आम आदमी पार्टी में सियासी उथल-पुथल अब गहराते संकट का रूप लेती दिखाई दे रही है। एक साथ सात राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने के घटनाक्रम ने जहां बाहरी तौर पर बड़ा झटका दिया, वहीं पार्टी के भीतर असली चिंता का कारण संदीप पाठक का जाना माना जा रहा है। पार्टी के कई सूत्रों का मानना है कि यह सिर्फ एक नेता का बाहर जाना नहीं, बल्कि संगठन की रणनीतिक संरचना को कमजोर करने वाला फैसला है।
इस पूरे घटनाक्रम में राघव चड्ढा का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा, लेकिन अंदरखाने चर्चा इस बात की है कि उनकी तुलना में पाठक का जाना कहीं ज्यादा गहरा असर डाल सकता है। चड्ढा पार्टी का प्रमुख चेहरा जरूर थे, लेकिन पाठक वह शख्स थे जो पर्दे के पीछे रहकर रणनीति तैयार करते थे और संगठन को दिशा देते थे।
आम आदमी पार्टी के भीतर संदीप पाठक को “मास्टरमाइंड” के रूप में देखा जाता था। 2022 में उन्हें नेशनल जनरल सेक्रेटरी बनाया गया और वे पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी जैसे अहम निर्णय लेने वाले समूह का हिस्सा रहे। उनकी भूमिका केवल एक सांसद तक सीमित नहीं थी, बल्कि चुनावी रणनीति, सर्वे और जमीनी संगठन को मजबूत करने में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी रही है।
खासतौर पर पंजाब में पार्टी की सफलता के पीछे उनकी रणनीति को अहम माना जाता है। जब पार्टी ने राज्य में सत्ता हासिल की, तब उसकी तैयारी, बूथ स्तर की योजना और वोटर कनेक्ट बनाने में पाठक की भूमिका निर्णायक बताई जाती है। ऐसे में उनका जाना उस राज्य में भी असर डाल सकता है, जहां अभी पार्टी की सरकार है।
अरविंद केजरीवाल के करीबी माने जाने वाले पाठक ने 2016 में पार्टी के साथ अपना सफर शुरू किया था और धीरे-धीरे नेतृत्व के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल हो गए। गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में उनकी रणनीतिक पकड़ ने उन्हें संगठन का अभिन्न हिस्सा बना दिया था।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि बाकी नेताओं के विपरीत पाठक के असंतोष या नाराजगी के संकेत पहले से सामने नहीं आए थे। स्वाति मालीवाल और अन्य नेताओं के बारे में पार्टी को पहले से अंदाजा था, लेकिन पाठक का अचानक फैसला संगठन के लिए अप्रत्याशित साबित हुआ। यही कारण है कि इसे एक ‘साइलेंट शॉक’ के तौर पर देखा जा रहा है।
अन्य नेताओं के मामले को पार्टी अलग नजरिए से देख रही है। कुछ नेताओं की सक्रियता पहले से कम मानी जा रही थी, जबकि कुछ पर बाहरी दबावों की भी चर्चा रही। लेकिन पाठक का मामला पूरी तरह अलग है, क्योंकि वे संगठन की आंतरिक रणनीति और निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में थे।
पार्टी के भीतर अब यह स्पष्ट रूप से कहा जा रहा है कि जहां चड्ढा के जाने से पार्टी की सार्वजनिक छवि को नुकसान हुआ है, वहीं पाठक के जाने से संगठन का ढांचा और ग्राउंड लेवल सिस्टम प्रभावित हुआ है। चुनावी राजनीति में जहां चेहरा महत्वपूर्ण होता है, वहीं रणनीति और संगठन की मजबूती ही जीत तय करती है—और यही वह क्षेत्र है, जहां अब पार्टी को चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
इस घटनाक्रम ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। आने वाले समय में पार्टी को न केवल अपनी छवि संभालनी होगी, बल्कि संगठनात्मक स्तर पर भी नई रणनीति तैयार करनी होगी, ताकि इस नुकसान की भरपाई की जा सके।
कुल मिलाकर, आम आदमी पार्टी के लिए यह संकट सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक भी बनता जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि पार्टी इस झटके से कैसे उबरती है और अपने संगठन को फिर से मजबूती देने के लिए क्या कदम उठाती है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

