नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों की घोषणा से महज 48 घंटे पहले राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और चुनाव आयोग के बीच कानूनी टकराव अब देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर पहुंच गया है. ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष याचिका दायर कर चुनाव आयोग के उस नए नियम को चुनौती दी है, जिसके तहत मतगणना के दौरान प्रत्येक टेबल पर कम से कम एक सुपरवाइजर या सहायक के रूप में केवल केंद्र सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) के कर्मचारियों को तैनात करने का आदेश दिया गया है. पार्टी ने इस मामले में तुरंत सुनवाई की मांग की है क्योंकि 4 मई को मतों की गणना होनी है और टीएमसी को डर है कि यह बदलाव चुनावी निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है.
यह विवाद तब और गहरा गया जब कोलकाता हाई कोर्ट ने 1 मई 2026 को टीएमसी की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें इस नियम पर रोक लगाने की मांग की गई थी. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार है कि वह पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय या राज्य के कर्मचारियों में से किसी का भी चयन कर सकता है. अदालत ने टिप्पणी की कि जब मतगणना के दौरान सीसीटीवी कैमरों की निगरानी होगी, प्रत्येक टेबल पर राजनीतिक दलों के काउंटिंग एजेंट मौजूद रहेंगे और माइक्रो-ऑब्जर्वर भी तैनात होंगे, तो ऐसे में केवल केंद्रीय कर्मचारियों की मौजूदगी से धांधली की आशंका का कोई ठोस आधार नजर नहीं आता. उच्च न्यायालय के इसी फैसले को अब टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए इसे "मनमाना" और विशेष रूप से बंगाल को निशाना बनाने वाला कदम बताया है.
टीएमसी के वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी का तर्क है कि आमतौर पर मतगणना की प्रक्रिया में राज्य सरकार के कर्मचारियों की मुख्य भूमिका होती है, लेकिन इस बार नियमों में अचानक बदलाव करना संदेह पैदा करता है. पार्टी का आरोप है कि केंद्रीय कर्मचारी केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव में आ सकते हैं, जिससे मतगणना की शुचिता और निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं. टीएमसी ने यह भी सवाल उठाया है कि ऐसा आदेश देने का अधिकार केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को है और वर्तमान प्रक्रिया में अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया गया है. पार्टी का मानना है कि यह नियम राज्य के प्रशासनिक ढांचे के प्रति अविश्वास को दर्शाता है और एकतरफा पर्यवेक्षण की स्थिति पैदा करता है.
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने अपने बचाव में तर्क दिया है कि यह निर्णय पूरी तरह से वैध है और इसका उद्देश्य केवल मतगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को उच्चतम स्तर पर ले जाना है. आयोग का कहना है कि नियमों के मुताबिक किसी भी राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) को इस कार्य के लिए नियुक्त किया जा सकता है, चाहे वह राज्य सरकार का हो या केंद्र सरकार का. आयोग ने इसे एक प्रशासनिक सुधार बताया है जिसे सुचारू और विवादमुक्त मतगणना संपन्न कराने के लिए लागू किया गया है. अब पूरे देश की नजरें सुप्रीम कोर्ट के आगामी रुख पर टिकी हैं क्योंकि यह फैसला न केवल पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के पर्यवेक्षण को तय करेगा, बल्कि भविष्य के चुनावों के लिए भी एक बड़ी मिसाल कायम करेगा.
अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है, तो पश्चिम बंगाल के इतिहास में यह पहली बार होगा जब वोटों की गिनती पूरी तरह से केंद्रीय कर्मचारियों की सीधी निगरानी में संपन्न होगी. एग्जिट पोल्स में भाजपा और टीएमसी के बीच कांटे की टक्कर के बीच, मतगणना प्रक्रिया को लेकर यह कानूनी दांव-पेच राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्मा रहा है. 4 मई की सुबह जब ईवीएम और डाक मतपत्रों की गिनती शुरू होगी, तब तक यह स्पष्ट हो जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी की चिंताओं पर क्या रुख अपनाया है. फिलहाल, दिल्ली से लेकर कोलकाता तक की कानूनी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या मतगणना से ठीक पहले नियमों में बदलाव को अदालत न्यायसंगत ठहराएगी या यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

