क्वांटम कंप्यूटिंग का खतरा: क्या 9 मिनट में क्रैक हो जाएगा बिटकॉइन और इथेरियम का पासवर्ड?

क्वांटम कंप्यूटिंग का खतरा: क्या 9 मिनट में क्रैक हो जाएगा बिटकॉइन और इथेरियम का पासवर्ड?

प्रेषित समय :22:02:58 PM / Wed, Apr 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

गूगल  की एक हालिया रिसर्च ने क्रिप्टोकरेंसी की दुनिया में खलबली मचा दी है. इस स्टडी के अनुसार, भविष्य के शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर बिटकॉइन और इथेरियम जैसी ब्लॉकचेन की सुरक्षा दीवार को केवल 9 मिनट के भीतर ढहा सकते हैं. वर्तमान में क्रिप्टो की सुरक्षा 256-bit elliptic curve cryptography पर टिकी है, जिसे आज के सुपरकंप्यूटरों के लिए तोड़ना नामुमकिन माना जाता है. लेकिन गूगल का दावा है कि क्वांटम तकनीक इस 'डिजिटल ताले' को उम्मीद से कहीं जल्दी खोल सकती है.

इस शोध की सबसे चिंताजनक बात यह है कि पहले विशेषज्ञों का मानना था कि इसके लिए करोड़ों क्यूबिट्स वाले विशाल कंप्यूटर चाहिए होंगे, लेकिन अब गूगल का कहना है कि यह काम 5 लाख से भी कम फिजिकल क्यूबिट्स (Physical Qubits) से संभव है. रिसर्च में 'ऑन-स्पेंड अटैक' (On-spend attack) का जिक्र किया गया है, जिसमें ट्रांजैक्शन के दौरान जब प्राइवेट-की नेटवर्क पर थोड़े समय के लिए दिखती है, तभी हमलावर उसे क्रैक कर फंड चुरा सकता है. चूंकि बिटकॉइन ब्लॉक बनने में लगभग 10 मिनट लगते हैं, इसलिए 9 मिनट का यह क्रैकिंग समय बेहद संवेदनशील है.

वर्तमान में Bitcoin और Ethereum की सुरक्षा 256-bit elliptic curve cryptography पर आधारित है. इसे एक बेहद मजबूत डिजिटल ताले की तरह माना जाता है, जिसे पारंपरिक कंप्यूटर से तोड़ना लगभग असंभव है. विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की सुरक्षा को तोड़ने में मौजूदा कंप्यूटरों को हजारों साल लग सकते हैं.

हालांकि Google की नई स्टडी ने इस धारणा को चुनौती दी है. रिसर्च के मुताबिक, अब पहले की तुलना में काफी कम संसाधनों वाले क्वांटम कंप्यूटर भी इस सुरक्षा को तोड़ने में सक्षम हो सकते हैं. जहां पहले माना जाता था कि इसके लिए लाखों-करोड़ों क्यूबिट्स की जरूरत होगी, वहीं अब यह काम करीब 5 लाख से कम ‘फिजिकल क्यूबिट्स’ से भी संभव बताया जा रहा है.

इस रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला दावा यह है कि एक काल्पनिक लेकिन संभावित स्थिति में, शक्तिशाली क्वांटम कंप्यूटर मात्र 9 मिनट के भीतर किसी यूजर की प्राइवेट-की निकाल सकते हैं. क्रिप्टो सिस्टम में प्राइवेट-की ही असली सुरक्षा होती है, जो यह साबित करती है कि डिजिटल संपत्ति का मालिक कौन है. अगर यह की किसी हमलावर के हाथ लग जाए, तो वह आसानी से पूरे वॉलेट पर नियंत्रण हासिल कर सकता है.

क्रिप्टोकरेंसी सिस्टम में पब्लिक-की और प्राइवेट-की का कांसेप्ट बेहद महत्वपूर्ण होता है. पब्लिक-की को बैंक अकाउंट नंबर की तरह समझा जा सकता है, जिसे कोई भी जान सकता है, जबकि प्राइवेट-की एटीएम पिन की तरह होती है, जो पूरी तरह गोपनीय रहती है. हर ट्रांजैक्शन इसी प्राइवेट-की से साइन होता है. ऐसे में अगर यह लीक हो जाए तो पूरा सिस्टम खतरे में पड़ सकता है.

रिसर्च में तीन तरह के संभावित खतरों का जिक्र किया गया है. पहला ‘on-spend attack’ है, जिसमें ट्रांजैक्शन के दौरान ही प्राइवेट-की चुराने की कोशिश की जाती है. दूसरा ‘at-rest attack’ है, जिसमें लंबे समय से निष्क्रिय पड़े वॉलेट्स को निशाना बनाया जाता है. तीसरा ‘on-setup attack’ है, जिसमें सिस्टम की डिजाइन में मौजूद कमजोरियों का फायदा उठाया जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे क्वांटम तकनीक विकसित होगी, ये खतरे वास्तविकता बन सकते हैं.

इस खतरे की जड़ में Shor’s Algorithm जैसी तकनीक है, जो क्वांटम कंप्यूटर को पारंपरिक एन्क्रिप्शन को तेजी से तोड़ने में सक्षम बनाती है. यदि इसका इस्तेमाल बड़े स्तर पर होने लगा, तो मौजूदा क्रिप्टोग्राफी सिस्टम कमजोर पड़ सकते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे बड़ा खतरा उन पुराने या ‘डॉर्मेंट’ वॉलेट्स को है, जिनकी प्राइवेट-की खो चुकी है या लंबे समय से उपयोग नहीं हुई है. ऐसे वॉलेट्स में अरबों डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी पड़ी है और अगर क्वांटम तकनीक विकसित हो गई, तो इन्हें आसानी से निशाना बनाया जा सकता है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन पुराने वॉलेट्स को नए सिक्योर सिस्टम में अपग्रेड करना संभव नहीं है.

हालांकि इस खतरे का समाधान भी तलाशा जा रहा है. विशेषज्ञ ‘पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी’ (PQC) की दिशा में काम कर रहे हैं, जो ऐसे एल्गोरिद्म विकसित करती है जो क्वांटम कंप्यूटर के हमलों से भी सुरक्षित रह सकें. लेकिन यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और इसे पूरी तरह लागू होने में समय लग सकता है.

इस बीच क्रिप्टो इंडस्ट्री के बड़े नामों ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. Changpeng Zhao का कहना है कि घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे एक चेतावनी के रूप में देखना चाहिए ताकि इंडस्ट्री समय रहते खुद को अपडेट कर सके. वहीं Elon Musk ने इस पर हल्के-फुल्के अंदाज में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भविष्य में शायद लोग अपना भूला हुआ वॉलेट पासवर्ड भी वापस पा सकेंगे.

Google की यह रिसर्च फिलहाल एक संभावित खतरे की ओर इशारा करती है, न कि तुरंत आने वाले संकट की. लेकिन यह जरूर साफ हो गया है कि जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे डिजिटल सुरक्षा के तरीके भी बदलने होंगे. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्रिप्टो इंडस्ट्री इस चुनौती का सामना कैसे करती है और अपनी सुरक्षा को किस तरह मजबूत बनाती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-