फेमिनिस्ट एक्टिविज़्म और मानवाधिकार पर वैश्विक मंथन में गूंजा पर्यावरण न्याय और कानूनी सुधार का स्वर

फेमिनिस्ट एक्टिविज़्म और मानवाधिकार पर वैश्विक मंथन में गूंजा पर्यावरण न्याय और कानूनी सुधार का स्वर

प्रेषित समय :19:11:04 PM / Tue, Mar 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भोपाल. 1 मार्च 2026 को अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे दिन विचारों, विमर्श और नीतिगत प्रतिबद्धताओं का एक सशक्त संगम देखने को मिला, जब आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, इंडिया ने देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों और संगठनों के सहयोग से आयोजित चार दिवसीय सम्मेलन के अंतर्गत दो महत्वपूर्ण सत्रों का सफल संचालन किया। “फेमिनिस्ट एक्टिविज़्म और ह्यूमन राइट्स: ग्लोबल और लोकल नज़रिए से महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर फिर से सोचना” विषय पर केंद्रित यह संगोष्ठी वैश्विक स्तर पर महिलाओं के अधिकार, पर्यावरण न्याय और कानूनी हस्तक्षेपों पर गहन चिंतन का मंच बनकर उभरी है।

दिन का पहला सत्र “इको-फेमिनिस्ट एक्टिविज़्म और एनवायर्नमेंटल जस्टिस” विषय पर आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता प्रोफेसर प्रमोद कुमार वर्मा ने की तथा समन्वयन डॉ. सीमा शुक्ला द्वारा किया गया। सत्र में पर्यावरण और नारीवादी आंदोलनों के अंतर्संबंधों पर गंभीर चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि पर्यावरणीय संकटों का प्रभाव महिलाओं पर विशेष रूप से पड़ता है, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में, जहां जल, भूमि और वन संसाधनों पर निर्भरता अधिक है।

इस सत्र में सुश्री आशिमा कौल, जो यकजाह रिकॉन्सिलिएशन एंड डेवलपमेंट नेटवर्क की फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी के बिना शांति और पर्यावरणीय न्याय की कल्पना अधूरी है। उन्होंने कहा कि इको-फेमिनिज़्म केवल एक सिद्धांत नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर परिवर्तन का माध्यम है।

श्री राजकुमार घोष, IRS, इनकम टैक्स कमिश्नर, भोपाल ने प्रशासनिक दृष्टिकोण से पर्यावरणीय नीतियों और लैंगिक न्याय के समन्वय पर प्रकाश डाला। डॉ. राजेश त्रिपाठी और डॉ. संजय भूटानी, जो UPES से जुड़े हैं, ने अकादमिक शोध और नीति निर्माण के बीच पुल बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को केवल शोध तक सीमित न रहकर सामाजिक बदलाव के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

सत्र का मुख्य आकर्षण कीनोट एड्रेस रहा, जिसे जर्मनी से पधारे डॉ. उलरिक बर्क, प्रेसिडेंट, German Association of Homa Therapy ने संबोधित किया। उन्होंने पर्यावरणीय शुद्धिकरण और सामुदायिक स्वास्थ्य के लिए पारंपरिक और वैकल्पिक पद्धतियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रकृति और मानव के बीच संतुलन स्थापित किए बिना सतत विकास संभव नहीं है। उनका व्याख्यान वैश्विक दृष्टिकोण और स्थानीय क्रियान्वयन के बीच सामंजस्य की ओर संकेत करता रहा।

मुख्य अतिथि वक्तव्य UNIDO के विजिटिंग साइंटिस्ट तथा संगम विश्वविद्यालय और सनराइज विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार गोस्वामी ने दिया। उन्होंने औद्योगिक विकास, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और लैंगिक समानता के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विकास की कोई भी अवधारणा तब तक अधूरी है जब तक उसमें महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित न हो।

सत्र को प्रोफेसर प्रमोद कुमार वर्मा, कुलपति, महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, जबलपुर के अध्यक्षीय भाषण ने और अधिक सारगर्भित बना दिया। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय दार्शनिक परंपराओं में प्रकृति और नारी को समान रूप से सृजन की शक्ति माना गया है, अतः इको-फेमिनिज़्म की जड़ें भारतीय चिंतन में भी विद्यमान हैं। सत्र का समापन धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ, जिसमें सभी प्रतिभागियों के योगदान की सराहना की गई।

दूसरा सत्र “कानूनी और नीतिगत हस्तक्षेप” विषय पर केंद्रित रहा, जिसमें महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा, डिजिटल अरेस्ट की नई प्रवृत्ति, साइबर सुरक्षा और संस्थागत सुधारों पर गंभीर विमर्श हुआ। सत्र की अध्यक्षता डॉ. जी.के. गोस्वामी ने की, जबकि समन्वयन डॉ. इरमाला दयाल, प्राचार्य, वी.टी. चोकसी सार्वजनिक लॉ कॉलेज द्वारा किया गया।

इस सत्र में डॉ. सीमा शुक्ला और डॉ. एस.एस. हस्सानी ने व्यावहारिक अनुभवों और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि कानूनों की प्रभावशीलता केवल उनके निर्माण में नहीं, बल्कि उनके सख्त और संवेदनशील क्रियान्वयन में निहित है। उन्होंने बताया कि साइबर अपराधों में बढ़ोतरी ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए नए प्रकार की चुनौतियां उत्पन्न की हैं, जिनसे निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है।

मुख्य वक्तव्य प्रो. विनय कपूर मेहरा, फाउंडर वाइस चांसलर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, सोनीपत, हरियाणा ने दिया। उन्होंने कहा कि कानूनी शिक्षा को जेंडर सेंसिटिव बनाना समय की मांग है। उन्होंने सुझाव दिया कि विधि विश्वविद्यालयों को महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े मामलों पर विशेष क्लीनिक और लीगल एड सेल स्थापित करने चाहिए, ताकि पीड़ितों को त्वरित सहायता मिल सके।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ. जी.के. गोस्वामी, IPS, जो उत्तर प्रदेश में एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस और यूपी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज के फाउंडर डायरेक्टर हैं, ने अपने वक्तव्य में कहा कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड जैसे मामलों में तकनीकी दक्षता और कानूनी जागरूकता दोनों आवश्यक हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस और अकादमिक संस्थानों के बीच सहयोग से बेहतर प्रशिक्षण और अनुसंधान संभव हो सकता है, जिससे अपराध नियंत्रण की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।

सत्र में यह भी रेखांकित किया गया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा केवल सामाजिक समस्या नहीं बल्कि मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन है। नीति निर्माताओं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज संगठनों के बीच समन्वित प्रयासों के बिना इस चुनौती से निपटना संभव नहीं है। वक्ताओं ने संस्थागत सुधारों, जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम्स और प्रगतिशील नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता पर बल दिया।

दिन भर चले इन दोनों सत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया कि नारीवादी सक्रियता अब केवल विरोध या आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नीतिगत विमर्श, पर्यावरणीय न्याय, तकनीकी सुरक्षा और कानूनी सुधारों के साथ एक व्यापक सामाजिक परिवर्तन का रूप ले चुकी है। सम्मेलन ने वैश्विक और स्थानीय दृष्टिकोणों को एक मंच पर लाकर यह संदेश दिया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मुद्दे पर पुनर्विचार और पुनर्संरचना की आवश्यकता है।

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का यह तीसरा दिन विचारों की गहराई, संवाद की गंभीरता और समाधान की दिशा में ठोस प्रतिबद्धताओं के साथ संपन्न हुआ। यह सम्मेलन दुनिया भर के विद्वानों, चिकित्सकों और नीति निर्माताओं को एक साथ लाकर नारीवादी सक्रियता, मानवाधिकार और पर्यावरण न्याय पर निरंतर संवाद का वैश्विक मंच प्रदान करता रहेगा, जिससे भविष्य में अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की दिशा में ठोस पहल संभव हो सके।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-