छतरपुर. मध्यप्रदेश के छतरपुर से एक ऐसी प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जिसने समाज की सोच को झकझोरते हुए एक सकारात्मक संदेश दिया है. जहां आमतौर पर बेटों के जन्म पर जश्न मनाने की परंपरा देखी जाती है, वहीं छतरपुर के एक परिवार ने बेटी के जन्म को शादी जैसे भव्य समारोह में बदलकर नई मिसाल कायम की है. इस अनोखे जश्न ने न सिर्फ शहर बल्कि पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींच लिया.
जानकारी के मुताबिक, सटई रोड निवासी मृत्युञ्जय मिश्रा के घर लंबे इंतजार के बाद बेटी का जन्म हुआ. इस खुशी को उन्होंने जिस तरह मनाया, वह किसी शादी समारोह से कम नहीं था. परिवार के लोग अस्पताल से मां और नवजात बच्ची को घर लाने के लिए दो दर्जन से अधिक गाड़ियों के काफिले के साथ पहुंचे. डीजे की धुन पर नाचते-गाते परिजन और उनके पीछे चलती गाड़ियों की लंबी कतार ने पूरे माहौल को बारात जैसा बना दिया.
जब यह काफिला शहर की सड़कों से गुजरा, तो हर किसी की नजरें उसी पर टिक गईं. राह चलते लोगों को पहले लगा कि कोई शादी की बारात निकल रही है, लेकिन जब उन्हें पता चला कि यह एक बेटी के जन्म की खुशी में निकाली गई शोभायात्रा है, तो लोग हैरान भी हुए और भावुक भी. इस पूरे आयोजन ने समाज में बेटियों के प्रति सोच को बदलने का एक मजबूत संदेश दिया.
घर पहुंचने पर मां और नवजात का जोरदार स्वागत किया गया. घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था और परिवार की महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आरती उतारकर बच्ची का स्वागत किया. पूरा माहौल किसी त्योहार जैसा नजर आ रहा था, जहां हर कोई इस खुशी में शामिल था.
परिवार की सदस्य ऋचा रिछारिया ने बताया कि उनके घर “लक्ष्मी” का आगमन हुआ है और उन्होंने उसी श्रद्धा और उल्लास के साथ उसका स्वागत किया है, जैसा किसी बड़े शुभ अवसर पर किया जाता है. उन्होंने कहा कि आमतौर पर बेटे के जन्म पर ही इस तरह का उत्सव देखने को मिलता है, लेकिन उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की है कि बेटियां भी उतनी ही खुशी और गर्व का कारण होती हैं.
यह आयोजन सिर्फ एक पारिवारिक खुशी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा बन गया है. आज भी कई जगहों पर बेटियों के जन्म को उतना महत्व नहीं दिया जाता, लेकिन इस तरह के उदाहरण यह साबित करते हैं कि समाज में बदलाव आ रहा है. यह घटना लोगों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि बेटा-बेटी में भेदभाव करने की सोच अब बदलनी चाहिए.
स्थानीय लोगों ने भी इस पहल की सराहना की और इसे समाज के लिए एक सकारात्मक कदम बताया. कई लोगों का कहना है कि अगर इसी तरह लोग बेटियों के जन्म को उत्सव की तरह मनाने लगें, तो समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा और बेटियों के प्रति नजरिया और अधिक सकारात्मक होगा.
इस अनोखी पहल ने यह साफ कर दिया है कि खुशी किसी लिंग की मोहताज नहीं होती. बेटी का जन्म भी उतना ही खास है जितना बेटे का, और इसे पूरे गर्व और सम्मान के साथ मनाया जाना चाहिए. छतरपुर के इस परिवार ने अपने इस कदम से न केवल एक परंपरा को चुनौती दी है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई सोच भी दी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

