आपके घर की दीवारों में छिपा है 'कार्बन कर्ज' का खतरा, ग्रीनटेक नॉलेज सॉल्यूशंस की रिपोर्ट ने किया बड़ा खुलासा

आपके घर की दीवारों में छिपा है

प्रेषित समय :19:02:17 PM / Tue, Mar 31st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. भारत के तेजी से बढ़ते शहरीकरण और निर्माण क्षेत्र के पीछे एक ऐसा खामोश खतरा छिपा है जिसे अब तक जलवायु परिवर्तन की चर्चाओं में लगभग नजरअंदाज किया गया है. 'ग्रीनटेक नॉलेज सॉल्यूशंस' द्वारा जारी की गई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट "बिल्डिंग द बेसलाइन: एम्बॉडिड कार्बन इन इंडियाज अर्बन हाउसिंग" ने देश के निर्माण क्षेत्र की एक ऐसी कड़वी हकीकत सामने रखी है जो न केवल पर्यावरणविदों बल्कि घर खरीदारों के लिए भी चिंता का विषय है. इस विस्तृत अध्ययन में दक्षिण और पश्चिम भारत के 26 प्रमुख आवासीय प्रोजेक्ट्स का गहराई से विश्लेषण किया गया है, जिसमें यह तथ्य निकलकर आया है कि एक घर के निर्माण के दौरान इस्तेमाल होने वाले सीमेंट, ईंट और स्टील जैसी सामग्रियों में भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन 'कैद' होता है, जिसे तकनीकी भाषा में 'एम्बॉडिड कार्बन' कहा जाता है. रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जब हम एक नया घर बनाते हैं, तो हमारा ध्यान केवल इस बात पर होता है कि भविष्य में बिजली का बिल कितना आएगा या एसी का खर्च क्या होगा, लेकिन हम उस "कार्बन कर्ज" को पूरी तरह भूल जाते हैं जो घर के बनने की प्रक्रिया में ही पर्यावरण पर चढ़ चुका होता है.

यह शोध 12 से अधिक बड़े डेवलपर्स के सहयोग से पूरा किया गया है, जिसमें निर्माण सामग्री के उत्पादन से लेकर साइट पर उनके पहुंचने तक के उत्सर्जन यानी 'प्रोडक्ट स्टेज' का सटीक मापन किया गया है. भारत के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील हो जाता है क्योंकि देश का बिल्डिंग सेक्टर वर्तमान में कुल ऊर्जा मांग का लगभग 30 प्रतिशत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 25.6 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है. जैसे-जैसे भारत की शहरी आबादी बढ़ रही है और अनुमान के मुताबिक 2050 तक करीब 40 करोड़ लोग शहरों से जुड़ेंगे, वैसे-वैसे लाखों नए घरों का निर्माण होगा और उनके साथ लाखों टन नया कार्बन पर्यावरण में घुलेगा. अब तक क्लाइमेट चेंज की वैश्विक और राष्ट्रीय बहसों में सारा ध्यान 'ऑपरेशनल कार्बन' यानी घर में रहने के दौरान इस्तेमाल होने वाली बिजली, कूलिंग और लाइटिंग पर रहा है, जिसमें बेहतर इंसुलेशन और सोलर के जरिए कुछ प्रगति भी हुई है, लेकिन निर्माण सामग्री के भीतर छिपे कार्बन का सवाल अब भी चर्चा के हाशिए पर खड़ा है.

रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह है कि सीमेंट और स्टील उद्योग, जो भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, वही एम्बॉडिड कार्बन के सबसे बड़े स्रोत हैं. चूंकि भारत में इन दोनों उद्योगों का पैमाना बहुत विशाल है, इसलिए इनके द्वारा होने वाले उत्सर्जन को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं रह गया है. यह रिपोर्ट पहली बार एक 'बेसलाइन' तैयार करती है जिससे डेवलपर्स और डिजाइनरों को यह समझने में मदद मिलेगी कि एक औसत शहरी घर के निर्माण में कितना कार्बन खर्च होता है. इससे निर्माण जगत में एक नई सोच की शुरुआत होने की उम्मीद है, जहां किसी प्रोजेक्ट की सफलता का पैमाना केवल उसकी लागत या सुंदरता नहीं, बल्कि उसका 'कार्बन फुटप्रिंट' भी होगा. फरवरी में बेंगलुरु में हुए स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन और नीति आयोग की हालिया 'बिल्डिंग सेक्टर डिकार्बनाइजेशन' रिपोर्ट के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि सरकारी और नीतिगत स्तर पर अब इस मुद्दे को लेकर हलचल तेज हो गई है.

हालांकि, असली चुनौती भारत के 2070 तक 'नेट जीरो' के लक्ष्य को हासिल करने में है. ऐतिहासिक रूप से किसी भी बड़े ऊर्जा बदलाव में कम से कम 50 से 60 साल का समय लगता है, जबकि हमारे पास बिल्डिंग सेक्टर को पूरी तरह से कार्बन-मुक्त बनाने के लिए मात्र 45 साल का समय शेष है. इसके लिए केवल नई तकनीकों का आना ही काफी नहीं होगा, बल्कि निर्माण की पूरी संस्कृति में एक बुनियादी बदलाव की आवश्यकता है. हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक वास्तव में 'सस्टेनेबल' यानी टिकाऊ घर वह नहीं है जो केवल कम बिजली की खपत करे, बल्कि वह है जो अपने निर्माण के दौरान भी कम से कम कार्बन उत्सर्जित करे. यदि हम घर की दीवारों और छतों में छिपे इस खामोश कार्बन के खतरे को नहीं पहचानते हैं, तो जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हमारी लड़ाई अधूरी ही रह जाएगी. यह रिपोर्ट एक चेतावनी के साथ-साथ एक मार्गदर्शिका भी है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि भविष्य के शहरों का निर्माण केवल ईंट और पत्थर से नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-