एनर्जी ट्रांजिशन यानी ऊर्जा संक्रमण की राह में अब तकनीक से कहीं बड़ी चुनौती फाइनेंस की बनकर उभरी है. इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस की नवीनतम रिपोर्ट “Financing the energy transition: A credit perspective on India's power sector” के अनुसार, भारत ने साल 2035 तक अपनी कुल ऊर्जा का 60 फीसदी हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का जो लक्ष्य रखा है, उसे पूरा करने के लिए निवेश के पैमाने को कई गुना बढ़ाना होगा. अनुमान है कि रिन्यूएबल एनर्जी, स्टोरेज और ट्रांसमिशन के क्षेत्र में सालाना निवेश वर्ष 2032 के 68 अरब डॉलर से बढ़कर 2035 तक 145 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. यानी सौर और पवन ऊर्जा से बिजली बनाना भले ही सस्ता और आसान हो गया हो, लेकिन इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को खड़ा करने के लिए आवश्यक भारी-भरकम पूंजी ही अब सबसे बड़ा सवाल है.
रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि फाइनेंशियल मार्केट अब भविष्य की ऊर्जा के आधार पर अपना रुख तय कर रहा है. रिन्यूएबल ऊर्जा कंपनियों को अधिक भरोसेमंद माना जा रहा है क्योंकि उनके पास ईंधन का खर्च नहीं है और उनका मुनाफा स्थिर है, जिससे उन्हें पूंजी आसानी से मिल रही है. इसके ठीक उलट, कोयले पर आधारित थर्मल कंपनियों के लिए अब बाजार से पैसा जुटाना कठिन होता जा रहा है. यह स्ट्रक्चरल बदलाव आने वाले वर्षों में बिजली बाजार की दिशा तय करेगा. भारत के लिए एक बड़ी चिंता यह भी है कि यहां का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट अभी भी कमजोर है, जिससे कंपनियों को लंबी अवधि के सस्ते फाइनेंस के लिए संघर्ष करना पड़ता है और विदेशी निवेश पर निर्भरता जोखिम बढ़ाती है.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत को इस संक्रमण को स्थिर बनाने के लिए पेंशन फंड, इंश्योरेंस कंपनियों और प्रोविडेंट फंड जैसे घरेलू लंबी अवधि के निवेशकों को सक्रिय करना होगा. इस पूरी प्रक्रिया में एनटीपीसी जैसी बड़ी पावर कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, जिनके पास भारी निवेश की योजनाएं हैं. साफ ऊर्जा की तरफ बढ़ना अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल है, क्योंकि तेल और गैस के आयात पर निर्भरता कम करके ही देश वैश्विक संकटों से खुद को सुरक्षित रख सकता है. अब भविष्य की रोशनी का रास्ता तो तय है, लेकिन असली परीक्षा इस भविष्य को फंड करने की क्षमता में छिपी है.
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