धार भोजशाला विवाद में हाईकोर्ट के जजों ने खुद संभाली कमान और परिसर का किया गहन मुआयना

धार भोजशाला विवाद में हाईकोर्ट के जजों ने खुद संभाली कमान और परिसर का किया गहन मुआयना

प्रेषित समय :21:56:29 PM / Sat, Mar 28th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

धार. मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंचती नजर आ रही है. शनिवार, 28 मार्च 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के माननीय न्यायाधीशों ने स्वयं घटनास्थल पर पहुंचकर वस्तुस्थिति का जायजा लिया. जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने दोपहर के समय कड़े सुरक्षा घेरे के बीच भोजशाला परिसर का निरीक्षण किया.

जजों का यह दौरा आगामी 2 अप्रैल 2026 को होने वाली अंतिम और महत्वपूर्ण सुनवाई से ठीक पहले हुआ है, जिसे कानूनी विशेषज्ञ मामले की गंभीरता और बारीकी को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम मान रहे हैं. शनिवार दोपहर करीब 1:50 बजे जब जजों का काफिला धार पहुंचा, तो पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया था. सुरक्षा के मद्देनजर न केवल भोजशाला परिसर, बल्कि आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों और नौगांव स्थित किले के संग्रहालय पर भी भारी पुलिस बल तैनात किया गया था.

न्यायाधीशों ने परिसर के भीतर लगभग एक घंटे से अधिक का समय बिताया और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा की गई वैज्ञानिक जांच के स्थलों का सूक्ष्मता से अवलोकन किया. इस दौरान जजों ने वहां मौजूद प्राचीन वास्तुकला, खंभों की बनावट और शिलालेखों को बहुत करीब से देखा. विशेष बात यह रही कि कोर्ट के पहले के निर्देशों के मुताबिक, मुआयने के दौरान याचिकाकर्ता या किसी भी पक्षकार को परिसर के भीतर रहने की अनुमति नहीं दी गई थी. जजों के साथ केवल धार कलेक्टर प्रियंक मिश्रा, पुलिस अधीक्षक मयंक अवस्थी और एएसआई के कुछ चुनिंदा अधिकारी ही मौजूद रहे, जिन्होंने तकनीकी और ऐतिहासिक साक्ष्यों के बारे में जजों को जानकारी दी. बताया जा रहा है कि जजों ने उन चिन्हों और प्रतीकों पर विशेष ध्यान दिया, जिनका जिक्र एएसआई की 2000 से ज्यादा पन्नों वाली विस्तृत सर्वे रिपोर्ट में किया गया है.

यह निरीक्षण इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि एएसआई की रिपोर्ट में इस बात के स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि वर्तमान विवादित ढांचा प्राचीन मंदिरों के हिस्सों का फिर से इस्तेमाल करके बनाया गया था. रिपोर्ट के अनुसार, 11वीं सदी के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल मंदिर संरचना वहां पहले से मौजूद थी, जिसे बाद में मस्जिद के रूप में परिवर्तित किया गया. हिंदू पक्ष लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि यह वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में पहचानता है. वर्तमान में यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है और यहां की व्यवस्था 2003 के एक आदेश के तहत संचालित होती है, जिसमें मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज की अनुमति है.

हाईकोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों को एएसआई की रिपोर्ट पर अपनी आपत्तियां और सुझाव देने के लिए पर्याप्त समय दिया था. अब जब जजों ने स्वयं स्थल का मुआयना कर लिया है, तो माना जा रहा है कि 2 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में अदालत किसी ठोस निष्कर्ष या बड़े फैसले की ओर बढ़ सकती है. धार प्रशासन ने मुआयने के बाद भी शहर में सतर्कता बढ़ा दी है ताकि सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से किसी भी तरह की अफवाह न फैले. जजों द्वारा खंभों और शिलालेखों का सीधा निरीक्षण करना इस बात का संकेत है कि अदालत केवल कागजी दस्तावेजों पर निर्भर न रहकर भौतिक साक्ष्यों को भी प्राथमिकता दे रही है.

इतिहास और आस्था के इस जटिल संगम पर कानूनी प्रक्रिया अब अपनी अंतिम दहलीज पर है. 18 मार्च की पिछली सुनवाई में ही जजों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे स्वयं स्थल का दौरा करेंगे ताकि विवाद के हर पहलू को तकनीकी रूप से समझा जा सके. अब पूरे प्रदेश और देश की नजरें 2 अप्रैल की तारीख पर टिकी हैं, जब हाईकोर्ट में इस संवेदनशील मामले पर दोबारा बहस शुरू होगी. जजों के इस औचक और गहन मुआयने ने यह साफ कर दिया है कि न्यायपालिका इस हजार साल पुराने विवाद का समाधान पूर्ण वैज्ञानिक तथ्यों और धरातलीय सच्चाई के आधार पर करना चाहती है. शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और दोनों समुदायों के बीच इस निरीक्षण को लेकर काफी चर्चा है, और सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं.