हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह का शुक्ल पक्ष चल रहा है और जल्द ही इस माह का दूसरा व अंतिम प्रदोष व्रत आने वाला है. त्रयोदशी तिथि पर पड़ने वाले इस व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है. इस बार वैशाख शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आगमन और समापन दो दिनों में हो रहा है, जिससे भक्तों के बीच व्रत की सही तारीख को लेकर स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है. पंचांग गणना के अनुसार, यह व्रत 28 अप्रैल, 2026 को रखा जाना शास्त्र सम्मत है, क्योंकि इसी दिन प्रदोष काल में त्रयोदशी तिथि की व्यापकता है.
चूंकि 28 अप्रैल को मंगलवार पड़ रहा है, इसलिए इस व्रत को ‘भौम प्रदोष व्रत’ के नाम से जाना जाएगा. शास्त्र बताते हैं कि जिस दिन त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल में संयोग होता है, उसी दिन व्रत रखना श्रेष्ठ फलदायी होता है. पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल त्रयोदशी तिथि 28 अप्रैल की शाम 6 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 29 अप्रैल की शाम 7 बजकर 51 मिनट तक रहेगी. भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए सूर्यास्त के समय से लेकर अगले डेढ़ घंटे का समय अत्यंत शुभ माना गया है.
भौम प्रदोष व्रत के दिन पूजा की विधि को सात्विक और भक्तिपूर्ण रखना चाहिए. व्रत रखने वाले भक्तों को प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. शाम के समय प्रदोष काल में शिवलिंग का गंगाजल, दूध, शहद और जल से अभिषेक करें. शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा और अन्य पवित्र सामग्रियां अर्पित कर भगवान शिव के मंत्रों का जाप करना चाहिए. व्रत की पूर्णता के लिए भौम प्रदोष व्रत कथा का पाठ करना अनिवार्य माना गया है, जिसके अंत में शिव-पार्वती की आरती कर उन्हें भोग अर्पित किया जाता है.
प्रदोष व्रत का अर्थ ही है दोषों का नाश करने वाला. मंगलवार को पड़ने वाला यह विशेष व्रत न केवल भगवान शिव की कृपा दिलाता है, बल्कि भौम प्रदोष होने के कारण यह मंगल ग्रह से संबंधित समस्याओं और कर्ज आदि से मुक्ति के लिए भी अत्यंत प्रभावी माना जाता है. भक्त पूरी श्रद्धा के साथ इस दिन व्रत रखकर शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

