हर 6 में से 1 इंसान रोज़ झेल रहा खतरनाक गर्मी क्लाइमेट चेंज बना जिंदगी की सच्चाई

हर 6 में से 1 इंसान रोज़ झेल रहा खतरनाक गर्मी क्लाइमेट चेंज बना जिंदगी की सच्चाई

प्रेषित समय :18:36:59 PM / Wed, Mar 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. दुनिया भर में मौसम के बदलते पैटर्न अब सिर्फ वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि आम लोगों के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं. सर्दियों के माने जाने वाले दिसंबर से फरवरी के महीनों में भी जिस तरह से असामान्य गर्मी दर्ज की गई है, उसने जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को एक बार फिर उजागर कर दिया है. एक हालिया वैश्विक विश्लेषण के मुताबिक, इस अवधि के दौरान दुनिया में हर छह में से एक व्यक्ति प्रतिदिन ऐसे तापमान का सामना कर रहा था, जिस पर मानवजनित जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट प्रभाव था.

अमेरिका स्थित शोध संस्था क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है. रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच वैश्विक स्तर पर बड़ी आबादी लगातार ऐसे तापमान के संपर्क में रही, जो सामान्य प्राकृतिक परिस्थितियों की तुलना में कहीं अधिक था और जिसका सीधा संबंध मानवीय गतिविधियों से है.

इस विश्लेषण के लिए क्लाइमेट शिफ्ट इंडेक्स का उपयोग किया गया, जो यह मापता है कि किसी दिन का तापमान प्राकृतिक जलवायु के मुकाबले कितना असामान्य है और उसमें जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका है. इस सूचकांक के आधार पर यह पाया गया कि दुनिया के कई हिस्सों में तापमान सामान्य सीमा से काफी ऊपर था और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही.

रिपोर्ट बताती है कि लगभग 2.5 अरब लोग, जो 124 देशों में रहते हैं, कम से कम 30 दिनों तक ऐसे तापमान में रहे जो स्पष्ट रूप से जलवायु परिवर्तन से प्रभावित थे. यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का संकेत है कि यह समस्या किसी एक क्षेत्र या महाद्वीप तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर फैल चुकी है. इससे यह भी साफ होता है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल दीर्घकालिक प्रवृत्तियों में नहीं, बल्कि दैनिक मौसम के अनुभव में भी दिखाई दे रहा है.

इस अवधि में 47 देशों में ऐसे दिन दर्ज किए गए, जब तापमान मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच गया था. विशेष रूप से ध्यान देने वाली बात यह है कि इन सभी खतरनाक गर्मी वाले दिनों को पूरी तरह से जलवायु परिवर्तन से जुड़ा पाया गया. इसका मतलब यह है कि यदि मानवजनित जलवायु परिवर्तन न होता, तो इन देशों में इतनी तीव्र गर्मी का अनुभव नहीं होता.

रिपोर्ट के अनुसार करीब 22.5 करोड़ लोगों ने 30 दिन या उससे अधिक समय तक ऐसी गर्मी झेली, जिसे ‘रिस्की हीट’ की श्रेणी में रखा गया है. यह वह स्तर है, जहां तापमान का प्रभाव सीधे मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है और हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. इन प्रभावित लोगों में से लगभग 81 प्रतिशत अफ्रीका में रहते हैं, जो यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन का असर सबसे अधि

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-