जबलपुर. नगर निगम मुख्यालय में आयोजित समीक्षा बैठक ने यह संकेत दे दिया है कि अब सीएम हेल्पलाइन महज शिकायत दर्ज कराने का माध्यम नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का वास्तविक पैमाना बन चुकी है. निगमायुक्त राम प्रकाश अहिरवार ने अधिकारियों को स्पष्ट शब्दों में चेताया कि परंपरागत सुस्त कार्यप्रणाली को त्यागकर “स्मार्ट गवर्नेंस” की दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे. यह बैठक केवल औपचारिक समीक्षा नहीं, बल्कि प्रशासनिक सोच में बदलाव का संकेत मानी जा रही है.
बैठक में यह बात उभरकर सामने आई कि सीएम हेल्पलाइन 181 पर आने वाली शिकायतें दरअसल शहर के बुनियादी ढांचे की वास्तविक तस्वीर पेश करती हैं. किस वार्ड में पानी की समस्या अधिक है, कहाँ सड़कें जर्जर हैं, किन क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइट या सफाई की शिकायतें ज्यादा हैं—इन सभी का डेटा प्रशासन को एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण प्रदान करता है. यदि इन शिकायतों को केवल “निराकरण” तक सीमित न रखकर “डेटा इंटेलिजेंस” के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो यह शहर नियोजन की दिशा बदल सकता है.
निगमायुक्त ने दो टूक कहा कि 2026 का दौर पारंपरिक फाइल संस्कृति का नहीं, बल्कि रियल टाइम रिस्पॉन्स का है. जनता अब डिजिटल माध्यम से तुरंत समाधान की अपेक्षा करती है. ऐसे में हेल्पलाइन पर लंबित शिकायतें केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि विश्वास में दरार का संकेत हैं. उन्होंने अधिकारियों से कहा कि हर शिकायत को अवसर की तरह देखें—यह अवसर है अपनी कार्यक्षमता सिद्ध करने का.
समीक्षा बैठक में सीएम इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई. निर्माण कार्यों में देरी को अब अस्वीकार्य बताते हुए अधिकारियों को “मिशन मोड” पर काम करने के निर्देश दिए गए. विशेष रूप से स्वच्छ सर्वेक्षण 2026 की तैयारी, राजस्व लक्ष्य की प्राप्ति और पीएम स्वनिधि योजना के क्रियान्वयन को निगम की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया.
स्वच्छ सर्वेक्षण 2026 के संदर्भ में यह स्पष्ट किया गया कि रैंकिंग केवल प्रचार से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सफाई व्यवस्था और नागरिक सहभागिता से सुधरेगी. वहीं राजस्व वसूली को नगर विकास की रीढ़ बताया गया. बकाया करों की वसूली में ढिलाई को सीधे विकास कार्यों में बाधा के रूप में चिन्हित किया गया. पीएम स्वनिधि योजना के अंतर्गत रेहड़ी-पटरी व्यापारियों को लाभ पहुंचाना आर्थिक समावेशन की दिशा में आवश्यक कदम बताया गया.
इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सीएम हेल्पलाइन को “जवाबदेही और सेवा का संगम” कहा गया. जब कोई नागरिक 181 पर कॉल करता है, तो वह केवल शिकायत नहीं करता वह व्यवस्था पर भरोसा जताता है. यदि उस भरोसे का जवाब समय पर और संतोषजनक तरीके से नहीं दिया जाता, तो प्रशासन की साख प्रभावित होती है. इसलिए अब हर विभाग के लिए हेल्पलाइन प्रदर्शन एक प्रकार का “परफॉर्मेंस इंडिकेटर” बन गया है.
समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो यह कदम प्रशासनिक सुधार की दिशा में सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या निर्देश धरातल पर उतारे जाते हैं या नहीं. पूर्व में भी कई बैठकों में मिशन मोड और स्मार्ट गवर्नेंस जैसे शब्दों का उपयोग हुआ है, किंतु स्थायी परिणाम सीमित रहे हैं. इस बार अंतर यह हो सकता है कि हेल्पलाइन डेटा को नीति निर्माण का आधार बनाया जाए.
बैठक में विभागों के बीच बेहतर समन्वय पर भी विशेष जोर दिया गया. कई शिकायतें ऐसी होती हैं जो एक से अधिक विभागों से जुड़ी होती हैं—जैसे सड़क खुदाई के बाद मरम्मत, नाली निर्माण के साथ जल निकासी, या स्ट्रीट लाइट और विद्युत विभाग का समन्वय. यदि विभागीय तालमेल मजबूत नहीं होगा, तो समाधान अधूरा रहेगा और शिकायत दोबारा दर्ज होगी. निगमायुक्त ने स्पष्ट किया कि साझा लक्ष्य तभी हासिल होंगे जब हर विभाग टीम भावना से कार्य करेगा.
नई दृष्टि से देखें तो सीएम हेल्पलाइन अब “रिएक्टिव” नहीं बल्कि “प्रोएक्टिव” प्रशासन का आधार बन सकती है. यदि शिकायतों के पैटर्न का विश्लेषण कर यह तय किया जाए कि किस क्षेत्र में स्थायी समाधान आवश्यक है, तो बार-बार आने वाली समस्याओं को जड़ से खत्म किया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर यदि किसी वार्ड से लगातार जलभराव की शिकायतें आ रही हैं, तो केवल अस्थायी सफाई नहीं, बल्कि ड्रेनेज प्लान की पुनर्रचना की जरूरत होगी.
जबलपुर नगर निगम की यह सक्रियता संकेत देती है कि प्रशासन अब डिजिटल प्लेटफॉर्म को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि रणनीतिक उपकरण के रूप में देखने लगा है. हालांकि चुनौती यह भी है कि शिकायतों के निराकरण में केवल “क्लोजर” दिखाने की प्रवृत्ति न बढ़े, बल्कि वास्तविक समाधान सुनिश्चित हो. अन्यथा आंकड़ों में सुधार तो दिखेगा, लेकिन जमीनी असंतोष बरकरार रहेगा.
कुल मिलाकर, यह बैठक प्रशासनिक सोच में बदलाव का संकेत देती है. सीएम हेल्पलाइन अब सुशासन का दर्पण बन चुकी है, जिसमें न केवल जनता की समस्याएं दिखाई देती हैं, बल्कि अधिकारियों की कार्यशैली भी प्रतिबिंबित होती है. आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि “स्मार्टनेस” और “मिशन मोड” के शब्द वास्तविक परिवर्तन में बदलते हैं या फिर केवल बैठक कक्ष तक सीमित रह जाते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

