नई दिल्ली. दुनियाभर में विकास की धुरी माने जाने वाले स्टील सेक्टर की क्लाइमेट संबंधी तैयारियों को लेकर एक चौंकाने वाला और चिंताजनक खुलासा हुआ है. क्लाइमेट वाच द्वारा जारी किए गए नवीनतम "कॉरपोरेट स्कोरकार्ड" ने यह साफ कर दिया है कि जिन कंधों पर दुनिया की ऊंची इमारतों, रेल नेटवर्क और विशाल फैक्ट्रियों का भार है, वही सेक्टर पर्यावरण को बचाने की दौड़ में सबसे पीछे छूट गया है. रिपोर्ट के आंकड़े इतने असहज करने वाले हैं कि दुनिया की 18 सबसे बड़ी स्टील कंपनियों में से एक भी ऐसी नहीं पाई गई जो खुद को कम-कार्बन उत्सर्जन वाले भविष्य के लिए तैयार कह सके.
इस गहन आकलन में भारत, चीन, ब्राजील, जर्मनी, जापान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे औद्योगिक देशों की दिग्गज कंपनियों को शामिल किया गया था. इनमें टाटा स्टील, आर्सेलर मित्तल, निप्पॉन स्टील और पॉस्को जैसी विश्व प्रसिद्ध कंपनियां शामिल हैं, जिनकी साख दांव पर लगी नजर आ रही है. रिपोर्ट का सबसे कड़वा सच यह है कि ये कंपनियां आज भी अपनी उत्पादन क्षमता के लिए आदिम और प्रदूषणकारी कोयला आधारित 'ब्लास्ट फर्नेस' तकनीक पर निर्भर हैं, जो इस पूरे उद्योग से होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन के 90 प्रतिशत हिस्से के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है.
स्कोरकार्ड के नतीजों पर नजर डालें तो स्थिति और भी भयावह दिखाई देती है क्योंकि 100 अंकों के इस पैमाने पर कोई भी कंपनी 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर सकी है. अधिकांश दिग्गज कंपनियां 20 से 30 अंकों के बीच ही सिमट कर रह गई हैं और इस सेक्टर का औसत स्कोर मात्र 27 रहा है. यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि बड़ी कंपनियों द्वारा 'नेट जीरो 2050' जैसे लुभावने लक्ष्य घोषित करना महज एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है, क्योंकि धरातल पर न तो इसके लिए आवश्यक ठोस निवेश दिखाई दे रहा है और न ही तकनीक में कोई क्रांतिकारी बदलाव की सुगबुगाहट है. इस रिपोर्ट पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कैरोलिन एशले ने वर्तमान स्थिति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर "शर्मनाक" करार दिया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि जो कंपनियां इस सूची में सबसे आगे भी दिख रही हैं, उनके पास भी अभी तय करने के लिए एक बहुत लंबा और कठिन रास्ता बाकी है. कंपनियों की वर्तमान कार्यप्रणाली और जलवायु संकट से निपटने की वैश्विक जरूरतों के बीच एक बहुत गहरी खाई साफ देखी जा सकती है.
वैश्विक स्तर पर होने वाले कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में स्टील सेक्टर की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है, जो इसे पर्यावरण के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में से एक बनाती है. ऐसे में इस उद्योग में बदलाव केवल समय की मांग नहीं बल्कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की अनिवार्य शर्त बन चुका है. स्कोरकार्ड के माध्यम से यह कड़वी हकीकत सामने आई है कि कंपनियां अभी भी छोटे-छोटे बदलावों में उलझकर वक्त काट रही हैं, जबकि पर्यावरण को बचाने के लिए अब बड़े संरचनात्मक और तकनीकी सुधारों की सख्त जरूरत है. कंपनियों की "ट्रांजिशन रेडीनेस" यानी बदलाव की तैयारी को परखने के लिए कई कड़े मानदंड बनाए गए थे, जिनमें कोयले पर निर्भरता कम करना, ग्रीन आयरन का उपयोग बढ़ाना, नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी और भविष्य की निवेश योजनाओं में पारदर्शिता जैसे बिंदु शामिल थे. इन सभी मोर्चों पर सबसे बड़ी कमजोरी कोयले से पूरी तरह बाहर निकलने की किसी भी ठोस कार्ययोजना का अभाव और 'ग्रीन आयरन' जैसे पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की अनदेखी के रूप में सामने आई है.
तकनीकी मोर्चे पर विफलता का आलम यह है कि ग्रीन आयरन और रिन्यूएबल एनर्जी के इस्तेमाल के मामले में 25 अंकों में से औसत स्कोर केवल 0.6 रहा है. ताज्जुब की बात यह है कि हर एक बड़ी स्टील कंपनी का ग्रीन आयरन की खपत पर स्कोर शून्य दर्ज किया गया है. इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि जिस तकनीक को भविष्य का समाधान माना जा रहा है, वह अभी तक इन कंपनियों की फैक्ट्रियों के गेट तक भी नहीं पहुंच पाई है. कोयले पर अति-निर्भरता इस पूरे बदलाव की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई है. रिपोर्ट से यह भी उजागर हुआ है कि 18 में से अधिकांश कंपनियों ने हाल के वर्षों में या तो कोयला आधारित नई संपत्तियों में भारी निवेश किया है या भविष्य में ऐसे निवेश की बड़ी घोषणाएं कर रखी हैं. हालांकि, कुछ कंपनियां जैसे एसएसएबी (SSAB) और थायसेनक्रुप (thyssenkrupp) ने क्रमशः 46.2 और 41.9 अंकों के साथ थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया है क्योंकि उन्होंने ब्लास्ट फर्नेस को बंद करने की दिशा में कुछ समयबद्ध कदम उठाए हैं. इसके विपरीत हुंडई स्टील, निप्पॉन स्टील और एचबीआईएस जैसी कंपनियां सबसे निचले पायदान पर हैं, जहां न तो रिन्यूएबल एनर्जी के प्रति कोई विजन दिखा और न ही ग्रीन आयरन पर कोई प्रगति नजर आई.
यह रिपोर्ट केवल तकनीकी खामियों की ओर इशारा नहीं करती बल्कि प्रबंधन के गलत फैसलों की भी पोल खोलती है. स्टील जैसे भारी उद्योग में एक बार लगाया गया निवेश अगले कई दशकों तक चलता है, इसलिए आज कोयला आधारित ढांचे में किया जा रहा कोई भी निवेश आने वाले कई सालों तक पर्यावरण को प्रदूषित करता रहेगा. यदि कंपनियां अब भी पुराने ढर्रे पर निवेश जारी रखती हैं, तो भविष्य में होने वाला नुकसान अपूरणीय होगा और बदलाव की प्रक्रिया और भी जटिल हो जाएगी. हालांकि, रिपोर्ट के अंत में कुछ छोटे संकेत उम्मीद की किरण भी दिखाते हैं क्योंकि कुछ कंपनियों ने नए ब्लास्ट फर्नेस बनाने की योजनाओं को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है. साथ ही कुछ कंपनियों के पास 'डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन' (DRI) क्षमता उपलब्ध है, जिसे भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन के जरिए कम उत्सर्जन वाले उत्पादन में परिवर्तित किया जा सकता है. लेकिन यह रिपोर्ट अंततः यही चेतावनी देती है कि केवल घोषणाओं और वादों से पर्यावरण नहीं बचेगा. असली बदलाव तभी स्वीकार्य होगा जब धरातल पर बड़े पैमाने पर ग्रीन तकनीक लागू की जाएगी. निष्कर्ष के तौर पर यह स्कोरकार्ड वैश्विक स्टील सेक्टर के लिए एक 'वेक-अप कॉल' है, जो साफ कहता है कि बिना ठोस इरादों और तकनीकी क्रांति के स्टील सेक्टर का 'नेट जीरो' का सपना कभी हकीकत नहीं बन पाएगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

