* अशोक नगावत
वे कुछ देर के लिए मौन रहते।
फिर, एक मंद, अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ, वे शायद यों कहते: “हे आधुनिक युग के प्राणियों, तुमने अपनी आवाज़ें तो हज़ार गुना बढ़ा लीं, पर सुनना भूल गए। तुमने अदृश्य धागों से सारी दुनिया को जोड़ दिया, फिर भी अकेलेपन की गहराई कभी इतनी नहीं थी। तुम हवा से भी तेज़ दौड़ते हो, पर कहीं पहुँचते नहीं। क्यों?”
फिर वे अपना एक हाथ उठाते, हथेली खोलते, और आगे कहते: “दुख का कारण अब भी तृष्णा ही है—न वह सादी भूख, न प्रेम की साधारण चाह। यह तो बस और अधिक पाने की बेचैनी है, अलग होने की, ‘लाइक्स’ इकट्ठा करने की, उस प्रशंसा की जो अगले स्क्रॉल के साथ मिट जाती है। तुमने हर तरफ़ दर्पण लगा दिए हैं, और उसी प्रतिबिंब को अपना असली चेहरा समझ बैठे हो। उस चमकते पत्थर (मोबाइल) को नीचे रखो। किसी पेड़ के नीचे बैठो—असली पत्ते, असली मिट्टी। साँस लो, जब तक वह प्यास शांत न हो जाए।”
वे थोड़ा रुकते, चेहरों को देखते—बेचैन, भटके हुए, तरसते हुए।
“तुम मुझसे युद्ध के बारे में पूछते हो, जलती धरती के बारे में, अमीरों के संचय और ग़रीबों की पुकार के बारे में। मैं कहता हूँ: हिंसा का हर कर्म एक ‘अलगाव’ के विचार से जन्म लेता है। ‘मैं यह हूँ, तू अन्य है।’ ‘मेरा पवित्र है, तेरा बेकार है।’ उस विचार को छोड़ दो, और हथियार अपने आप गिर जाएगा। अपने मन को वैसे ही सहेजो जैसे कोई घायल बच्चे को—बिना दोषारोपण के, बिना कठोरता के। उसी सहेजने से करुणा हर क्रिया में, हर नीति में, इस नाज़ुक धरती की हर साँस में बहने लगेगी।”
वे स्क्रीन पर बहती खबरों की ओर इशारा करते: “तुम घटनाओं का इस तरह पीछा करते हो जैसे वे लहरें हों, भूल जाते हो कि तुम स्वयं सागर हो। कहीं आपदा आई—तुम आग बबूला हो गए। किसी नेता ने कुछ कहा—तुम निराश। इसमें कुछ नया नहीं। नया तो यह है कि तुम्हें लगता है—सब कुछ जानने का मतलब यह है कि कुछ नहीं बदल सकता। पर मार्ग तो अब भी सरल है: सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि। कोई एल्गोरिदम इस आष्टांगिक पथ का विकल्प नहीं बन सकता।”
अंत में वे हाथ जोड़ते हुए फुसफुसाते: “अपने आप दीपक बनो। न इन्फ्लुएंसर, न अनुयायी। बस एक दीपक—स्थिर, छोटा, पर्याप्त। दुनिया को तुम्हारी घबराहट नहीं चाहिए। उसे चाहिए तुम्हारी उपस्थिति। वहीं से शुरू करो। अभी शुरू करो।”
और फिर—हमेशा की तरह—वे मुस्कराते और आगे बढ़ जाते, यह प्रश्न हर उस हृदय में जीवित छोड़ते जिसने सुना।
* This message is generated by AI on my inputs.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

