हॉर्मुज़ संकट के बीच तेल सप्लाई ठप, दुनिया की बिजली बचाने में सोलर और विंड बने सबसे बड़े सहारा

हॉर्मुज़ संकट के बीच तेल सप्लाई ठप, दुनिया की बिजली बचाने में सोलर और विंड बने सबसे बड़े सहारा

प्रेषित समय :21:18:27 PM / Thu, Apr 16th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर आई रुकावट ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को गहराई से प्रभावित किया है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक एलएनजी का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे हर संकट के साथ एक पुरानी आशंका फिर सामने आती है कि क्या दुनिया दोबारा कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की ओर लौटेगी। लेकिन इस बार स्थिति पहले से अलग नजर आई है।

ऊर्जा और स्वच्छ वायु पर काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 में हॉर्मुज़ संकट के बाद दुनिया भर में फॉसिल फ्यूल से बनने वाली बिजली में गिरावट दर्ज की गई। कुल मिलाकर यह गिरावट लगभग 1 प्रतिशत रही, जिसमें गैस आधारित बिजली उत्पादन में करीब 4 प्रतिशत की कमी आई, जबकि कोयले से बनने वाली बिजली लगभग स्थिर रही।

रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि यह गिरावट किसी आर्थिक मंदी या मांग में कमी के कारण नहीं हुई। वैश्विक स्तर पर बिजली की मांग बनी रही, लेकिन इस कमी को पूरा करने का तरीका बदल गया। जहां पहले ऐसे संकटों में कोयले की खपत बढ़ जाती थी, इस बार सोलर और पवन ऊर्जा ने बड़ी भूमिका निभाई।

मार्च महीने के दौरान सोलर ऊर्जा उत्पादन में 14 प्रतिशत और पवन ऊर्जा में 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यही वृद्धि फॉसिल फ्यूल से उत्पन्न बिजली की कमी की भरपाई करने में सक्षम रही। अमेरिका, भारत, यूरोप और तुर्किये जैसे बड़े बिजली बाजारों में कोयले से बनने वाली बिजली में गिरावट देखी गई, जबकि सोलर ऊर्जा की तेज वृद्धि ने इस बदलाव को गति दी।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव अचानक नहीं आया है। वर्ष 2025 में दुनिया भर में सोलर और विंड ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि हुई थी। नई जोड़ी गई यह क्षमता इतनी अधिक थी कि वह हॉर्मुज़ से गुजरने वाली एलएनजी से उत्पन्न बिजली की तुलना में दोगुनी बिजली पैदा करने में सक्षम है। इसका मतलब यह है कि संकट आने से पहले ही दुनिया ने वैकल्पिक ऊर्जा के मजबूत विकल्प तैयार कर लिए थे।

कोयले के मोर्चे पर भी स्थिति अलग रही। समुद्री कोयले की ढुलाई में 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है। चीन और भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों में भी कोयले की शिपमेंट कम हुई। हालांकि कुछ क्षेत्रों में सीमित स्तर पर कोयले की वापसी देखी गई, जैसे चीन के तटीय इलाकों में महंगी गैस के कारण और जापान तथा दक्षिण कोरिया में परमाणु ऊर्जा उत्पादन में कमी के चलते, लेकिन यह रुझान वैश्विक स्तर पर निर्णायक नहीं रहा।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि ऊर्जा संकट अब केवल आपूर्ति का संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह ऊर्जा परिवर्तन की दिशा तय करने वाला कारक बनता जा रहा है। कई देशों ने इस दौरान नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए नई नीतियां और निवेश योजनाएं भी तेज कर दी हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि फॉसिल फ्यूल से जुड़े संकटों का सबसे बड़ा प्रभाव यह होता है कि वे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को तेजी से अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। मार्च 2026 का डेटा इस बात की पुष्टि करता है कि जब पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई, तो दुनिया ने कोयले की ओर लौटने के बजाय सौर और पवन ऊर्जा पर अधिक भरोसा किया।

कुल मिलाकर, हॉर्मुज़ संकट ने यह दिखा दिया है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था अब धीरे-धीरे अधिक लचीली और टिकाऊ दिशा में आगे बढ़ रही है, जहां भविष्य की ऊर्जा जरूरतों का समाधान पारंपरिक ईंधनों के बजाय नवीकरणीय स्रोतों में तलाशा जा रहा है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-