उदयपुर. इस वक्त पूरी दुनिया युद्ध की आशंका के घेरे में हैं, क्योंकि कोई नहीं जानता की आगे क्या होगा।
एक बम पड़ेगा ने हेत्ती दुनिया नी लापी बणी जाएगा, दुनिया में हथियारों के दुरूपयोग के कुपरिणाम दर्शानेे वाला यह लोकप्रिय डायलॉग वर्ष 1972 में नवांगाव में पहली वागड़ी फिल्म के निर्देशक प्रदीप द्विवेदी के वागड़ी एकाभिनय से था।
इसी एकाभिनय के बाद वागड़ी की सरकारी मान्यता को लेकर पहला विवाद हुआ था, लेकिन बाद में इस विवाद को समाप्त करते हुए उस एकाभिनय को प्रथम स्थान देकर वागड़ी को मान्यता दी गई थी। इसके बाद इस वागड़ी एकाभिनय का कोठी भवन, बांसवाड़ा में भी भव्य प्रदर्शन हुआ था। दक्षिण राजस्थान में बांसवाड़ा, डूंगरपुर और आसपास के क्षेत्र में बोली जानेवाली वागड़ी के अस्तित्व बचाने के लिए वागड़वासियों ने बड़ा संघर्ष किया है।
सबसे बड़ा संघर्ष तो आठवें दशक में तब हुआ, जब कथित राजस्थानी भाषा की मान्यता के विरोध में वागड़ से स्वर बुलंद हुए।
पहली वागड़ी फिल्म के प्रमुख अभिनेता भंवर पंचाल बताते हैं कि- वागड़ के प्रमुख लेखकों ईश्वरलाल वैश्य, शैलेंद्र उपाध्याय आदि ने न केवल कथित राजस्थानी भाषा का विरोध किया, वरन पूरे प्रदेश में भाषाई जागृति का कार्य किया।
वागड़ी का अस्तित्व बनाए रखने में वागड़वासियों का बड़ा योगदान रहा है, आज भी लाखों लोग वागड़ी का उपयोग करते हैं।
वागड़ी के संरक्षण के लिए भी कई प्रयास हुए हैं, सातवें दशक में प्रदीप-भंवर का वागड़ी सीखें, वागड़ी कहावतें कॉलम छपता था।
वर्ष 1973 के कर्मचारी महासंघ के आंदोलन के दौरान वागड़ी गीत, कविताओं का दौर शुरू हुआ, प्रसिद्ध कवि श्याम अश्याम की- लाल लाल माइलो, खाना है तो खाई लो, ही नहीं, अरे बरकत मोडे बोल जैसे वागड़ी गीत भी काफी लोकप्रिय हुए।
अस्सी के दशक में पहली वागड़ी फिल्म तणवाटे के निर्माण ने वागड़ी को एक बार फिर सरकारी मान्यता दी, जब जिला प्रशासन द्वारा निर्देशक प्रदीप द्विवेदी और संगीत निर्देशक शाहिद मीर खान को पुरस्कृत किया गया। इस फिल्म का गीत- काम मले तो काम करं ने ने मले ताे हूं करं, काफी लोकप्रिय हुआ।
वागड़ी की लोकप्रियता को वागड़ी कवि सम्मेलनों ने नई उंचाइयां दी। प्रसिद्ध वागड़ी कवि हरीश आचार्य, ब्रजमोहन तूफान जैसे वागड़ी कवियों का इसमें बहुत बड़ा योगदान रहा है। हरीश आचार्य ने तो कई विधाओं में वागड़ी का उपयोग किया है।
आजकल वागड़ी में बहुत अच्छी रील, गरबे, वीडियो आदि भी बन रहे हैं।
वागड़ी शब्दकोश के लिए शैलेंद्र उपाध्याय, अर्जुनलाल कुमुद, घनश्याम प्यासा आदि के प्रयास उल्लेखनीय हैं।
वागड़ी के लिए ज्योतिपूंज, उपेंद्र अणु, हिम्मतलाल तरंगी, जगन्नाथ तैली जैसे अनेक लेखक तो सक्रिय रहे ही हैं, वागड़ी में अनेक पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं।
साक्षरता अभियान के दौरान वागडी का खूब प्रयोग हुआ।
वागड़ी को समझने के लिए वागड़ी भाषा प्रवेशिका अच्छी किताब है!
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

