नई दिल्ली. भारतीय निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच चल रही तनातनी बुधवार को एक बेहद कड़वे मोड़ पर पहुंच गई। दिल्ली में निर्वाचन आयोग के मुख्यालय में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस और आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चला, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। टीएमसी प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया कि बैठक के दौरान उन्होंने विपक्षी नेताओं को 'गेट लॉस्ट' (बाहर निकल जाओ) कहकर अपमानित किया। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन पर आयोग के कक्ष में चिल्लाने और अमर्यादित व्यवहार करने का आरोप लगाया है। यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी चरम पर है और आयोग निष्पक्ष चुनाव कराने की चुनौतियों से जूझ रहा है।
घटनाक्रम की शुरुआत बुधवार सुबह करीब 10 बजे हुई जब टीएमसी का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल निर्वाचन आयोग पहुंचा। इस दल में राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ'ब्रायन, उपनेता सागरिका घोष, सांसद साकेत गोखले और मेनका गुरुस्वामी शामिल थे। बैठक का मुख्य उद्देश्य पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा लिखे गए नौ पत्रों को आयोग को सौंपना और राज्य में चुनावी अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाना था। टीएमसी का आरोप है कि उन्होंने कई बार पत्र लिखकर कुछ अधिकारियों के भाजपा के साथ कथित संबंधों की शिकायत की और उनके स्थानांतरण की मांग की, लेकिन आयोग की ओर से इन पत्रों पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। बैठक खत्म होने के बाद मीडिया से मुखातिब हुए डेरेक ओ'ब्रायन बेहद गुस्से में नजर आए और उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त का व्यवहार पूरी तरह से अनुचित था।
डेरेक ओ'ब्रायन ने आरोप लगाया कि जैसे ही उन्होंने अपनी शिकायतों को आयोग के सामने रखा, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने उन्हें 'गेट लॉस्ट' कह दिया। ओ'ब्रायन के अनुसार, उन्होंने आठ से नौ बार आयोग से मिलने की कोशिश की लेकिन इस बार का अनुभव सबसे बुरा था। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा बाकी दो चुनाव आयुक्त बैठक के दौरान पूरी तरह मौन रहे। टीएमसी नेताओं का कहना है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने गए थे, लेकिन उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया। इस घटना के बाद डेरेक ओ'ब्रायन ने आयोग को चुनौती दी है कि वह बैठक का ट्रांसक्रिप्ट (लिखित विवरण) सार्वजनिक करे ताकि देश को पता चल सके कि बंद कमरे में मुख्य चुनाव आयुक्त ने किस तरह की भाषा का उपयोग किया है।
इधर, निर्वाचन आयोग ने टीएमसी के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए जवाबी हमला बोला है। आयोग के सूत्रों ने बताया कि बैठक की शुरुआत में ही माहौल तब बिगड़ गया जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने टीएमसी नेताओं से उनके अधिकृत प्रतिनिधि की अनुपस्थिति के बारे में पूछा। इस पर डेरेक ओ'ब्रायन भड़क गए और उन्होंने सवाल किया कि क्या वे 'अनधिकृत' हैं और उन्हें वहां से चले जाना चाहिए। आयोग के सूत्रों के अनुसार, डेरेक ओ'ब्रायन चुनाव आयुक्तों पर चिल्लाने लगे और उन्होंने बेहद अमर्यादित आचरण किया। सूत्रों का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने केवल उनसे शिष्टाचार बनाए रखने और चिल्लाने से बचने का अनुरोध किया था, न कि उन्हें बाहर जाने को कहा। आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर पोस्ट कर अपनी मंशा साफ की कि इस बार पश्चिम बंगाल के चुनाव पूरी तरह से डर, हिंसा और धांधली मुक्त होंगे। आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी कि इस बार न तो 'चप्पा' (फर्जी मतदान) चलने दिया जाएगा और न ही 'बूथ जैमिंग' की अनुमति होगी।
इस पूरे प्रकरण पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने मतदाता सूची से करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए और इसे विपक्ष को कमजोर करने की साजिश करार दिया। ममता बनर्जी ने घोषणा की है कि टीएमसी इस मतदाता विलोपन के खिलाफ दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाएगी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मतदाताओं के नाम काटकर टीएमसी को हराया नहीं जा सकता और वे इस अन्याय के खिलाफ कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ती रहेंगी। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है और 4 मई को नतीजे आने हैं, ऐसे में आयोग और सत्ताधारी दल के बीच का यह "युद्ध" राज्य के चुनावी माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना रहा है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या निर्वाचन आयोग टीएमसी की मांग पर बैठक का विवरण सार्वजनिक करेगा या यह विवाद चुनावी प्रक्रिया को और अधिक प्रभावित करेगा।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

