बुधवार 18 मार्च को पड़ रही अमावस्या को लेकर देशभर में गहरी धार्मिक आस्था और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला. विशेष रूप से इस अमावस्या को पितृकार्येषु अमावस्या के रूप में मनाया जा रहा है, जिसके चलते लोगों ने अपने पितरों की शांति और मोक्ष के लिए तर्पण, दान और पूजा-पाठ किए. सुबह से ही नदियों, घाटों और मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जहां लोग विधि-विधान से अपने पूर्वजों को जल अर्पित करते नजर आए.
जबलपुर सहित मध्य प्रदेश के कई जिलों में इस अवसर पर धार्मिक गतिविधियां तेज रहीं. नर्मदा घाटों पर सुबह ब्रह्ममुहूर्त से ही श्रद्धालु पहुंचने लगे थे. लोगों ने पवित्र नदी में स्नान कर तांबे के पात्र से जल अर्पित करते हुए अपने पितरों को स्मरण किया. पंडितों के मार्गदर्शन में विधिपूर्वक तर्पण और पिंडदान की प्रक्रिया संपन्न की गई. कई श्रद्धालु अपने परिवार के साथ घाटों पर पहुंचे और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा की.
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अमावस्या का दिन पितरों को समर्पित माना जाता है और इस दिन किए गए तर्पण और दान का विशेष महत्व होता है. मान्यता है कि इस दिन पितृ लोक के द्वार खुलते हैं और पूर्वज अपने वंशजों के तर्पण को स्वीकार करते हैं. यदि इस दिन श्रद्धा और विधि के अनुसार पूजा की जाए तो पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए भी यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. कई लोग जो अपने जीवन में लगातार बाधाओं, आर्थिक समस्याओं या पारिवारिक कलह का सामना कर रहे होते हैं, वे इस दिन विशेष पूजा और दान कर पितृ दोष को शांत करने का प्रयास करते हैं. पुरोहितों का कहना है कि अमावस्या पर तिल, कुश और जल से तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं.
इस अवसर पर मंदिरों में भी विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया. कई स्थानों पर हवन, भजन-कीर्तन और धार्मिक प्रवचन आयोजित किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया. धार्मिक आयोजनों के चलते मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर नजर आए. वहीं, कई सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं द्वारा गरीबों को भोजन और वस्त्र दान किए गए, जिसे भी इस दिन अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है.
नर्मदा तट पर प्रशासन द्वारा भी सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए थे. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल तैनात रहा और घाटों पर साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा गया. प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे सावधानी बरतें और निर्धारित स्थानों पर ही स्नान और पूजा करें. किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचने के लिए गोताखोरों और राहत दल को भी तैनात किया गया था.
महिलाओं और बुजुर्गों में भी इस दिन को लेकर खास उत्साह देखने को मिला. कई लोग दूर-दराज के इलाकों से अपने शहरों में स्थित पवित्र नदियों और तीर्थ स्थलों पर पहुंचे. श्रद्धालुओं का मानना है कि वर्ष भर में आने वाली अमावस्याओं में यह दिन विशेष रूप से पितरों के तर्पण के लिए अत्यंत फलदायी होता है.
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी इस दिन को महत्वपूर्ण माना जाता है. जानकारों के अनुसार इस अमावस्या पर किए गए उपाय जैसे सूर्य को अर्घ्य देना, ब्राह्मणों को दान करना और जरूरतमंदों की सहायता करना व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाता है. इससे न केवल पितृ दोष शांत होता है बल्कि मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन भी प्राप्त होता है.
इसके अलावा, कई श्रद्धालुओं ने अपने घरों में भी पूजा-अर्चना कर पितरों को याद किया. घरों में दीप जलाकर और विशेष मंत्रों का जाप कर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई. ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस दिन का विशेष महत्व देखा गया, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-पाठ और दान की परंपरा निभाई गई.
इस पूरे दिन धार्मिक आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला. लोगों ने अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और उनके आशीर्वाद की कामना की. अमावस्या के इस पावन अवसर ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति में पूर्वजों का सम्मान और स्मरण कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता है.
कुल मिलाकर 18 मार्च की यह अमावस्या श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक बनकर सामने आई, जहां हर व्यक्ति ने अपने-अपने तरीके से पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित की और जीवन में सुख-शांति की कामना की.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

