लोकसभा में महिला आरक्षण संविधान संशोधन बिल गिरा, सरकार को नहीं मिला जरूरी दो तिहाई बहुमत

लोकसभा में महिला आरक्षण संविधान संशोधन बिल गिरा, सरकार को नहीं मिला जरूरी दो तिहाई बहुमत

प्रेषित समय :21:01:57 PM / Fri, Apr 17th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली.संसद के विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण से जुड़े अहम संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में झटका लगा है। बहुप्रतीक्षित यह विधेयक सदन में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका, जिसके चलते यह पास नहीं हो पाया और तत्काल प्रभाव से इसकी आगे की प्रक्रिया रुक गई है। इस घटनाक्रम ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर जारी प्रयासों पर भी असर डाला है।

लोकसभा में इस विधेयक पर हुई वोटिंग में कुल 528 सदस्यों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 298 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। हालांकि साधारण बहुमत से यह संख्या अधिक थी, लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं हो सका। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए न केवल सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत जरूरी होता है, बल्कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन भी अनिवार्य होता है, जो इस मामले में नहीं मिल पाया।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मतदान के बाद परिणाम घोषित करते हुए बताया कि विधेयक को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला है, इसलिए इसे पारित नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि अब यह विधेयक राज्यसभा में पेश नहीं किया जाएगा और वर्तमान स्वरूप में इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

सरकार की ओर से लाए गए इस प्रस्ताव के तहत तीन प्रमुख विधेयकों को लागू करने की योजना थी, जिनका उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना था। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 शामिल थे। इन सभी का मुख्य लक्ष्य महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देना और राजनीतिक व्यवस्था में उनकी भागीदारी को मजबूत करना था।

हालांकि सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के पास लोकसभा में लगभग 293 सीटें हैं, लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 368 वोटों के आंकड़े से वह काफी पीछे रह गया। यही कारण रहा कि विधेयक पारित नहीं हो सका। इस नतीजे ने यह भी दिखाया कि इतने महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना कितना जरूरी है।

विपक्ष ने जहां इस परिणाम को सरकार की रणनीतिक विफलता बताया है, वहीं सरकार ने इसे एक जटिल विधायी प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर सहमति न बन पाना कई सवाल खड़े कर रहा है, खासकर उस समय जब देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की मांग लगातार उठ रही है।

संविधान के प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी भी एक सदन में संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं होता है, तो उसे अस्वीकृत माना जाता है और उस पर आगे की कार्यवाही नहीं होती। यही स्थिति इस विधेयक के साथ भी हुई है। अब यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ना चाहती है, तो उसे नए सिरे से विधेयक लाना होगा और व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश करनी होगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलावों के लिए केवल संख्याबल ही नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति और रणनीतिक तैयारी भी उतनी ही आवश्यक होती है। फिलहाल महिला आरक्षण को लेकर उम्मीदें एक बार फिर टल गई हैं और आने वाले समय में इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया जाएगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-