तेल-गैस प्रोजेक्ट्स की रफ्तार थमी 15 साल में शुरू हो रहा प्रोडक्शन इंडस्ट्री के गोल्डन पीरियड से तीन गुना सुस्त

तेल-गैस प्रोजेक्ट्स की रफ्तार थमी 15 साल में शुरू हो रहा प्रोडक्शन इंडस्ट्री के गोल्डन पीरियड से तीन गुना सुस्त

प्रेषित समय :19:16:32 PM / Tue, Mar 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. तेल और गैस उद्योग कभी अपनी रफ्तार के लिए जाना जाता था. खोज हुई, विकास योजना बनी और चार-पांच वर्षों के भीतर उत्पादन शुरू हो जाता था. लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है. मार्च 2026 में जारी एक नई रिपोर्ट बताती है कि 2025 में जिन ऑयल और गैस फील्ड्स ने कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू किया, उन्हें खोज से लेकर उत्पादन तक पहुंचने में औसतन 15.1 साल लगे.

यह आंकड़ा 1960 से 1980 के बीच के तथाकथित ‘गोल्डन पीरियड’ से बेहद अलग है, जब औसत विकास समय केवल 4.9 वर्ष था. यानी आज विकास चक्र लगभग तीन गुना लंबा हो चुका है. यह विश्लेषण Global Energy Monitor के डेटाबेस पर आधारित है, जिसे नियमित रूप से अपडेट किया जाता है. रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2020 के बीच औसत समय करीब 16 वर्ष तक पहुंच गया था. वर्ष 2019 में यह 20.7 वर्ष रहा, जिसमें कई बड़े रूसी प्रोजेक्ट्स की देरी ने औसत को ऊपर खींचा.

विश्लेषण साफ संकेत देता है कि उद्योग अब आसान और सतही भंडारों से आगे बढ़ चुका है. कंपनियां अब गहरे समुद्र, हाई-प्रेशर रिज़र्व और तकनीकी रूप से जटिल संरचनाओं में निवेश कर रही हैं. ऑफशोर प्रोजेक्ट्स, ऑनशोर की तुलना में औसतन तीन वर्ष अधिक लेते हैं. गहरे समुद्र में ड्रिलिंग, सबसी इंफ्रास्ट्रक्चर, पाइपलाइन कनेक्टिविटी और प्रोसेसिंग सुविधाएं स्थापित करना समय और लागत दोनों की दृष्टि से भारी पड़ता है.

International Energy Agency पहले ही अपने आकलनों में संकेत दे चुका है कि आसानी से सुलभ तेल और गैस भंडार काफी हद तक समाप्त हो चुके हैं. अब छोटे, गहरे और अधिक चुनौतीपूर्ण फील्ड्स शेष हैं, जिनका विकास स्वाभाविक रूप से अधिक समय मांगता है.

लेकिन 15 वर्ष का विकास चक्र केवल तकनीकी चुनौती का संकेत नहीं है. यह वित्तीय और नीतिगत जोखिम की भी कहानी है. आज यदि कोई नया फील्ड खोजा जाता है, तो उसके 2030 के दशक के उत्तरार्ध या उससे आगे जाकर उत्पादन शुरू करने की संभावना है. तब तक वैश्विक ऊर्जा बाजार, जलवायु नीतियां और मांग के पैटर्न में बड़ा बदलाव आ सकता है.

IEA के नेट-ज़ीरो परिदृश्य में अपस्ट्रीम तेल और गैस निवेश समय के साथ घटता दिखाया गया है. इसका अर्थ यह है कि जिन परियोजनाओं में आज अरबों डॉलर का निवेश किया जा रहा है, वे ऐसे समय में उत्पादन शुरू कर सकती हैं जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों की ओर अधिक प्रतिबद्ध हो चुकी होगी. यह निवेशकों के लिए रणनीतिक दुविधा पैदा करता है—क्या लंबी अवधि का यह दांव भविष्य की नीति और बाजार वास्तविकताओं के अनुरूप होगा?

रिपोर्ट के सह-लेखक और प्रोजेक्ट मैनेजर स्कॉट ज़िमरमैन के अनुसार, “पंद्रह वर्ष का विकास चक्र दर्शाता है कि कंपनियां अत्यधिक अनिश्चित भविष्य पर लंबी अवधि का दांव लगा रही हैं. ऐसे समय में जब कार्बन नियमन सख्त हो रहे हैं और तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, महंगे और जटिल प्रोजेक्ट्स का पीछा करना वित्तीय रूप से जोखिम भरा हो सकता है.” उनका तर्क है कि निवेश को मांग में कमी, ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर स्थानांतरित किया जाना चाहिए, जो दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं.

लंबी विकास समयसीमा का एक और बड़ा अर्थ है—स्ट्रैंडेड एसेट का जोखिम. जब किसी परियोजना में पूंजी 10-15 वर्षों तक लॉक रहती है और राजस्व उत्पन्न नहीं होता, तब लागत बढ़ने, नियामकीय बदलाव और बाजार में मांग कम होने का खतरा भी बढ़ जाता है. यदि भविष्य में जीवाश्म ईंधनों की वैश्विक मांग अपेक्षा से कम रहती है, तो ऐसे प्रोजेक्ट्स से अपेक्षित रिटर्न नहीं मिल पाएगा.

कॉस्ट ओवररन, फाइनेंसिंग लागत में वृद्धि और नीतिगत अनिश्चितता मिलकर निवेशकों के लिए चुनौती पैदा कर सकती है. शेयरहोल्डर वैल्यू, कर्ज संरचना और दीर्घकालिक मांग अनुमान सभी पर दबाव आ सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पूंजी का यह आवंटन रणनीतिक रूप से उचित है.

ऊर्जा संक्रमण के वर्तमान दौर में यह बहस और भी प्रासंगिक हो जाती है. दुनिया तेजी से विद्युतीकरण, सोलर और विंड ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज और ऊर्जा दक्षता की दिशा में आगे बढ़ रही है. कई देशों ने 2050 या उससे पहले नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है. ऐसे में 15 वर्ष लंबी परियोजनाएं नीतिगत और बाजार संकेतों के साथ किस हद तक तालमेल बैठा पाएंगी, यह अनिश्चित है.

यह भी सच है कि तेल और गैस की मांग तत्काल समाप्त नहीं होने वाली. परिवहन, पेट्रोकेमिकल्स और कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में इनकी भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है. लेकिन प्रश्न यह है कि क्या नए और महंगे अपस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स उस संक्रमणकालीन भविष्य में आर्थिक रूप से व्यवहार्य रहेंगे, जहां मांग धीरे-धीरे स्थिर या घट सकती है.

तेल और गैस उद्योग की घड़ी अब पहले जैसी तेजी से नहीं चल रही. खोज से उत्पादन तक का सफर लंबा और जटिल हो गया है. तकनीकी चुनौतियां, वित्तीय जोखिम और नीतिगत अनिश्चितता मिलकर एक नया परिदृश्य रच रही हैं. यह परिदृश्य संकेत देता है कि ऊर्जा क्षेत्र में पूंजी आवंटन के फैसले अब केवल संसाधन उपलब्धता पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जलवायु और बाजार रणनीति पर भी निर्भर होंगे.

स्पष्ट है कि 15 वर्ष की विकास समय सीमा केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि ऊर्जा अर्थशास्त्र और संक्रमण की दिशा में बदलते वैश्विक परिदृश्य का संकेत है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-