पटना से अनिल मिश्र की रिपोर्ट
पूरे देश में जहां होली की मस्ती और रंगों की बौछार है, वहीं बिहार की राजधानी पटना में राजनीतिक गलियारों में सियासी रंग कुछ ज्यादा ही गहरा हो गया है. बिहार की पारंपरिक ‘कुर्ता फाड़ होली’ के बीच इस बार सत्ता परिवर्तन की चर्चा ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है. होली के बाद प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें तेज हो गई हैं और चर्चा इस बात की है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा का रुख कर सकते हैं. यदि ऐसा होता है तो बिहार में पहली बार भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो सकता है.
राजधानी पटना में पिछले 24 घंटों के घटनाक्रम ने इन अटकलों को और मजबूती दी है. सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री आवास पर लगातार बैठकों का दौर जारी है. जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का दिल्ली से पटना आना और एक ही दिन में मुख्यमंत्री से दो बार एकांत मुलाकात करना कई सवाल खड़े कर रहा है. इसके अलावा जदयू के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री विजेंद्र यादव समेत कई मंत्रियों की सक्रियता ने राजनीतिक सरगर्मी को बढ़ा दिया है.
इसी बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सभी विधायकों को पटना तलब किए जाने की खबर ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है. माना जा रहा है कि आने वाले 24 घंटे बिहार की राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं. राज्यसभा की पांच सीटों के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है और नामांकन की अंतिम तिथि पांच मार्च निर्धारित है, जबकि मतगणना 16 मार्च को होगी. ऐसे में अगर मुख्यमंत्री राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करते हैं तो यह बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा.
मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर भी कयासों का दौर शुरू हो चुका है. भाजपा खेमे में मौजूदा डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे चल रहा है. उन्हें सरकार में नंबर दो की हैसियत प्राप्त है और संगठन तथा सत्ता दोनों में मजबूत पकड़ मानी जाती है. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय का नाम भी चर्चा में है. वहीं यह भी अटकलें हैं कि भाजपा किसी नए चेहरे को आगे कर सबको चौंका सकती है, जैसा उसने हाल के वर्षों में अन्य राज्यों में किया है.
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि मुख्यमंत्री अपने पसंदीदा चेहरे को आगे बढ़ा सकते हैं या फिर सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है. हालांकि इन सभी संभावनाओं पर अभी आधिकारिक रूप से कुछ भी स्पष्ट नहीं है. भाजपा ने फिलहाल संयम बरत रखा है, लेकिन अंदरखाने मंथन जारी है.
इन अटकलों के बीच एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने इकलौते बेटे निशांत कुमार को राजनीति में आने की सहमति दे दी है. यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि मुख्यमंत्री लंबे समय से वंशवाद की राजनीति के विरोधी रहे हैं. उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से परिवारवाद पर निशाना साधा और अपनी राजनीति को इससे अलग बताया. लेकिन अब निशांत के राजनीति में प्रवेश की खबर ने सियासी समीकरण बदल दिए हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव पर परिवारवाद को लेकर लगातार हमला बोलने वाले मुख्यमंत्री के इस फैसले को लेकर विपक्ष हमलावर हो सकता है. हालांकि जदयू के भीतर इसे लेकर उत्साह का माहौल है. जदयू नेता श्रवण कुमार ने होली से एक दिन पहले बयान देकर संकेत दिया कि निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री की औपचारिक घोषणा एक-दो दिन में हो सकती है. उन्होंने कहा कि पार्टी और युवाओं के बीच लंबे समय से यह मांग उठ रही थी और अब रास्ता साफ हो गया है.
जैसे ही यह खबर फैली, पटना स्थित जदयू प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने मिठाइयां बांटी और गुलाल लगाकर जश्न मनाया. पार्टी कार्यालय की दीवारों पर पहले से लगे पोस्टर भी इस बात का संकेत दे रहे थे कि संगठन के भीतर निशांत को आगे बढ़ाने की तैयारी चल रही थी. कार्यकर्ताओं ने इसे नए नेतृत्व की शुरुआत के रूप में देखा, जबकि राजनीतिक विश्लेषक इसे सत्ता हस्तांतरण की रणनीति मान रहे हैं.
इधर राज्यसभा चुनाव को लेकर भी तस्वीर लगभग साफ मानी जा रही है. भाजपा ने दो उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं, जबकि एनडीए खेमे में अन्य नामों को लेकर भी सहमति बन चुकी है. इस बीच 19 विधायकों वाली लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को एक भी सीट न मिलने की चर्चा ने गठबंधन के भीतर हल्की नाराजगी के संकेत दिए हैं. हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई बयान सामने नहीं आया है.
गौरतलब है कि नीतीश कुमार वर्ष 2005 से बिहार की राजनीति के केंद्रीय चेहरे रहे हैं. 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी सेहत को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए थे, लेकिन जनता ने उन पर भरोसा जताया. चुनाव परिणामों में उनकी पार्टी को 85 और भाजपा को 89 सीटें मिलीं, जिसके बाद वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बने. हालांकि चुनाव के दौरान ही उनके बेटे निशांत को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई थीं, जो अब और तेज हो चुकी हैं.
सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री को राज्यसभा भेजने के लिए जरूरी कागजात तैयार कर लिए गए हैं. यदि वे नामांकन दाखिल करते हैं तो यह संकेत होगा कि बिहार में सत्ता की बागडोर किसी नए चेहरे को सौंपी जा सकती है. ऐसे में यह भी संभावना जताई जा रही है कि निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाकर सक्रिय राजनीति में उतारा जाए, जिससे सत्ता और संगठन दोनों में संतुलन साधा जा सके.
फिलहाल पटना के राजनीतिक गलियारों में सिर्फ एक ही चर्चा है—क्या मुख्यमंत्री राज्यसभा जाएंगे और क्या बिहार को नया मुख्यमंत्री मिलेगा. होली के रंगों के बीच सियासी रंग गहराता जा रहा है. अब सबकी नजर पांच मार्च पर टिकी है, जब यह साफ हो सकेगा कि मुख्यमंत्री कौन सा दांव चलते हैं. क्या वे अपने लंबे राजनीतिक अनुभव से एक बार फिर सबको चौंकाएंगे या फिर बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी. आने वाले 24 घंटे इन सवालों का जवाब तय करेंगे और बिहार की सियासत की दिशा भी.