रोपड़.पंजाब के रोपड़ जिले में आने वाले मानसून से पहले एक गंभीर संकट गहराता नजर आ रहा है, जहां करीब 70 गांव भूस्खलन के खतरे के साए में जी रहे हैं। वर्ष 2025 के मानसून के दौरान सतलुज नदी में आई बाढ़ और भारी बारिश के बाद इस क्षेत्र की जमीन कमजोर हो चुकी है, जिसके चलते अब ग्रामीणों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। स्थिति को और चिंताजनक बनाता है यह तथ्य कि पिछले छह महीनों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अब तक सुरक्षा के लिए कोई ठोस काम जमीन पर शुरू नहीं हो सका है।
जिन गांवों पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है, उनमें भभौर साहिब, बारा पिंड अपर, पिंगवारी, सुरेवाल अपर, डोलोवाल अपर, मंगूवाल दीवारी, तलवाड़ा, स्वामीपुर, मेघपुर, मानकपुर, गंभीरपुर अपर, दसग्राम और भनाम जैसे इलाके शामिल हैं। ये सभी गांव या तो सतलुज नदी के किनारे बसे हुए हैं या फिर ऐसे ढलानों पर स्थित हैं, जहां मिट्टी का कटाव और जमीन धंसने की आशंका अधिक रहती है। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग हर दिन डर के साए में जीवन बिता रहे हैं।
इस पूरे संकट की शुरुआत पिछले साल के मानसून से हुई थी, जब सतलुज नदी में आई बाढ़ ने इलाके की भौगोलिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। कई गांवों में जमीन में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गईं और कई मकान क्षतिग्रस्त हो गए। खासकर भारतगढ़ के पास स्थित भभौर साहिब और बारा पिंड जैसे गांवों में हालात बेहद खराब हो गए थे, जहां लोगों के घर रहने लायक नहीं बचे। कुछ परिवारों को मजबूरी में अपने घर छोड़कर अस्थायी ठिकानों में शरण लेनी पड़ी।
ग्रामीणों का आरोप है कि आपदा के समय सभी राजनीतिक दलों के नेता गांवों में पहुंचे थे और तत्काल राहत व स्थायी समाधान का आश्वासन दिया था, लेकिन समय बीतने के साथ ये वादे अधूरे रह गए। भभौर साहिब के निवासी राम कुमार का कहना है कि महीनों बीत जाने के बावजूद न तो कोई निर्माण कार्य शुरू हुआ है और न ही प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम उठाया गया है। उनका कहना है कि अब जबकि मानसून करीब आ रहा है, लोगों में भय और अनिश्चितता और बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र में लगातार हो रहा मिट्टी का कटाव और पिछले साल की बाढ़ से कमजोर हुई जमीन स्थिति को और गंभीर बना रही है। अगर समय रहते आवश्यक इंजीनियरिंग उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले मानसून में हालात और बिगड़ सकते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि नदी के किनारे मजबूत रिटेनिंग वॉल का निर्माण और ढलानों को स्थिर करने के उपाय तत्काल किए जाने चाहिए, ताकि आगे होने वाले नुकसान को रोका जा सके।
हालांकि, प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि इस परियोजना के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा फंड की कमी है। स्थानीय प्रशासन ने इस काम के लिए मृदा संरक्षण विभाग और लोक निर्माण विभाग से संपर्क किया था, लेकिन दोनों विभागों ने बजट की कमी का हवाला देते हुए काम शुरू करने में असमर्थता जताई। इसी कारण यह योजना अब तक कागजों में ही अटकी हुई है।
इस मुद्दे पर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने भी स्थिति की गंभीरता को स्वीकार किया है। उन्होंने बताया कि इस समस्या के समाधान के लिए राज्य आपदा प्रबंधन कोष से करीब 70 करोड़ रुपये की मांग की गई है। उनके अनुसार, यह राशि मुख्य रूप से रिटेनिंग वॉल के निर्माण और अन्य सुरक्षा उपायों पर खर्च की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने सरकार के सामने इस मामले को जोरदार तरीके से उठाया है और उम्मीद है कि जल्द ही फंड जारी किया जाएगा।
इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर किसी भी प्रकार की प्रगति न होने से ग्रामीणों में निराशा बढ़ती जा रही है। कई परिवार आज भी आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त घरों में रहने को मजबूर हैं, जबकि कुछ ने अपने घर छोड़कर अस्थायी आश्रयों का सहारा लिया हुआ है। लोगों का कहना है कि अगर जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो इस बार का मानसून और भी विनाशकारी साबित हो सकता है।
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि प्रशासन को केवल आश्वासन देने के बजाय तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। उनका मानना है कि हर दिन की देरी उन्हें और अधिक खतरे के करीब ले जा रही है। कई ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते काम शुरू नहीं हुआ, तो जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक आपदाओं के बाद त्वरित और प्रभावी कार्रवाई बेहद जरूरी होती है, ताकि भविष्य में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। लेकिन रोपड़ के मामले में अब तक ऐसा नहीं हो पाया है, जिससे स्थिति और गंभीर होती जा रही है।
जैसे-जैसे मानसून का समय नजदीक आ रहा है, इन 70 गांवों के लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है। वे उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार और प्रशासन जल्द ही उनकी समस्या का समाधान करेगा और उन्हें इस भय से मुक्ति दिलाएगा। फिलहाल, इन गांवों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, जहां एक ओर प्रशासनिक देरी है और दूसरी ओर प्रकृति का लगातार बढ़ता खतरा।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

