जन्म दिन विशेष / अशांत भोला : शब्द-साधना के तपस्वी और मेरे साहित्यिक गुरु

जन्म दिन विशेष / अशांत भोला : शब्द-साधना के तपस्वी और मेरे साहित्यिक गुरु

प्रेषित समय :18:56:29 PM / Thu, Apr 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

-राजेश कुमार सिन्हा

साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं होता, वह अनुभवों, संवेदनाओं और जीवन दृष्टि का संगम होता है, और इस संगम तक पहुंचने के लिए एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है, जो न केवल राह दिखाए, बल्कि भीतर के रचनाकार को पहचानने और उसे संवारने का साहस भी दे। मेरे लिए अशांत जी ऐसे ही गुरु हैं ,एक सृजनधर्मी व्यक्तित्व के मालिक जिन्होंने मुझे शब्दों की दुनिया में प्रवेश ही नहीं कराया, बल्कि उसे समझने और जीने का तरीका भी सिखाया।

1 मई 1944 को अखंड बिहार के साहेबगंज (अब झारखंड के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित एक प्रमुख जिला मुख्यालय) के कोटाल पोखर गांव में जन्मे अशांत भोला सिंह का जीवन इस बात का सजीव उदाहरण है कि साधारण परिवेश में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी अपनी लगन, संवेदनशीलता और निरंतर साधना से असाधारण ऊंचाइयों को छू सकता है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भले ही सीमित रही, परंतु आत्मशिक्षा की जो अद्भुत ललक उनमें थी, वही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी शक्ति बनी। विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ से ‘कविरत्न’ की उपाधि प्राप्त करना उनकी साहित्यिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, परंतु उनकी असली पहचान उनके शब्दों में निहित है।अशांत जी का व्यक्तित्व एकदम सहज, सरल और आत्मीय है। वे भीड़ में भी अलग दिखने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अपनी सादगी में ही विशिष्ट प्रतीत होते हैं।

उनके चेहरे पर अनुभवों की रेखाएं हैं, आंखों में गहराई है और वाणी में वह ठहराव, जो केवल जीवन को निकट से देखने वाले व्यक्ति में ही होता है। उनसे मिल कर ऐसा लगता है जैसे किसी शांत नदी के किनारे बैठकर जीवन को समझने का अवसर मिल गया हो। मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत जिन लोगों के सान्निध्य में हुई उनमें से वे एक हैं। जब शब्द बिखरे हुए थे, भाव अस्पष्ट थे और अभिव्यक्ति में आत्मविश्वास का अभाव था, तब उन्होंने मेरी कविताओं को न केवल सुधारा, बल्कि उन्हें प्रकाशित कर मुझे यह भरोसा भी दिया कि मेरी लेखनी में भी संभावनाएं हैं।

बेगूसराय से प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक ‘मुक्त कथन’ में वे साहित्य संपादक थे और उसी मंच पर उन्होंने मेरी प्रारंभिक रचनाओं को स्थान दिया। यह केवल प्रकाशन नहीं था, बल्कि एक नवोदित रचनाकार के आत्मविश्वास का जन्म था।अशांत भोला जी का नाम विशेष रूप से मुक्तक विधा के साथ जुड़ा हुआ है। वे इस विधा के निष्णात रचनाकार हैं और साहित्यिक जगत में उन्हें “मुक्तक सम्राट” के रूप में जाना जाता है। उनके मुक्तकों में जीवन की गहनता, समाज की विसंगतियां, मानवीय संबंधों की सूक्ष्मता और समय की विडंबनाएं अत्यंत सटीक और प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त होती हैं। वे कम शब्दों में गहरी बात कहने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, यह उनकी रचनात्मक दक्षता का प्रमाण है।उनकी रचनाओं में बनावटीपन का अभाव है, वे जीवन को जैसे देखते हैं, वैसे ही लिखते हैं बिना किसी आडंबर के, बिना किसी कृत्रिमता के।

यही कारण है कि उनकी कविताएं और मुक्तक सीधे पाठक के हृदय तक पहुंचते हैं। उनमें एक ईमानदारी है, एक सच्चाई है, जो आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है।संपादन के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘मुक्त कथन’ के साहित्य संपादक के रूप में उन्होंने अनेक नवोदित रचनाकारों को मंच प्रदान किया। वे केवल रचनाओं को छापते ही नहीं थे, बल्कि उन्हें सुधारते, संवारते और लेखक को बेहतर बनाने का प्रयास भी करते थे। यह गुण हर संपादक में नहीं होता। वे एक सच्चे अर्थों में ‘गुरु’ हैं जो अपने शिष्यों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं।

उनका जीवन साहित्य के प्रति समर्पण की एक निरंतर यात्रा है। उन्होंने साहित्य को कभी प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसे अपनी साधना का केंद्र माना। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में एक आध्यात्मिक गहराई भी दिखाई देती है मानो वे शब्दों के माध्यम से जीवन के सत्य को छूने का प्रयास कर रहे हों। अशांत जी का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे अपने आसपास के जीवन को बहुत बारीकी से देखते हैं। गांव का जीवन, आम आदमी का संघर्ष, समाज की बदलती तस्वीर ,इन सबको उन्होंने अपनी रचनाओं में बहुत ही संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। उनकी रचनाएं केवल साहित्य नहीं, बल्कि समय का दस्तावेज भी हैं। मेरे लिए उनका महत्व बतौर मार्गदर्शक भी है उन्होंने मुझे यह सिखाया कि लेखन में भाषा की शुद्धता जितनी आवश्यक है, उतनी ही भावों की सच्चाई भी। उन्होंने यह भी बताया कि साहित्य में टिके रहने के लिए धैर्य, अनुशासन और निरंतर अभ्यास अनिवार्य है। आज जब वे अपने जीवन के 80 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहे हैं, तब यह अवसर केवल उनके जन्मदिवस का नहीं, बल्कि उनके समर्पण, साधना और साहित्यिक योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी है। यह उस यात्रा का उत्सव है, जिसने न केवल उन्हें एक महान रचनाकार बनाया, बल्कि न जाने कितने लोगों को लिखने और सोचने की प्रेरणा भी दी।

अशांत श्री भोला सिंह वास्तव में एक ऐसे दीपस्तंभ हैं, जो स्वयं जलकर दूसरों को मार्ग दिखाते हैं। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि सच्ची साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती और सच्चा गुरु वही होता है, जो अपने शिष्य को अपने से आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है। उनके प्रति मेरी श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता असीम है,शब्द भले ही सीमित हों, पर भाव अनंत हैं। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे उन्हें स्वस्थ, दीर्घायु और सृजनशील जीवन प्रदान करें, ताकि उनकी लेखनी आने वाली पीढ़ियों को भी इसी प्रकार आलोकित करती रहे।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-