचित नहीं है.

राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को 2026 के राजनीतिक परिदृश्य से जोड़कर भी देखा जा रहा है. कांग्रेस इस मामले को राष्ट्रवाद और सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने के अवसर के रूप में देख रही है. पार्टी का कहना है कि सरकार चीन के मुद्दे पर पारदर्शिता नहीं बरत रही और संसद में जवाब देने से बच रही है. कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि यदि आरोप निराधार हैं, तो सरकार खुली चर्चा से क्यों डर रही है.

वहीं भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा है कि कांग्रेस जानबूझकर सेना और सरकार के बीच दरार दिखाने की कोशिश कर रही है. भाजपा नेताओं का कहना है कि सेना देश की सबसे विश्वसनीय संस्था है और उस पर राजनीति करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. सत्तापक्ष का यह भी कहना है कि राहुल गांधी बार-बार चीन जैसे संवेदनशील विषय पर बयान देकर देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं.

इस विवाद ने संसद के बाहर भी राजनीतिक हलचल तेज कर दी है. कांग्रेस समर्थक इसे सरकार की कथित विफलताओं का सबूत बता रहे हैं, जबकि भाजपा समर्थक इसे विपक्ष की गैर-जिम्मेदार राजनीति करार दे रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा ट्रेंड कर रहा है, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने दावे और तर्क पेश कर रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले समय में और तूल पकड़ सकता है. चीन, सीमा सुरक्षा और सैन्य निर्णय जैसे मुद्दे हमेशा से भारतीय राजनीति में संवेदनशील रहे हैं. ऐसे में किसी पूर्व सेना प्रमुख की किताब से जुड़े कथित खुलासों का संसद में उठना स्वाभाविक रूप से बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है. विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस इस मुद्दे को सरकार की जवाबदेही तय करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है, जबकि भाजपा इसे राष्ट्रहित और सुरक्षा के नाम पर दबाने की रणनीति अपना रही है.

फिलहाल, यह स्पष्ट है कि फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी अब केवल एक किताब नहीं रह गई है. यह सत्ता और विपक्ष के बीच सियासी जंग का केंद्र बन चुकी है. संसद के भीतर और बाहर जारी यह टकराव आने वाले दिनों में राजनीतिक विमर्श को और तेज कर सकता है. अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि क्या सरकार विपक्ष की मांग पर इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा के लिए तैयार होती है या फिर यह विवाद राजनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित रह जाएगा.