नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के बीच भारत के लिए एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक खबर सामने आई है। देश की जीवनरेखा मानी जाने वाली भारतीय रेलवे अब लगभग पूरी तरह बिजली से चलने की दहलीज़ पर पहुंच गई है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति का संकेत नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और जलवायु प्रतिबद्धताओं की दिशा में भारत की बड़ी रणनीतिक सफलता भी मानी जा रही है।
मार्च 2026 तक भारतीय रेलवे के ब्रॉड गेज नेटवर्क का लगभग 99.4 प्रतिशत हिस्सा इलेक्ट्रिफाई किया जा चुका है। रेलवे के कुल करीब 70,001 किलोमीटर ब्रॉड गेज ट्रैक में से लगभग 69,427 किलोमीटर पर अब बिजली के इंजन दौड़ रहे हैं। यानी देश के विशाल रेल नेटवर्क का लगभग पूरा हिस्सा अब डीज़ल के बजाय बिजली से संचालित हो रहा है। सिर्फ कुछ सीमित रूट ही ऐसे बचे हैं जहां अभी इलेक्ट्रिफिकेशन का काम पूरा होना बाकी है और वे भी पांच राज्यों के छोटे हिस्सों में फैले हुए हैं।
यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने दुनिया के ऊर्जा बाजार को फिर अस्थिर कर दिया है। ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत जैसे देश के लिए यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते देश तक पहुंचता है। अनुमान है कि भारत के करीब 40 प्रतिशत कच्चे तेल और लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी आयात इसी रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरते हैं। ऐसे में यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो इसका असर सीधे ऊर्जा कीमतों, बीमा लागत और आपूर्ति पर पड़ सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में भारतीय रेलवे का तेजी से बिजली आधारित परिवहन प्रणाली की ओर बढ़ना देश के लिए एक तरह का सुरक्षा कवच बनता दिखाई दे रहा है। डीज़ल पर निर्भरता कम होने से न केवल विदेशी तेल पर निर्भरता घटती है बल्कि वैश्विक तेल कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर भी कम पड़ता है।
रेलवे के इलेक्ट्रिफिकेशन का असर डीज़ल खपत में आई बड़ी गिरावट से भी साफ दिखाई देता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय रेलवे ने लगभग 178 करोड़ लीटर डीज़ल की बचत की। अगर इसकी तुलना 2016-17 से की जाए तो डीज़ल खपत में करीब 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इतनी बड़ी बचत से रेलवे की परिचालन लागत में भी उल्लेखनीय कमी आई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली से चलने वाले इंजन डीज़ल इंजनों की तुलना में लगभग 70 प्रतिशत तक अधिक किफायती होते हैं। इसके कारण रेलवे के संचालन में खर्च कम होता है, जिससे यात्रियों के लिए किराए को नियंत्रित रखना भी अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। भारत में हर दिन लगभग 2.6 करोड़ लोग रेल से यात्रा करते हैं, इसलिए रेलवे में होने वाले बदलाव का असर सीधे देश की अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों पर पड़ता है।
रेलवे के इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि बिजली की आपूर्ति को केवल पारंपरिक ग्रिड तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे ने अपने नेटवर्क में नवीकरणीय ऊर्जा, खासकर सौर ऊर्जा, को तेजी से शामिल किया है। इससे रेलवे के कार्बन उत्सर्जन को कम करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया गया है।
2014 में भारतीय रेलवे के पास केवल 3.68 मेगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता थी। लेकिन पिछले एक दशक में इसमें तेजी से वृद्धि हुई है और नवंबर 2025 तक यह क्षमता बढ़कर लगभग 898 मेगावॉट तक पहुंच गई। रेलवे अधिकारियों के अनुसार इस क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा सीधे ट्रेनों के संचालन में इस्तेमाल हो रहा है।
देश भर में अब 2,600 से अधिक रेलवे स्टेशन, कार्यालय और रेलवे से जुड़ी इमारतों पर सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित की जा चुकी है। इससे न केवल बिजली की लागत कम हो रही है बल्कि रेलवे की पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी मजबूत हो रही है।
भारतीय रेलवे ने 2030 तक नेट ज़ीरो कार्बन एमिटर बनने का लक्ष्य भी तय किया है। इसके तहत आने वाले वर्षों में रेलवे की कुल बिजली मांग लगभग 10 गीगावॉट से अधिक होने का अनुमान लगाया गया है। योजना यह है कि इस मांग का बड़ा हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों, विशेष रूप से सौर और पवन ऊर्जा से पूरा किया जाए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के इस प्रयास को एक बड़े उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। ब्रिटेन की संस्था राइडिंग सनबीम्स, जो रेल नेटवर्क में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने पर काम करती है, पिछले कुछ वर्षों से भारत के रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन कार्यक्रम का अध्ययन कर रही है।
संस्था के मुख्य कार्यकारी अधिकारी लियो मरे का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर रेलवे नेटवर्क का तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन करना एक असाधारण उपलब्धि है। उनके अनुसार 2030 तक नेट ज़ीरो का लक्ष्य तय करके भारत दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि बुनियादी ढांचे की योजना को ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों के साथ जोड़ा जा सकता है।
राइडिंग सनबीम्स की भारत प्रतिनिधि महक अग्रवाल के अनुसार भारत में रेल इलेक्ट्रिफिकेशन केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है। यह जलवायु लक्ष्यों, आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्वच्छ बिजली बाजार, सार्वजनिक वित्त और सस्ती परिवहन व्यवस्था को एक साथ जोड़ने वाली व्यापक आर्थिक संरचना का हिस्सा है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इतनी बड़ी परिवर्तनकारी परियोजना के लिए केवल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण पर्याप्त नहीं है। इसके साथ नीति निर्माण, वित्तीय व्यवस्था, तकनीकी नवाचार और मानव संसाधन विकास को भी समान रूप से मजबूत करना जरूरी है।
दिल्ली क्लाइमेट इनोवेशन वीक के दौरान आयोजित एक चर्चा में रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक (वित्त) राहुल कपूर ने कहा कि नीति को अलग-अलग हिस्सों में नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार तकनीक, नीति ढांचा, मानव संसाधन, अर्थशास्त्र और केंद्र व राज्यों के बीच समन्वय को साथ लेकर चलने वाली एक संरचित रणनीति ही ऐसे बदलावों को सफल बना सकती है।
करीब 70 हजार किलोमीटर लंबे रेल नेटवर्क के साथ भारत दुनिया के सबसे बड़े रेलवे तंत्रों में से एक है। इतनी विशाल प्रणाली का लगभग पूरी तरह बिजली पर चलने लगना अपने आप में एक ऐतिहासिक परिवर्तन माना जा रहा है।
ऊपर से देखने पर रेलवे के ऊपर फैले तार और खंभे महज तकनीकी ढांचा लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय प्रतिबद्धता और भविष्य की आर्थिक दिशा से जुड़ी एक गहरी कहानी है। दुनिया जहां तेल और गैस की अनिश्चितता से जूझ रही है, वहीं भारत की पटरियों पर एक शांत लेकिन निर्णायक बदलाव धीरे-धीरे आकार ले रहा है।
डीज़ल इंजनों की आवाज अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है और उसकी जगह ले रही है बिजली से चलने वाली तेज, साफ और अधिक टिकाऊ रेल व्यवस्था। यह बदलाव केवल रेल पटरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के ऊर्जा भविष्य की दिशा भी तय कर रहा है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

